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Memories of Another day

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While my Parents Pulin babu and Basanti devi were living

Friday, March 10, 2017

महत्वपूर्ण खबरें और आलेख सैफुल्लाह कब मारा गया? मीडिया को हमेशा की तरह पुलिस और इंटेलीजेंस एजेंसियों से भी ज़्यादा मालूम

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Thursday, March 9, 2017

जीत का जश्न मना लें,आगे अनंत अमावस्या है! आटोमेशन से नौकरियां, कंप्यूटर के बाद रोबोट के हमले में रोजगार,आजीविका खत्म विदेशों में हमले रुकें या न रुकें,भारत में तकनीकी पीढ़ियों के लिए अभूतपूर्व रोजगार संकट, भारत में रोजगार का इकलौता विकल्प IT सेक्टर में काम करने वाले करीब 14 लाख कर्मचारियों का भविष्य अंधकार! मुक्त बाजार में नोटबंदी के बाद अब भुखमरी, बेरोजगारी, मंदी, असहिष्णुता, घृणा,ह�


जीत का जश्न मना लें,आगे अनंत अमावस्या है!

आटोमेशन से नौकरियां, कंप्यूटर के बाद रोबोट के हमले में रोजगार,आजीविका खत्म

विदेशों में हमले रुकें या न रुकें,भारत में तकनीकी पीढ़ियों के लिए अभूतपूर्व रोजगार संकट, भारत में रोजगार का इकलौता विकल्प  IT सेक्टर में काम करने वाले करीब 14 लाख कर्मचारियों का भविष्य अंधकार!

मुक्त बाजार में नोटबंदी के बाद अब भुखमरी, बेरोजगारी, मंदी, असहिष्णुता, घृणा,हिंसा  और जुबांबंदी का सवा सत्यानाशी माहौल।

पलाश विश्वास

जीत का जश्न मना लें,आगे अनंत अमावस्या है।

अमेरिका और बाकी दुनिया में भारतीय मूल के लोगों पर हमले तेज हो रहे है तो स्वदेश में भी आजीविका और रोजगार पर कुठाराघात है।

मुक्तबाजार में नोटबंदी के बाद अब भुखमरी, बेरोजगारी, मंदी, असहिष्णुता, घृणा, हिंसा और जुबांबंदी का माहौल है।भारत में IT सेक्टर में काम करने वाले करीब 14 लाख कर्मचारियों का भविष्य एक ट्रांजिशन फेज से गुजर रहा है। इनमें से ज्यादातर कर्मचारियों की जॉब खतरे में है।

विकास दर के झूठे दावे और झोलाछाप अर्थशास्त्रियों के करिश्मे से सुनहले दिनों के ख्बाब और रामजी की कृपा से धार्मिक ध्रूवीकरण और आखिरी वक्त आईसिस के हौआ से भले ही यूपी जीत लें संघ परिवार,अर्थ व्यवस्था की गाड़ी पटरी पर लौटनेवाली नहीं है।मसलन ग्लोबल मंदी और डॉनल्ड ट्रंप की नीतियों से आईटी सेक्टर घबराया हुआ है। इंडस्ट्री में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। इसी को देखते हुए नैसकॉम ने भी वित्त वर्ष 2018 का ग्रोथ अनुमान तीन महीने के लिए टाल दिया है। ऐसा पहली बार है जब नैसकॉम ने वित्त वर्ष शुरू होने से पहले ग्रोथ अनुमान टाला हो। हालांकि आईटी सेक्टर को अब भी आने वाला समय बेहतर दिखाई दे रहा है।

नैसकॉम चेयरमैन सी पी गुरनानी ने कहा है कि आईटी इंडस्ट्री तेजी से ऑटोमेशन की तरफ बढ़ रही है इसलिए नौकरियों पर खतरा मंडरा रहा है।

For the sector as a whole – including large, medium and small IT firms but excluding MNC captive centres – the growth in 2017 is expected to be a mere 5.3 per cent. That's a steep drop from the 8-10 per cent that the industry is expected to do, as per IT industry body Nasscom.

भारतीय आईटी सेक्टर में काम करने वाले मिड लेवल के कर्मचारियों के लिए चिंता करने वाली खबर है।

इकॉनमिक टाइम्स की खबर के मुताबिक, ये कंपनियां खुद को ऑटोमेशन और नई टेक्नॉलजी के हिसाब से ढालने में लगी हुई हैं। मिड लेवल की कंपनियों में करीब 14 लाख कर्मचारी हैं। उनके पास 8 से 12 साल का अनुभव है और उनकी सेलरी 12 से 18 लाख रुपए सलाना है। बताया जा रहा है कि री-स्किलिंग और री-स्ट्रक्चरिंग का असर इन्हीं पर है। आमतौर पर इनकी उम्र 35 साल के आस-पास ही होती है।

यूपी समेत पांच राज्यों में मीडिया सत्ता के साथ रहा है और पहले ही केसरिया सुनामी पैदा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

नोटबंदी से लेकर राममंदिर और आखिरकार आतंकवाद जैसे पड़ाव पार करने के बाद मतदान पर्व समाप्त है और 11 मई तक भारतीय मीडिया में ज्योतिष शास्त्र वास्तुशास्त्र के तहत कुंडलीपर्व जारी रहना है।

बहरहाल कोई जीते या कोई हारे,यह हमारे सरदर्द का सबब नहीं है।

कामर्शियल, माफ करें चुनावी अंतराल के बाद संसद का बजट सत्र फिर चालू है और किसी ने सवाल दाग ही दिया कि अमेरिका में भारतीय मनुष्यों पर एक के बाद एक हमले पर प्रधान सेवक क्यों चुप हैं।सवाल कोई चाबी जाहिर है नहीं कि चुप्पी का सिंहद्वार खोल दें।बहरहाल गृहमंत्री ने कहा कि सरकार सीरियस है।

हालात लतीफों से ज्यादा हास्यास्पद है मसलन खबर है कि कल तक एनआरआई दूल्हे के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार बैठे परिवार अब शादी के ऐसे प्रस्तावों से कन्नी काटने लगे हैं।

मजे का किस्सा यह है कि शादी की जोड़ियां मिलाने वाली वेबसाइटों के आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका में हाल की घटनाओं से भारतीय परिवारों में एनआरआई दूल्हे का क्रेज काफी कम हुआ है। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक इनकी मांग में 25 फीसदी की कमी आई है। यह कमी ज्यादातर अमेरिका में बसे भारतीय दूल्हों के संदर्भ में बताई जा रही है। कहने को एनआरआई कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड से लेकर संयुक्त अरब अमीरात तक तमाम देशों में फैले हुए हैं..  

अब तनिको इस सीरियस संवाद पर गौर फरमायेंः

In recent weeks, at least two Indians have been killed in incidents of hate crime in the US. "Why is the Modi government silent on the attacks against Indian in the US? The Prime Minister tweets on every other issue, why doesn't he talk on this issue? Why is he silent? He should make a statement today," Kharge said.

In his reply, Union Home Minister Rajnath Singh said that the government has taken a serious note of the recent incidents against Indians in US. He added that the government will make a statement on the issue next week in the Parliament. "What is happening in the US is being viewed seriously by the government and a statement would be made in the Parliament next week," he said during Question Hour. Parliamentary Affairs Minister Ananth Kumar also said the government was very much concerned about the incidents in the US.

साभार इंडियन एक्सप्रेस

कुछ पल्ले पड़ा? सरकार सीरियस है लेकिन इस नस्ली घृणा अभियान की निंदा या विरोध करने की स्थिति में नहीं है।जाहिर है कि  मामले को मटियाने के लिए संसद में  बयान जारी कर दिया जायेगा।

जाहिर है कि मनुस्मृति शासन के सत्ता वर्गी की राजनीति और राजनय अमेरिकी हितों के खिलाफ चूं भी करने की हालत में नहीं है।जिस कारपोरेट फंडिंग के बिना संसदीय राजनीति नहीं चलती,उसके तार सीधे व्हाइट हाउस से जुड़े हुए हैं।

सत्ता वर्ग नोटबंदी के मुक्तबादा र में किताना मालामाल है उसका एक उदाहरण पेश है।एक तरफ कहा जाता है कि नोटबंदी की वजह से व्यापार और कमाई में भारी गिरावट की आई है, वहीं आंध्र प्रदेश के अधकेसरिया मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के बेटे और युवा नेता नारा लोकेश की कमाई में इस दौरान 23 फीसद बढ़ोत्तरी देखने को मिल रही है। चंद्रबाबू नायडू के बेटे और तेलगू देशम पार्टी के महासचिव नारा लोकेश जल्दी ही अपने पिता की कबिनेट में शामिल होने वाले हैं। नारा लोकेश ने सोमवार को चुनाव आयोग में जो हलफनामा दिया है उससे ही खुलासा हुआ है कि नोटबंदी के दौरान उनकी संपत्ति में भारी बढ़ोत्तरी हुई है।

From Rs 14.50cr to Rs 330cr in 5 months, Nara Lokesh's net worth in affidavit raises eyebrows


सवाल यह है कि राष्ट्र को नागरिकों की जान माल की कितनी चिंता है और नागरिकों की देश विदेश में सुरक्षा की जिम्मेदार चुनी हुई सरकार है या नहीं।

धर्म कर्म से लेकर आतंकवाद तक जो अंध राष्ट्रवादी की सुनामी है,वहां राष्ट्र जाहिर है कि सार्वभौम है, सर्वशक्तिमान है, लेकिन उस राष्ट्र के नागरिकों का वजूद सिर्फ आधार नंबर है।सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना करते हुए हर जरुरी सेवा के लिए आधार अनिवार्य किया जा रहा है,जो सबसे बड़ा आईटी टमत्कार है तो नागरिकों की गतिविधियों,उनकी निजता,गोपनीयता से लेकर उनके सपनों और विचारों की लगातार निगरानी का चाकचौबंद इंतजाम है। अपरेने ही नागरिकों की कारपोरेट कंपनियों के हित में निगरानी करने वाले राष्ट्र के नागरिकों की देश विदेश में सुरक्षा करने की कितनी जिम्मदारी है और इस सिलसिले में सरकार और सत्ता तबक कितना सीरियस है जो पल पल नागरिकों की जिंदगी नर्क बनाने में सक्रिय हैं,समझ लें।

मिड डे मिल पर दि वायर के वीडियो में मशहूर पत्रकार विनोद दुआ ने सही कहा है कि आधार है तो आपका वजूद एक नंबर है और आधार नहीं है तो आपका कोई वजूद नहीं है। राजकाज और राजधर्म से तो साबित है कि निराधार आधार का भी कोई वजूद नहीं है। नंबरदार गैरनंबरदार नागरिक कैसा भी हो,उसका कोई वजूद नहीं है।

अमेरिका के किसी नागरिक का दुनियाभर में कहीं बाल भी टेढ़ा हो जाये तो अमेरिका अपनी पूरी सैन्य शक्ति अपने उस इकलौते नागरिक के हक में झोंक देता है। उसी अमेरिका में जब किसी उपनिवेश के नागरिक की ऐसी तैसी या हत्या तक हो जाये तो जाहिर है कि उपनिवेश की सरकार के लिए जुंबा पर तालाबंदी के सिवाय कोई दूसरा विकल्प नहीं है।तकनीकी जनता की हालत भी अदक्ष श्रमजीवी आम जनता से बेहतर नहीं है तकनीकी गैरतकनीकी क्रयशक्ति विभाजन की नोटबंदी के बावजूद।इस तकनीक कार्निवाल के कबंध नागरिकों का भी बाकी जनता का हाल होने वाला है।

मुश्किल यह है कि फ्रांस में भी लेडी ट्रंप की ताजपोशी तय है।भूमंडल में कहीं, शरणार्थी हो या आप्रवासी श्वेत आतंकवाद के निशाने से किसी का भी बच पाना मुश्किल है।यूरोप और अमेरिका के बाहर न्यूजीलैंट से लाइव स्ट्रीमिंग शुरु है।

विदेश में बारतीय नागरिकों पर हमले से बड़ी खबर यह है कि अब क्योंकि IT सेक्टर वक्त के साथ साथ नई टेक्नोलॉजी के हिसाब से बदल रहा है। यह दौर ऑटोमेशन का है।सत्ता तबके के मेधावी बच्चों पर शायद फिलहाल फर्क न पड़े।

क्योकि ऑटोमेशन से अगर सबसे ज्यादा खतरा है तो वे हैं कंपनी के मिड लेवल कर्मचारी।जो आम जनता और बहुजन परिवारों के मध्य मेधा वाले बच्चे हैं और तकनीक के अलावा कुछ नहीं जानते और दलील यह है कि  इनकी जॉब खतरे में इसलिए है क्योंकि ये कर्मचारी खुद को बदलना नहीं चाहते हैं। कहा जा रहा है कि ये कर्मचारी एक अच्छे मैनेजर हैं जो मैनेज करना अच्छे से जानता है। बदलती टेक्नोलॉजी के साथ इन कर्मचारियों ने खुद को नहीं बदला।

इस आटोमेशन का जीता जागता नजारा भारतीय मीडिया का नंगा सच है।अब किसी भी अखबार में मार्केटिंग से नीति निर्धारण होता है और संपादकीय विभाग का कोई वजूद नहीं है तो आटोमेशन का कुल रिजल्ट पेड न्यूज है,मीडिया भोंपू है।

हर सेक्टर में मैनेजमेंट श्रम कानून और वेतनमान के झंझट से बचने के लिए आधुनिकीकरण  के नाम पर कंप्यूटर और रोबोट से काम चलाने के लिए आटोमेशन का विकल्प आजमाने लगा है और इसपर सरकारी या राजनीतिक कोई अंकुश नहीं है और न इसके खिलाफ कोई ट्रेड यूनियन आंदोलन है।

जाहिर है कि सबसे मुश्किल यह है कि हमारी अब कोई उत्पादन प्रणाली नहीं है और न हमारी कोई अर्थव्यवस्था है।

कहने को तो शेयरबाजारी एक बाटमलैस ट्रिलियन डालर अर्थव्यवस्था है,जो सीधे तौर पर अमेरिकी डालर से नत्थी है यानी खुल्लमखुल्ला अमेरिकी उपनिवेश है।

परंपरागत कृषि आधारित उत्पादन प्रणाली सिरे से खत्म है और ब्रिटिश उपनिवेश के दौरान जो पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली बनी थी औद्योगीकरण की वजह से, उसे भी मुक्तबाजार ने खत्म कर दिया है।

अब चुनावों में खैरात बांटकर नागरिकों को भिखारी मानकर नोटवर्षा करके जीत हासिल करने का लोकतंत्र है।विकास का मतलब है उपभोक्ता बाजार का विस्तार,सीधे तौर पर अंधाधुंध शहरीकरण और शहरीकरण के तहत उपभोग के चकाचौंध करने वाले बाजार के हित में सुपर एक्सप्रेस वे, हाईवे, मेट्रो, फ्लाईओवर, माल, मल्टीप्लेक्स, लक्जरी हाउसिंग,हेल्थ हब का विकास और यह सब कल कारखानों और देहात के श्मशानघाट या कब्रिस्तान पर गजब के शोर शराबे के साथ हो रहा है।जिसके तहत जल जंगल जमीन नागरिकता और मानवाधिकार,बहुलता,विविधता,लोकतंत्र विरोधी यह दस दिगंतव्यापी कयामती फिजां है और सारा देश गैस चैंबर में तब्दील है।

आर्थिक सुधारों से पहले वामपंथी मशीनीकरण और कंप्यूटर का विरोध कर रहे थे।लेकिन बाद में वामपंथी भी चुप हो गये।वे भी पूंजीवादी विकास की अंधी दौड़ में शामिल हो गये और पिछले 26 साल से वे लगातार हाशिये पर जाते हुए भी खुश हैं और जनता के बीच खड़े होने से मुंह चुरा रहे हैं।

नतीजतन अब हालत यह है कि रोजगार का एकमात्र साधन कंप्यूटर है।

पिछले छब्बीस साल से कंप्यूटर यानी आईटी की आटोमेशन की कृत्तिम मेधा ही इस देश में रोजगार की धुरी है।मानवीय मेधा और मनुष्यता तेल लाने गयी हैं।

हावर्ड बनाम हार्डवर्क पहेली का हल यही है कि उच्च शिक्षा,शोध और विश्वविद्यालय गैरजरुरी है क्योंकि तकनीक जानना ही आजीविका के लिए पर्याप्त है। पहले विदेशों में डाक्टर इंजीनियर जाते थे और अब दुनियाभर में आईटी सेक्टर से भारतीय मूल के लोग खा कमा रहे हैं।इसीलिए सत्ता वर्ग के निशाने पर हैं तमाम विश्वविद्यालय और उनके छात्र और शिक्षक।असहिष्णुता का यह रसायन है।जो मनुस्मृति का डीएनए भी है और संक्रामक महामारी भी है।

मशीन और कंप्यूटर ने विकसित दुनिया के लिए भारत की श्रम मंडी से औपनिवेशिक भारत के कच्चा माल की तरह सस्ता दक्ष श्रमिकों का निर्यात उसीतरह शुरु किया जिस तरह उन्नीसवीं दी तक एशिया और अप्रीका से गुलामों का निर्यात होता था। फर्क यह है कि गुलामों के कोई हक हकूक नहीं थे और अब दुनियाभर में हमारे दक्ष श्रमिक बेहद सस्ते मूल्य पर श्रम के बदले यूरोप अमेरिका और आस्ट्रेलिया से लेकर लातिन अमेरिका और अफ्रीका में भी भारत की तुलना में बेहतर जीवनशैली में जीते हैं।

हमारे यहां हुआ हो या न हुआ हो, उन बेहतर विकसित देशों में तेज एकाधिकारवादी पूंजी के विकास में आम जनता के लिए रोजगार के मौके खत्म हो गये। मसलन इंग्लैंड में जीवन के किसी भी क्षेत्र में सौ साल पहले भी पूरी दुनिया पर राज कर रहे अंग्रेजों का वर्चस्व नहीं है।

इसीतरह अमेरिका में गरीबी और बेरोजगारी बढ़ी है क्योंकि एशियाई लोगों को नौकरी देकर कंपनियां इतना ज्यादा मुनाफा दुनियाभर में कमाने लगी है कि उन्हें अमेरिकी नागरिकों को रोजगार देना घाटे का सौदा है।

इसी का नतीजा धुर दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी नस्ली डान डोनाल्ड ट्रंप की ताजपोशी है और अश्वेतों केखिलाफ श्वेत जनता की घृणा है।

अब फ्रांस में भी वही होने जा रहा है तो ब्रेकसिट से बाहर आने के लिए ब्रिटिश जनादेश का मतलब भी गैर अंग्रेज नस्लों के ब्रिटेन से सफाये का कार्यक्रम है।

स्थानीय रोजगार अब दुनियाभर में कहीं नहीं है,मशीनीकरण के बाद कंप्यूटर और कंप्यूटर के बाद रोबोट आधारित मुक्तबाजार के अर्थव्यवस्था में। इसलिए भूमिपुत्रों के हकहकूक की मांगों, उनकी गरीबी और बेरोजगारी के बढ़ते संकट की वजह से देश के बाहर किसी भी देश में नौकरी और आजीविका के लिए गये भारतीय मूल के लोगों के लिए यह भयानक दुस्समय है।

स्थानीय रोजगार के अलावा इस समस्या का समाधान नहीं है लेकिन बारत में सरकारे रोजगार सृजन के बदले रोजगार और आजीविका कारपोरेट एकाधिकार हित में अपनी जेबें गरम करने के लिए खत्म करने पर आमादा है।  

अमेरिकी ही नहीं,बाकी दुनिया में भी ये हमले बढ़ते जायेंगे क्योंकि उत्पादन संबंधों के अत्यंत शत्रुतापूर्ण हो जाने से दुनियाभर में अंध राष्ट्रवाद का तूफां चल रहा है जो हमारी अपनी केसरिया सुनामी से भी ज्यादा प्रलयंकर है। यह संकट गहराते जाना है।रोजगार सृजन के नये विकल्पों पर तेजी से काम करने के अलावा और कृषि संकट को सुलझाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है,सरकारे ऐसा चाहती नहीं हैं।

इस विचित्र संकट का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि शिक्षा के बाजारीकरण हो जाने से स्नातक स्नातकोत्तर की पढ़ाई की जगह तकनीकी पढ़ाई सर्वोच्च प्राथमिकता हो गयी है क्योंकि उत्पादन के बजाय आईटी आधार निराधार सेवाओं में ही रोजगार और आजीविका हैं।

अब इसमें सत्यानाश यह है कि यह सारी सेवा तकनीक आधारित रोजगार आउटसोर्सिंग पर निर्भर है।जो अमेरिका के नाभिनाल से जुडा़ है।

अमेरिका से हमलों के अलावा तीन बड़ी खतरनाक खबरें आ रही हैं।

पहली रोजगार के लिए वीजा में सख्ती,रोजगार के लिए अमेरिका गये व्यक्ति के पति या पत्नी या आश्रितों के वीजा खत्म और आउटसोर्सिंग सिरे से खत्म की तैयारी है।

आउटसोर्सिंग खत्म करने के बाद सिर्फ तकनीक से लैस 1991 के बाद की पीढ़ियों के रोजगार और आजीविका का क्या होना है,संकट यह अमेरिका और बाकी दुनिया में भारतीय मूल के लोगों पर हमलों से भी बड़ा संकट है।

एच-1बी, एच-4 वीसा और आउटसोर्सिंग के साथ कंप्यूटर की जगह रोबोट के विकल्प अपनाने की तैयारी और दुनियाभर में ट्रंप सुनामी के मद्देनजर आईटी सेक्टर में रोजगार की एक तस्वीर इस प्रकार हैः

  • 2015-16 में आईटी सेक्टर में 2.75 लाख कर्मचारी नियुक्त किये जाने थे,वास्तव में सिर्फ दो लाख नई नियुक्तियां हो सकीं।

  • 2016-17 में नियुक्तियां और घटेंगी।

  • 2021 तक 6.4 लाख नौकरियां खत्म होंगी।

  • अगले चार सालों में आईटी सेक्टर में 69 प्रतिशत नौकरियां खत्म होगीं।

  • आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी रोबोट ने पिछले साल इनफोसिस और विप्रो में सात हजार कर्मचारियों के बदले काम किया है।

  • 2016 में टीसीएस,विप्रो,इनफोसिस और एचसीएल में 12 प्रतिशत नियुक्तियां कम हुई हैं।

सौजन्य सूत्रःहर्सेज फार सोर्सेज और विश्व बैंक

वीकिपीडिया के मुताबिकः

Artificial intelligence (AI) is intelligence exhibited by machines. In computer science, the field of AI research defines itself as the study of "intelligent agents": any device that perceives its environment and takes actions that maximize its chance of success at some goal.[1] Colloquially, the term "artificial intelligence" is applied when a machine mimics "cognitive" functions that humans associate with other human minds, such as "learning" and "problem solving" (known as Machine Learning).[2] As machines become increasingly capable, mental facilities once thought to require intelligence are removed from the definition. For example, optical character recognition is no longer perceived as an exemplar of "artificial intelligence", having become a routine technology.[3] Capabilities currently classified as AI include successfully understanding human speech,[4] competing at a high level in strategic game systems (such as Chess and Go[5]), self-driving cars, intelligent routing in content delivery networks, and interpreting complex data.

गौरतलब है कि इंफोसिस के CEO विशाल सिक्का ने एक इंटरव्यू में जिक्र किया है कि IT कंपनी हर साल कंसलटेंट्स के लिए करोड़ों डॉलर खर्च करती है। और कंसलटेंट्स के निशाने पर मिड लेवल कर्मचारी ही होते हैं। हर कंसलटेंट्स को लगता है कि मिड लेवल ही कंपनी पर सबसे बड़ा बोझ है। क्योंकि इनकी तादाद सबसे ज्यादा होती है और इनमें इनोवेशन की कमी होती है। ये बदलने के बजाए ठहर जाते हैं।

विशाल सिक्का ने भी इस बात को माना कि मिड लेवल का बाहरी दुनिया और क्लाइंट से संपर्क नहीं होता है। अपर लेवल के कर्मचारी बाहरी दुनिया में क्या कुछ हो रहा है उससे बेहतर वाकिफ होते हैं। साथ ही वे इस बात को भी बखूबी समझते हैं कि अगर मैनेजमेंट ने कोई फैसला लिया है तो इसका क्या मकसद है इसलिए अगर वे खुद में कोई कमी पाते हैं तो खुद को अपडेट करते हैं। लेकिन भारत में मिड लेवल के कर्मचारी बेहतर मैनेजर होते हैं। इंडस्ट्री भी उनसे उम्मीद करता है कि जो कुछ उन्हें मिल रहा है वे उसी से कंपनी के लिए बेहतर काम करें। या फिर यू कहें कि सबकुछ मैनेज कर के चलें।  यहां का मिड लेवल डिलीवरी पर ज्यादा फोकस्ड रहता है ना कि इनोवेशन पर।

मशहूर गांधीवादी कार्यकर्ता हिमांशु कुमार जी ने आज फेसबुक पर लिखा हैः

तो देशवासियों खबर यह है कि आपको नौकरी देने वाली कंपनियों के लिये आदिवासी इलाकों में ज़मीनें छीनने के लिये हमारे सैनिक लगातार आदिवासियों की हत्या और औरतों से बलात्कार कर रहे हैं,

ग्रामीण रोज़गार योजना में मज़दूरों की मजदूरी 6 महीने में भी नहीं मिल रही है,

भाजपा सरकार नें नौजवानों को हर साल 2 करोड़ रोज़गार देने का वादा किया था,

लेकिन ढाई साल में सिर्फ पौने दो लाख लोगों को रोज़गार मिला,

राशन दुकान में मशीन पर उंगालियों के निशान लेकर गरीबों को अनाज दिये जाने का हुक्म दिया गया है,

लेकिन मज़दूरो की और बूढ़ों की उंगलियां घिस जाती हैं और लकीरें मिट जाती हैं,

लाखों गरीब बिना राशन भूखे सो रहे हैं,

लेकिन यह सब इस मुल्क के मुद्दे नहीं हैं,

आपको बताया जा रहा है कि आप लखनऊ में मार डाले गये एक मुसलमान नौजवान के खौफ में कुछ दिन भारतीय मुसल  मानों को गालियां देते हुए गुजारिये,

इस बीच अंबानी अडानी की ज़मीनें कुछ हज़ार एकड़ और बढ़ जायेगी,

कुछ लाख भारतीय किसानों को बेज़मीन बनाकर ज़्यादा गरीब बना दिया जायेगा,

उनकी ज़मीन मोदी के आकाओं को देकर उन्हें ज़्यादा अमीर बना दिया जायेगा,

इस बीच कुछ गरीब सिपाही मरेंगे कुछ गरीब आदिवासी मर जायेंगे,

आप आतंकवाद की फर्जी सनसनी में डूबे रहिये,

खेल एकदम सटीक चालू है,


Wednesday, March 8, 2017

Politics betrays again!Refugees attacked in Assam by AASU and FIR lodged against refugees,wanted warrant issued. Palash Biswas

Politics betrays again!Refugees attacked in Assam by AASU and FIR lodged against refugees,wanted warrant issued. 

Palash Biswas


Refugees have been attacked for voicing citizenship to partition victim Bengali refugees who are detained in concentration camps as Hitler used to do in Germany against jees.Refugee rally was peaceful asthe organization has been pushing for justice to partition victim since 2005>During these 12 years leading the movement in every state,refugees have been quite democrat and never opted for violence nor any complaint lodged anywhere any time.The refugee leaders have always been in contact of the Centre and State governments as they has also been in contact with the government of Assam.
AASU engaged in drive every Non Assamese out of Assam hasattacked nad created the tension in Dhamaji fro which neither refugees nor the leaders of the movement should be held responsible.Rather it is a betrayal from the Centre and State government who do support AASU and ULFA taht is why the attackers lodged FIR and the police issued wanted warrant against the refugee leadres.Expecting help form political parties is definitely wrong but our people have no democrat constitutional way out for justice as they are subjected to discrimination, aparthied and persecution across the borders.
We should stand with the leadership of the refugee movement as citizenship is the question of life and death.It has been an unprecedented rally in Assam to voice the plight of the refugees.Refugees are subjected to inhuman persecution in Assam and those forces of racist fascism has reacted against the growing strength of the movement.Arrest warrant or arrest might be the logical conclusion.
I hope the legal experts with the movement are quite capable to handle the crisis.
I am appealing every person refugees as citizens to understnd the problem created by partition of India.
I also understand the view point of Assamese People who have been pitted against the innocent refugees and the politics has worsened the crisis making a vertical divide amongst the victims :Hindu and Muslim.It is politics in which our people have never been indulged.

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Tuesday, March 7, 2017

क्योंकि भारत में भारतीयों का सफाया फासिज्म का नस्ली राजकाज है इसलिए ट्रंप के नस्ली उन्मादी जिहाद के हक में हैं राजनीति,राजनय और मीडिया। असम में बंगाली शरणार्थियों की रैली उल्फा के खिलाफ,अब जेलभरो का ऐलान। आखिरी चरण के मतदान से पहले अमेरिका ने कहा,पाकिस्तान और बांग्लादेश खतरनाक और भारत में भी आतंकवादी सक्रिय,मध्य प्रदेश और यूपी में मुठभेड़ शुरु। पलाश विश्वास

क्योंकि भारत में भारतीयों का सफाया फासिज्म का नस्ली राजकाज है

इसलिए ट्रंप के नस्ली उन्मादी जिहाद के हक में हैं राजनीति,राजनय और मीडिया।

असम में बंगाली शरणार्थियों की रैली उल्फा के खिलाफ,अब जेलभरो का ऐलान।

आखिरी चरण के मतदान से पहले अमेरिका ने कहा,पाकिस्तान और बांग्लादेश खतरनाक और भारत में भी आतंकवादी सक्रिय,मध्य प्रदेश और यूपी में मुठभेड़ शुरु।

पलाश विश्वास

The US on Tuesday issued a travel warning for its citizens visiting Pakistan, Afghanistan and Bangladesh, and said extremist elements are also 'active' in India.

आखिरी चरण के मतदान से पहले अमेरिका ने कहा,पाकिस्तान और बांग्लादेश खतरनाक और भारत में भी आतंकवादी सक्रिय,मध्य प्रदेश और यूपी में मुठभेड़ शुरु।

कानपुर के रेल दुर्घटना में पाकिस्तानी हाथ होने के दावे के बीच मध्य प्रदेश में ट्रेन के डिब्बे में धमाका और उसके साथ साथ अमेरिकी चेतावनी और फतवे के बीच जगह जगह आतंकवादियों से मुठभेड़ का सिलसिला बेहद खतरनाक घटनाक्रम है।

फिलहाल टीवी पर आंखों देखा एनकाउंटर जारी है।जाहिर है कि भारत में भी आतंकवाद के खिलाफ युद्ध तेज होना है तो ऐसे में ट्रंप के राजकाज के खिलाफ हमारी जुबां खामोश है।

अजब गजब मीडिया इस विचित्र भारतवर्ष का है।

अमेरिका में एक के बाद एक भारतीय मूल के मनुष्यों पर हमले जारी हैं।लेकिन बनारस के अलावा भारतीय मीडिया का कहीं फोकस है तो वह पाकिस्तान है या फिर चीन है।अमेरिका के सात खून माफ हैं।

मीडिया को कोई फर्क नहीं पड़ता कि मुस्लिम देशों के साथ भारत के प्रतिबंधित न होने के बावजूद मुसलमानों और अश्वेतों के खिलाफ अमेरिका के श्वेत आतंकवादी धर्मयुद्ध में गैर मुसलमान भारतीय नागरिकों पर एक के बाद एक हमले क्यों हो रहे हैं।

यही मीडिया साठ के दशक से संघ परिवार के तत्वावधान में असम और समूचे पूर्वोत्तर में विदेशी हटाओ नारे के साथ भारत के दूसरे हिस्सों से वहां गये लोगों और पूर्वी बंगाल से आकर बसे विभाजन पीड़ितों के खिलाफ उग्रवादी नस्ली हमलों का समर्थन करता रहा है।

कल असम में निखिल भारत बंगाली उद्वास्तु समन्वय समिति की ओर से असम में अल्फाई राजकाज के प्रतिरोध में अभूतपूर्व रैली की है।जिसके बारे में समन्वय समिति के महासचिव अंबिका राय ने लिखा हैः

This is Nikhil bharat Bengali udbastu samanway samiti convention cum Rally at Dhamaji district , Assam on 6.3.2017. More than One lakh people assembled at the rally n convention. This program was only attended by two district only. AASU (All Assam Student Association) is spreading venom against Nikhil bharat with the false allegation to stop the movement as they never assessed the popularity of Nikhil bharat. They want Nikhil bharat central leadership should get arrested by Sarbanonda Sonwal 's administration. Tomorrow or day after we shall proceed from all states to Assam to get arrested voluntarily in protest against any sort of false allegation.

वीडियो भी देखेंः

https://www.facebook.com/ambika.ray.16

जाहिर है कि सोनोवाल को हिंदू शरणार्थियों के अटूट समर्थन के बावजूद असम में आसू और अल्फा के निशाने पर बंगाली हिंदू शरणार्थी हैं।

शरणार्थी रैली के बाद जेल भरो आंदोलन के बाद क्या हालात होंगे और उल्फा की पृष्ठभूमि के सोनोवाल पर शरणार्थियों का भरोसा कितना खरा रहेगा, इससे बड़ा सवाल यह है कि उल्फाई राजकाज में यातना शिविर में तब्दील असम में गैर असमिया समुदायों की जान माल कितनी सुरक्षित है और संघ परिवार के भरोसे अमन चैन का क्या होना है।फिरभी असम की जमीन पर उल्फा के खिलाफ यह प्रतिरोध आंदोलन अभूतपूर्व है लेकिन आगे क्या होगा,उसपर नियंत्रण किसका होगा,फिक्र इसकी है।

अमेरिका ही नहीं,हमले अन्यत्र भी शुरु होने का अंदेशा है कि अमेरिका के बाद न्यूजीलैंड में भी अपने देश वापस जाओ,की चेतावनी के साथ बिना मोहलत दिये भारतीय मूल के नागरिक पर हमला हो गया।

यह बेहद जल्द संक्रामक महामारी में तब्दील होने जा रहा है और बजरंगी वाहिनी और उनके सिपाहसालारों से निवेदन हैं कि भारतीय होने का मतलब सिर्फ मुसलमान नहीं है।

फिरभी क्या मजाल की महामहिम ट्रंप की नस्ली भारतविरोधी मुहिम के खिलाफ भारत सरकार चचूं भी करें क्योंकि पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित करवाने की राजनय राजनीति दोनों ट्रंप समर्थक है।मीडिया भी ट्रंप के हक में है।

वैसे भारत वापस जाओ,के नारे सिर्फ विदेश में लग रहे हैं ,ऐसा नहीं है।

असम और पूर्वोत्तर में भारत के बाकी हिस्सों के नागरिकों के खिलाफ नारा यही है और असम में भाजपा सरकार का राजकाज उल्फाई है तो गोरखालैंड से लेकर बाकी पूर्वोत्तर के केसरियाकरण के लिए संघ परिवार का क्षेत्रीय उग्रवाद के साथ चोली दामन का रिश्ता  है।

भारतीय मुसलमानों को कश्मीर और पूर्वोत्तर और काफी हद तक उत्तराखंड और हिमाचल के भारतीय गैर नस्ली नागरिकों के साथ, आदिवासियों के साथ और यूं कहें तो समूचे बहुजन समाज के साथ संघ परिवार न हिंदू मानता है और न भारतीय।

देश में लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई केंद्र और राज्य सरकारों के खिलाफ लोकतांत्रिक आलोचना या सिर्फ आदिवासियों और बहुजनों के हक में मनुस्मृति के खिलाफ आवाज उठाने के लिए या दमन उत्पीड़न नरसंहार का विरोध करने के लिए या निरामिष ढंग से  सिर्फ धर्म निरपेक्षता, विविधता ,बहुलता, नागरिक मानवाधिकारों , विविधता, रोजगार, आजीविका की बात कहने पर तत्काल पाकिस्तान चले जाने का फतवा जारी हो जाता है।

मसलन ताजा जानकारी यह है कि माओवादियों से संबंध रखने के कारण डीयू के रामलाल आनंद कॉलेज से निलंबित चल रहे अंग्रेजी के प्राध्यापक जीएन साईबाबा को अब दोषी पाया गया है और ऐसी संभावना है कि अब उनको नौकरी से निष्काषित किया जा सकता है। हालांकि, इस बाबत अंतिम फैसला कॉलेज की गवर्निग बॉडी लेगी। डीयू के कई शिक्षकों का साईबाबा से संबंध था और कुछ शिक्षक तो गढ़चिरौली जेल में उनसे मिलने भी गए थे। प्राप्त सूचना के अनुसार, ये शिक्षक भी पुलिस के रडार पर हैं।

ऐसे में अमेरिका ने बाकी चुनिंदा मुस्लिम देशों को अमेरिका में प्रतिबंधित कर देने के बाद अफगानिस्तान,पाकिस्तान और बांग्लादेश को डेंजरस बता देने के बाद भारत में भी आतंकवादियों के सक्रिय रहने के आरोप के साथ भारत यात्रा के खिलाप फतवे देने से मनुस्मृति के राजधर्म को कोई फर्क पड़ता नहीं है।

बल्कि संघी नजरिये से भारत में गैरहिंदुओं के सफाये के एजंडा के तहत आतंकवादियों से निबटने के लिए अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप का न्यौता दिये जाने की राजनय का ही आफ हिंदू होने के नाते इंतजार करें तो आप वास्तव में हिंदू और भारतीय नागरिक दोनों हैं,वरना नहीं। ताजा घटनाक्रम इसीका संकेत है।

गौरतलब है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने सोमवार को संशोधित ट्रैवल बैन ऑर्डर पर दस्तखत कर दिए। खास बात यह है कि व्हाइट हाउस ने संशोधित ट्रैवल बैन ऑर्डर में इराक का नाम लिस्ट से हटा दिया है। 27 जनवरी के पहले ट्रैवल बैन लिस्ट में 7 देशों के नाम थे। ट्रंप ने राष्ट्रपति पद संभालने के साथ ही इराक समेत सात मुस्लिम बहुल देशों पर यात्रा प्रतिबंध लगाते हुए शासकीय आदेश पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन अदालतों ने उसे रोक दिया। इसे लेकर दुनिया भर के लोगों में काफी गुस्सा भी था।

व्हाइट हाउस के प्रवक्ता सीन स्पाइसर ने बताया कि ट्रंप ने बंद कमरे में इस नये आदेश पर हस्ताक्षर किए। नए शासकीय आदेश में सूडान, सीरिया, ईरान, लीबिया, सोमालिया और यमन के लोगों पर 90 दिनों का प्रतिबंध लगाया गया है। हालांकि यह पहले से वैध वीजा प्राप्त लोगों पर लागू नहीं होगा।

बनारस का राजकाज निबट गया है और राजधानी फिर नई दिल्ली में है।बाकी मंत्रिमंडल शायद दिल्ली में लौट आया है लेकिन प्रधानमंत्री बनारस से सीधे गुजरात लैंड कर रहे हैं क्योंकि  पीएम नरेंद्र मोदी आज से दो दिनों के गुजरात दौरे पर जा रहे हैं। इस दौरान पीएम कई कार्यक्रमों और बैठकों में हिस्सा लेंगे। पीएम सबसे पहले ओएनजीसी पेट्रो एडिशन्स लिमिटेड पेट्रोकैमिकल कॉमप्लेक्स में आयोजित एक समारोह में उद्योग जगत को संबोधित करेंगे। बाद में पीएम भरूच में आयोजित एक जनसभा को भी संबोधित करेंगे। पीएम भरूच जिले में नर्मदा नदी पर चार लेन के एक पुल का उद्घाटन करेंगे। इस पुल का निर्माण अहमदाबाद-मुम्बई राष्ट्रीय राजमार्ग पर यातायात को सुगम बनाने के लिए किया गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक- यह देश का सबसे लंबा एक्स्ट्रा डाज्ड केबल ब्रिज है।.

इस बीच अमेरिका के बाद न्यूजीलैंड में भी भारतीय मूल के एक नागरिक पर हमला हुआ है तो डान डोनल्ड ट्रंप  ने नया फतवा अमेरिकी नागरिकों के लिए भारत की यात्रा के खिलाफ जारी कर दिया है,बलि भारत में भी आतंकवादी सक्रिय हैं।

बनारस से चंचलजी ने फेसबुक पर लिखा हैः

कम्बख्त ये बनारस का जिलाधिकारी कौन है ? जिसे रोड शो क्या होता है , पता ही नही ? कहां से पढा है भाई और किस गधे ने डी यम बना दिया ? खुलीजीप मे खड़े होकर लाव लस्कर के साथ प्रदर्शन करना ही तो रोड शो कहलाता है या कुछ और ?

जा बच्चू स्साला जमाना निकल गया , वरना बताते डी यम किसे कहते हैं । भूरेलाल से बड़े अधिकारी नही हो , बड़ी दुर्गति हुई थी , विष्वविद्यालय मे ।

एक सवाल है डी यम साहेब

रोड शो कैसे होता है , उसका मानक क्या है ?

शर्म नही आती लिखित दे रहे हो की मोदी का रोड शो नही था ।

बहरहाल ताजा जानकारी के मुताबिक लखनऊ के जिस इलाके में एनकाउंटर चल रहा है वो रिहायशी कॉलोनी है। कॉलोनी नई है। इसलिए लोग एक-दूसरे के बारे में ज्यादा वाकिफ नहीं हैं। घर भी दूर-दूर बने हैं। लखनऊ.यहां के ठाकुरगंज इलाके में पुलिस का एक संदिग्ध आतंकी के साथ एनकाउंटर जारी है। आतंकी एक घर में छिपा है। दोनों तरफ से पहले रुक-रुक कर फायरिंग हुई। बाद में फायरिंग थम गई। एटीएस ने संदिग्ध से बात करने की कोशिश की। लेकिन उसने कहा कि वह जान दे देगा, लेकिन सरेंडर नहीं करेगा। इसके बाद फायरिंग दोबारा तेज हो गई। 20 राउंड फायरिंग के बाद एटीएस ने मौके पर एंबुलेंस बुला ली। फायरिंग में संदिग्ध घायल हो गया है।

इस मुठभेड़ से पहले भोपाल से 70 किमी दूर कालापीपल में जबड़ी स्टेशन के पास मंगलवार सुबह भोपाल-उज्जैन पैसेंजर (59320) ट्रेन में ब्लास्ट हो गया। इसमें 9 लोग जख्मी हो गए। ब्लास्ट से जनरल कोच में छेद हो गया। एमपी के आईजी लॉ एंड ऑर्डर मकरंद देवस्कर ने पुष्टि की कि भोपाल-उज्जैन पैसेंजर ट्रेन में हुआ ब्लास्ट आतंकी हमला ही था। यह आईईडी ब्लास्ट था। इस बीच, हमले के कुछ ही घंटों बाद पिपरिया पुलिस ने एक बस को टोल नाके पर रोककर तीन संदिग्धों को अरेस्ट कर लिया। सूटकेस में एक्सप्लोसिव होने का शक... - जीआरपी एसपी कृष्णा वेणी ने शुरुआती जांच में शॉर्ट सर्किट की वजह से ब्लास्ट होने की बात कही।


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