अर्थ व्यवस्था-शेयर बाजार बदहाल, राजनीतिक दल मालामाल!
बाजार खोल देने से अर्थ व्यवस्था नहीं सुधरती, सत्ता वर्ग की सामाजिक आर्थिक विशेषाधिकार के कारण चांदी है जाती है। बाजार में प्रवेश के लिए क्रयशक्ति अनिवार्य है। सामाजिक फ्लेगशिप योजनाओं के मार्फत सरकारी खर्च बढ़ाकर आम लोगों में नकदी का प्रवाह बढ़ाकर सरकार ने बाजार के विस्तार का इंतजाम तो कर दिया, पर बहिष्कृत समाज जो जनसंख्या का निनाब्वे फीसद है,उसकी क्रयशक्ति में कोई इजाफा नहीं हुआ।
उपभोक्ता सामग्री सस्ती हुई बाजार के हिसाब से पर खाद्य, चिकित्सा, आवास, ईंधन, चिकित्सा, शिक्षा जैसी जरूरी चीजें बाजार में इतनी मंहगी हो गयी और मूल्यवृद्धि व मुद्रास्पीति अनियंत्रित हो जाने , लगातार डालर का वर्चस्व बढ़ते जाने से आम आदमी का जीना मुश्किल हो गया है।
चिदंबरम का बयान हकीकत बयान करता है कि सरकार के लिए अनाज नहीं, उपभोक्ता वस्तुएं अहम है।वित्तमंत्री बदल दिये जाने से हालात सुधरने के आसार कम है क्योकि जरूरी वित्तीय नीति लागू होनी नहीं है। कारोबार के लिए अनियंत्रित छूट और उद्योग जगत कोछूट, विदेशी पूंजी प्रवाह को आर्थिक सुधार बताया जा रहा है जिससे आम आदमी जल, जंगल, जमीन और आजीविका से बेदखल ही हो रहा है।
समावेशी विकास के बहाने पूंजी इने गिने लोगों में सिमटती जा रही है। जहां अमेरिका में भारत के मुकाबले आर्तिक चुनौतियां कहीं ज्याद हैं, पर वहां हालत सुधरती नजर आ रही है। रेटिंग एजंसियों की रपें लगातार भारत के खिलाफ जारही है। क्योंकि अर्थ व्यवस्था की बुनियादी चुनौतियों से निपटने की राजनीतिक इच्छा और आर्थिक समझ दोनों का अभाव है।
घोटालों और विवादों में फंसी बारतीय राजनीति लोकतांत्रिक व्यवस्था और जनता के साथ दगा करने में लगी है। जहां आम आदमी दाने दाने को मोहताज है, वहीं राजनीतिक दल मालामाल हो रहे हैं , आखिर माजरा क्या है?
कालाधन को सफेद बनाने का खेल ही भारतीय अर्थ व्यवस्था के प्रबंधन का पर्याय हो गया है और इस खेल के खिलाड़ी हैं राजनेता, अर्थशास्त्री, नीति निर्धारक और मीडिया। इसीकी अभिव्यक्ति भारतीय अर्थ व्यवस्था और राजनीति में आज सबसे प्रबल है।
मनमोहन के पास कोई जादू की छड़ी नहीं है जो वे रातोंरात राजनीतिक बाध्यताओं पर जीत हासिल करके यह मंजर बदल दें।प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि उनकी सरकार राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करेगी और विदेशी निवेशकों के लिए राह आसान बनाने का काम करेगी।
विदेशी निवेशक अब भी सरकार की प्रथमिकता में सबसे ऊपर है, आम आदमी कहीं है ही नहीं। आज की राजनीति के नजरिये से आम आदमी का कोई वजूद है ही नहीं।
सभी लोग बाजार में क्रेता हैं। अगर खरीदने की ताकत आपके पास नहीं है तो भाड़ में जाइये। शेयर बाजार के विस्तार से विदेशी निवेशकों और कारपोरेट इंडिया का भला होगा , राजनीति भी मालामाल होती रहेगी, पर आम आदमी एक एक रुपये के लिए तरसता रहेगा।आर्थिक मंदी से चिंतित देश के प्रमुख औद्योगिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने प्रधानमंत्री आर्थिक सलाहकार परिषद् के चेयरमैन सी. रंगराजन से मुलाकात कर आर्थिक सुधार के लिए पैकेज और ब्याज दरों में कटौती की मांग की है।
अर्थ व्यवस्था बदहाल और शेयर बाजार की हालत भी खस्ती! मानसून अभी मेहरबान नहीं हुआ और राजनीतिक सरगर्मी काफी तेज है।
अब देश में एक और स्टॉक एक्सचेंज काम करेगा। सेबी ने इसकी मंजूरी दे दी है।इस मंजूरी के बाद अब एमसीएक्स-एसएक्स पर भी बीएसई और एनएसई की तरह इक्विटी शेयरों की ट्रेडिंग हो सकेगी। मल्टी कमोडिटी स्टॉक एक्सचेंज (एमसीएक्स-एसएक्स) को पूर्ण रूप से शेयर बाजार का परिचालन करने के लिए बाजार नियामक सेबी से मंजूरी मिलने के बाद देश के स्टॉक एक्सचेंज कारोबार में प्रतिस्पर्धा और कड़ी होने जा रही है।
एमसीएक्स-एसएक्स अक्टूबर से इक्विटी कारोबार शुरू कर सकता है। बंबई स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) और नैशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) के बाद राष्ट्रीय स्तर पर यह देश का तीसरा स्टॉक एक्सचेज होगा। देश के सबसे बड़े वायदा बाजार एमसीएक्स को इसके लिए नियामक के साथ करीब चार साल तक लड़ाई लड़नी पड़ी। ये एक्सचेंज MCX SX के नाम से काम करेगा।शेयर बाजार की नियामक संस्था सेबी ने देश में एक और स्टॉक एक्सचेंज को मंजूरी दे दी है।
ये मुद्दा पिछले करीब चार साल से फैसले के इंतजार में था. MCX SX नाम के इस स्टॉक एक्सचेंज को सेबी ने सबसे पहले सितंबर 2008 में मान्यता दी थी।लेकिन ये केवल मुद्रा के क्षेत्र में कारोबार संचालित कर रहा था। अब मंजूरी मिलने के बाद MCX-SX नाम का ये स्टॉक एक्सचेंज पूरी तरह शेयर बाजार के तौर पर काम करेगा और बीएसई और एनएसई के बाद ये देश का तीसरा शेयर बाजार होगा।
दूसरी ओर देश की अर्थ व्यवस्था की विकास दर पिछले कुछ बरसों में भले नीचे गिर रही हो, लेकिन एक अंग्रेजी अखबार की खबर के मुताबिक देश की राजनीतिक पार्टियों की तिजोरियां चंदे से दिन प्रति दिन भरती जा रही हैं।आंकड़ों के लिहाज से देखें तो चंदे से जो पार्टी सबसे ज्यादा अमीर हुई है उसमें सत्तारुढ़ कांग्रेस पार्टी सबसे ऊपर है।
इनकम टैक्स के आंकड़ों के लिहाज से कांग्रेस ने पिछले पांच बरसों में 1662 करोड़ रुपये चंदे के तौर पर जमा किए हैं।दूसरा नंबर सुशासन का दावा करने वाली बीजेपी का है जिसने पिछले पांच साल में 852 करोड़ रुपये पार्टी के खजाने में जमा किए हैं।
मायावती की बीएसपी ने पांच साल में 424 करोड़ रुपये और मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी ने 202 करोड़ रुपये चंदे के तौर पर जमा किए हैं।
ये आंकड़े टाइम्स ऑफ इंडिया ने इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के हवाले से दिए हैं. सभी पार्टियाँ चंदे से मिलने वाली रकम का रिटर्न फाइल करती हैं।भारतीय पूंजी बाजार में नकदी खंड में होने वाला कारोबार पिछले पांच सालों के निम्रतम स्तर पर पहुंच गया है। शेयर बाजार में अनिश्चितता और गिरावट के रुझान के कारण खुदरा निवेशकों की लचर भागीदारी से कारोबार पर प्रतिकूल असर पड़ा है।
बंबई स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) और नैशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) दोनों का रोजाना औसत कारोबार इस कैलेंडर वर्ष की पहली छमाही में 13850 करोड़ रुपये रहा जो 2007 के बाद से निम्रतम स्तर है।
देश के शेयर बाजारों में बुधवार को गिरावट का रुख रहा। प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स 129.21 अंकों की गिरावट के साथ 17489.14 पर और निफ्टी 39.05 अंकों की गिरावट के साथ 5306.30 पर बंद हुआ। बम्बई स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) का 30 शेयरों वाला संवेदी सूचकांक सेंसेक्स 64.38 अंकों की गिरावट के साथ 17553.97 पर खुला। सेंसेक्स ने 17582.99 के ऊपरी और 17466.99 के निचले स्तर को छुआ।इंफोसिस के नतीजे और आईआईपी आंकड़े आने के पहले बाजार में मुनाफावसूली का रुझान दिखा।
अधर में लटकी अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को मुश्किल विधेयकों को पारित कराना होगा, मंत्रियों की सुस्ती दूर भगानी होगी और भारतीय रिजर्व बैंक को दुरुस्त करना होगा।
ये कार्य़भार मौजूदा हाल में असंबव नजर आते हैं क्योकि केंद्र सरकार का देश की राजनीति पर कोई नियंत्रण नहीं है और नीति निर्धारण पर प्रणव की विदाई के बाद भी क्षत्रपों और कारपोरेट इंडिया का दोहरा दबाव है।
सरकार मानेंया न मानें, इस देश में अब भी अर्थ व्यवस्था की रीढ़ कृषि है। कृषि विकास दर लगातार गिरती जाये, औद्योगिक उत्पादन का भी वही हाल,तो आप कानून बनाकर सबकुछ ठीकठाक नहीं कर सकते। मानसून की अनिश्चितता अब भी देश के आम आदमी को ही नहीं, अर्थ व्यवस्था को बी प्रभावित करती है।
देश में खेती के लिए बड़े सहारे का काम करने वाला र्दिक्षण पश्चिमी मानसून इस बार आज पूरे देश में पहुंच गया। इसके बावजूद इस मौसम में अभी बारिश की मात्रा सामान्य से 23 प्रतिशत कम है। मानसून पांच जून को केरल तट से प्रवेश किया था लेकिन इसकी प्रगति धीमी रही। इसके कारण धान, दलहन तथा मोटे अनाज की बुआई में कुछ देरी हुई है।
भारतीय मौसम विभाग के महानिदेशक एल एस राठौड़ ने कहा, 'बारिश की स्थिति सुधरी है लेकिन अभी भी यह 23 प्रतिशत कम है।देश के ज्यादातर इलाकों में बारिश देखी जा रही है। अब तक पश्चिमोत्तर में गुजरात और राजस्थान के कुछ इलाकों के अलावा मध्य भारत के कई इलाकों में मॉनसून नहीं पहुंच सका था।
यह सरकार कितनी मजबूर है, ममता बनर्जी और क्षत्रपों को मनाने की कवायद से साफ जाहिर है।राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवारी को लेकर मतभेद के बाद से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता यूपीए से कटी हुई है। यूपीए के सबसे बड़े सहयोगी दल की नेता ममता को मनाने के लिए एक बार फिर से कोशिश शुरू हो गई है।
चौदह जुलाई को यूपीए की बैठक होनी है और इस बैठक में शामिल होने के लिए ममता को फोन किया गया है। खबर है कि ममता तो शामिल नहीं होंगी लेकिन उनके करीबी रेल मंत्री मुकुल रॉय बैठक में हिस्सा लेंगे।प्रमुख ममता बनर्जी व कांग्रेस में अब भी तनातनी बरकरार है।
राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए प्रणव मुखर्जी का विरोध करने के बाद दीदी अब उपराष्ट्रपति पद के लिए कांग्रेस की पसंद माने जा रहे हामिद अंसारी के विरोध में उतर आई हैं। सूत्रों की मानें तो अंसारी के नाम पर ममता ने विरोध के संकेत दे दिए हैं। बताया जा रहा है कि उपराष्ट्रपति पद के लिए ममता की पसंद पश्चिम बंगाल के पूर्व गवर्नर गोपाल कृष्ण गांधी हैं।
मालूम हो कि वर्तमान में हामिद अंसारी अब भी उपराष्ट्रपति पद पर आसीन हैं। अंसारी को दूसरा कार्यकाल देने को लेकर यू.पी.ए. अपना मन लगभग बना चुकी है। राष्ट्रपति पद के लिए पसंदीदा उम्मीदवारों में यू.पी.ए. की फेहरिस्त में अंसारी का नाम भी शामिल था लेकिन प्रणव मुखर्जी के नाम पर सहमति बनने के बाद वह इस दौड़ से बाहर हो गए।जानकारी के अनुसार ममता बनर्जी बीते साल के अंत में लोकपाल बिल पर बहस के दौरान राज्यसभा चेयरमैन के तौर पर हामिद अंसारी की भूमिका से नाखुश हैं।
जानकारी के अनुसार उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस अब उपराष्ट्रपति पद पर पश्चिम बंगाल के पूर्व गवर्नर गोपाल कृष्ण गांधी या कृष्णा बोस को चाहती है। तो दूसरी ओर दिल्ली और लखनऊ की बढ़ती नजदीकियों की बदौलत केंद्र सरकार ने अब उत्तर प्रदेश के लिए अपना खजाना खोल दिया है। राष्ट्रपति चुनाव में यूपीए के उम्मीदवार को सपा के समर्थन के वादे का यह नतीजा है।
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की ओर से प्रधानमंत्री को सौंपे 38 खतों में 93, 302.75 करोड़ रुपयों की मांगों की योजनाओं और क्षेत्रों के विकास की फेहरिस्त में से करीब 50 फीसदी को दिल्ली ने मान लिया है।
केंद्र सरकार ने सपा को खुश करने के लिए अपने दर्जन भर से ज्यादा सचिवों की फौज, उत्तर प्रदेश के पांच उच्चाधिकारियों की मांगें सुनने के लिए जुटा दी।अखिलेश ने उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए 90 हजार करोड़ रुपये के पैकेज की मांग की है। केंद्र सरकार हालांकि सभी मांगों को नहीं मान सकती, लेकिन ऐसा समाधान तलाशा जा रहा है, जिससे अन्य राज्यों के साथ 'यथा स्थिति' को नुकसान पहुंचाए बगैर एसपी का सहयोग हासिल किया जा सके।ममता को मिला ठेंगा। राष्ट्रपति चुनाव के लिए ऐसी खुली सौदेबाजी के बावजूद क्या आप समझते हैं कि देश में लोकतंत्र है?
नए बैंकिंग लाइसेंस पर जारी की गई ड्राफ्ट गाइडलाइंस पर बैंकों, एनबीएफसी और इंडस्ट्री ने आरबीआई को सुझाव भेजे हैं।
सुझाव है कि नए बैंक की न्यूनतम पूंजी 500 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 1000 करोड़ रुपये की जाए। साथ ही, प्रमोटरों को हिस्सेदारी घटाकर 40 फीसदी करने के लिए 3-5 साल का वक्त दिया जाए।लिस्टिंग की समय सीमा 2 साल की जगह 4-5 साल की जाए। एनआरआई की निवेश सीमा 5 फीसदी से बढ़ाकर 25 फीसदी करने का सुझाव दिया गया है।इसके अलावा इंफ्रा फाइनेंस कंपनियों को सीआरआर, एसएलआर और प्राइऑरिटी सेक्टर के नियमों में छूट देने की बात भी की गई है।
समाचार ऐजेंसी पीटीआई के मुताबिक भारतीय वाणिज्ज उद्योग परिसंघ फिक्की ने कहा है कि अगर भारत की सरकार 45 लाख करोड़ रुपए के काले धन को विदेश से देश ले आए, तो भारत की अर्थव्यवस्था को काफी फायदा हो सकता है।
भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय मंदी से जूझ रही है और ऐसी आशंका है कि चालू वित्तीय वर्ष के सकल घरेलू उत्पाद में 5.13 लाख करोड़ रुपए का घाटा हो सकता है।अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए फिक्की द्वारा बनाई गई एक 12-बिंदु की योजना में संगठन का कहना है कि उसके आकलन के मुताबिक 45 लाख करोड़ रुपए का काला धन विदेशी बैंकों में जमा है, जो कि भारत के सकल घरेलु उत्पाद का करीब 50 प्रतिशत का हिस्सा है और भारत के वित्तीय घाटे का लगभग नौ गुना है।
संगठन का कहना है कि अगर इस काले धन का 10 प्रतिशत हिस्सा भी भारत में आ जाए, तो उससे भारतीय अर्थव्यवस्था को काफी फायदा हो सकता है। हालांकि संगठन ने ये स्पष्ट नहीं किया कि वो 45 लाख करोड़ के इस आंकड़े पर किस आधार पर पहुंची।
इस बीच महंगाई को लेकर मध्य वर्ग पर टिप्पणी कर चिदंबरम विपक्ष के साथ-साथ सत्ता पक्ष के साझेदारों के निशाने पर आ गए हैं। चिदंबरम ने महंगाई पर विवादित बयान देकर जो चिंगारी जलाई थी अब उसमें आग एनडीए के संयोजक शरद यादव ने यह कहकर सुलगाने में जुट गए हैं उन्होने आज कहा अगर देश में ''कारों के दाम बढ़ते हैं तब तो हंगामा नहीं मचता लेकिन जब सब्जियों और अनाज के दाम बढ़ते हैं तो हंगमा खड़ा हो जाता है।''
यादव ने कहा है कि आखिर चिदंबरम ने क्या गलत कहा है। वहीं दूसरी तरफ चिदंबरम ने अपने बचाव में कहा कि उनकी बात को गलत संदर्भों में पेश किया गया। पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) ने बाकायदा उनकी सफाई वाला बयान पेश किया। केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदम्बरम ने सफाई दी कि उन्होंने महंगाई पर शहरी मध्य वर्ग का मजाक नहीं उड़ाया, बल्कि उन्होंने 'तथ्यात्मक' बात कही।
चिदंबरम ने कहा है कि उन्होंने जो बयान दिया था उसमें किसी का मजाक नहीं उड़ाया गया था।ग़ौरतलब है कि चिदम्बरम ने बेंगलुरू में कहा था कि हम पानी की एक बोतल के लिए 15 रुपये देने को तैयार रहते हैं, जबकि चावल और गेहूं में प्रति किलोग्राम एक रुपये की वृद्धि भी हम बर्दाश्त करने को तैयार नहीं होते।
बयान में कहा गया है कि केंद्रीय गृह मंत्री ने तथ्यात्मक बयान दियाग़ौरतलब है कि चिदम्बरम ने बेंगलुरू में कहा था कि हम पानी की एक बोतल के लिए 15 रुपये देने को तैयार रहते हैं, जबकि चावल और गेहूं में प्रति किलोग्राम एक रुपये की वृद्धि भी हम बर्दाश्त करने को तैयार नहीं होते।उन्होंने किसी का मजाक नहीं उड़ाया और न ही किसी की आलोचना की।
उन्होंने केवल तथ्यात्मक बातें कही।उस बयान पर सफाई देते हुए चिदम्बरम ने यह भी कहा कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में वृद्धि के कारण पेट्रोल का मूल्य बढ़ाया गया था, लेकिन मध्य वर्ग के हितों को ध्यान में रखते हुए इसे दो बार कम किया गया।
चिदंबरम ने नया बयान जारी कर कहा, "जिस तरह से बैंगलोर में 10 जुलाई को हुई मीडिया ब्रीफिंग के सवाल जवाब को तोड़ा मरोड़ा गया उससे मैं हैरान और आहत हूं। मैंने तथ्यों पर आधारित बयान दिया था।
मैंने किसी का मजाक नहीं उड़ाया और न ही किसी की आलोचना की।"उन्होंने आगे कहा, "मैने हम शब्द का इस्तेमाल किया था मैंने ये नहीं कहा था कि लोग महंगाई पर इतना शोर क्यों मचाते हैं। मैंने ये नहीं कहा था कि जब किसानों के लिए कदम उठाए गए हों तो महंगाई पर किसी को शिकायत नहीं करनी चाहिए।
"उन्होंने बुधवार को कहा कि मीडिया ने उनके बयान को तोड़मरोड़ कर पेश किया। चिदम्बरम ने बयान जारी कर कहा है कि वह बेंगलुरू में मंगलवार को अपने संवाददाता सम्मेलन के दौरान एक सवाल के जवाब में कही गई बात को गलत तरीके से पेश किए जाने से हैरान हैं।
रेटिंग एजेंसी फिच ने अमेरिका की साख शीर्ष स्तर 'एएए' पर बरकरार रखा है। हालांकि, एजेंसी ने बढ़ते बजट घाटे को कम करने के लिए राजनीतिक सहमति नहीं बन पाने का हवाला देते हुए आउटलुक 'निगेटिव' बनाए रखा है। 'एएए' सर्वाधिक निवेश ग्रेड की रेटिंग है।
फिच ने कहा है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था संपन्न और अधिक उत्पादक है। इसलिए इसकी रेटिंग को पहले के स्तर पर बरकरार रखा गया। इसके साथ ही अन्य विदेशी मुद्राओं की तुलना में डॉलर में असाधारण रूप से वित्तीय लचीलापन भी अमेरिकी साख को मौजूदा स्तर पर बनाए रखने में मददगार साबित हुआ।
एजेंसी का कहना है कि वित्तीय सेक्टर से आर्थिक जोखिम में कमी आई है। हालांकि, फिच ने बजट घाटे में कमी आने के लिए राजनीतिक स्तर पर सहमति नहीं बना पाने से अमेरिका के क्रेडिट आउटलुक को निगेटिव स्तर पर बनाए रखा है। फिच ने कहा कि संघीय कर को लेकर अनिश्चितता और राजकोषीय समस्याओं से जुड़ी नीतियां अल्प अवधि में आर्थिक अस्थिरता को बढ़ाती है। यह एक और आर्थिक सुस्ती की आशंका की ओर संकेत करता है।
फिच ने कहा कि अर्थव्यवस्था पर सरकारी कर्ज का दबाव बना रहेगा और यदि घाटे पर कोई समझौता नहीं हुआ तो आर्थिक वृद्धि को नुकसान पहुंच सकता है। प्रमुख रेटिंग एजेंसियां अमेरिकी सरकार को आगाह करती रही हैं कि अगर घाटा में कमी के लिए उपाय नहीं किए जाते तो साख घटाई जा सकती है।
इसके विपरीत गौरतलब है कि रेटिंग एजेंसी फिच ने भारत का आउटलुक स्टेबल से घटाकर निगेटिव कर दिया है। फिच के मुताबिक भारत को ग्रोथ बनाए रखने में मुश्किल के कारण आउटलुक निगेटिव किया गया है। हालांकि फिच ने भारत की बीबीबी- रेटिंग बरकरार रखी है।फिच ने भारत को चेतावनी देते हुए कहा है कि आर्थिक सुधार के कदम जल्द नहीं उठाए गए तो ग्रोथ घटेगी।
सरकार की ओर से वित्तीय घाटा कम करने के लिए बड़े पैमाने पर कोशिशें नहीं की जा रही हैं।फिच का मानना है कि भारत में ग्रोथ की रफ्तार सुस्त है और महंगाई दर बढ़ रही है। भ्रष्टाचार और धीमे आर्थिक सुधारों के कारण आउटलुक निगेटिव किया है।
समान रेटिंग वाले देशों के मुकाबले भारत का सरकारी घाटा दोगुना हो गया है। वित्त वर्ष 2013 में 5.1 फीसदी वित्तीय घाटे का लक्ष्य हासिल नहीं होगा। वित्तीय घाटा 5.1 फीसदी के मुकाबले 5.9 फीसदी तक जाने की आशंका है।
फिच ने वित्त वर्ष 2013 में भारत का जीडीपी ग्रोथ 7.5 फीसदी से घटाकर 6.5 फीसदी कर दिया है। एक और दिग्गज रेटिंग एजेंसी एसएंडपी ने भारत का आउटलुक निगेटिव किया था।

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