Thursday, July 12, 2012

दारा सिंह गैर-मामूली इंसान थे, उनका जाना उदास करता है

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दारा सिंह गैर-मामूली इंसान थे, उनका जाना उदास करता है

12 JULY 2012 NO COMMENT

♦ उदय प्रकाश


बायें से दायें : संजय गांधी, दारा सिंह के भाई सरदार सिंह रंधावा, राजीव गांधी, इंदिरा गांधी, दारा सिंह और अमिताभ बच्‍चन

दारा सिंह का न रहना दुखद है। अगर वे 1928 की बजाय 1988 में पैदा होते, या अगर WWF 1958 में शुरू हो गया होता, तो दारा सिंह अरबपति हो गये होते। आइपीएल में खेल कर करोड़ों बटोरने वाले बल्लेबाजों गेंदबाजों से कई गुना ज्यादा रुपया उनके पास होता। बिग बी और क्रिकेट के भगवान से भी अधिक महंगी कार उनके पास होती। तब खली से भी बली वे होते।

हमलोग बहुत बचपन में थे, जब वे मशहूर हो गये थे। उन दिनों 'ब्लिट्ज' अखबार, जिसके संपादक आर के करंजीया थे, के आखिरी पेज पर अक्सर दारा सिंह के किस्से छपते थे। किंगकांग को फ्री स्टाइल कुश्ती में उन्‍होंने 'काला-पंजा' नामक दांव लगा कर हराया था और उससे चैंपियनशिप की बेल्ट छीन ली थी। एक बार कहीं से एक 'असली' दारा सिंह प्रकट हो गया था, जिसने इस 'नकली दारा सिंह' को चुनौती दी थी। उसका दावा था कि बीच में वह कहीं चला गया था या किसी जेल में बंद था, उसका फायदा उठाकर ये वाला दारा सिंह नाम कमा रहा था। दोनों की कुश्ती देखने के लिए, पता नहीं किस शहर में, शायद मुंबई में, बहुत भीड़ उमड़ी थी और खूब टिकट बिके थे। ये बात 'ब्लिट्ज' समेत उस समय के कई अखबारों में छपी थी। वो शायद नूरा कुश्ती का शुरुआती दौर था, जो आगे चल कर WWF जैसे इवेंट में तब्दील हुआ। (बाद में किसी ने बताया की वो 'असली' दारा सिंह कोई और नहीं, उन्हीं का अपना छोटा भाई सरदारा सिंह रंधावा था, जो बाद में कई स्टंट फिल्मों में रंधावा के नाम से प्रसिद्ध हुआ। मुमताज के साथ दोनों भाइयों ने हीरो का रोल किया था।)

रामानंद सागर के रामायण के हनुमान ही नहीं, शायद किसी फिल्म में महाभारत के भीम भी वही बने थे, जिनका एक डायलाग अक्सर पंजाबी हिंदी के उदाहरण के बतौर पेश किया जाता है – 'हे ए भगवाण … तूं मेरी केसी परीक्सा ले रहे हो…?' जैसे हिंदी आलोचकों-अध्यापकों की अपनी हिंदी होती है, वैसे दारा सिंह की भी अपनी हिंदी होती थी।

पता नहीं उन्हें हनुमान ही क्यों बनाया जा रहा है। हो सकता है इसलिए… क्योंकि वे भाजपा द्वारा राज्यसभा के सांसद बनाये गये थे, और आज के माहौल में 2014 के चुनावों को ध्यान में रखते हुए यही इमेज खास फायदा पहुंचा सकता है। वरना तो अंडे और संडे मंडे वाला विज्ञापन भी कम लोकप्रिय नहीं हुआ था। अंडे को शाकाहारी और लाभकारी बनाने के प्रचार में दारा सिंह की भी बड़ी भूमिका थी।

उनका जाना उदास करता है। यह भी जानना कम उदास नहीं करता कि जिस पंजाब में हरित क्रांति हुई और जहां की खेती ने भारत को अनाज के मामले में अपने पैरों पर खड़ा किया, उसी पंजाब में खेती और पहलवानी छोड़ कर उन्हें मुंबई जाना पड़ा, जो भारत की व्यावसायिक राजधानी कही जाती है। वहां जाकर उन्‍होंने धन कमाया, लेकिन 'असली' दारा सिंह की असली कुश्ती के जरिये नहीं, बल्कि असली के 'अभिनय' के जरिये…

छोटे या बड़े पर्दे पर जो भी दिखता है, वह 'नकल' और 'नकली' ही होता है।

अगर वे इन पर्दों पर न आते तो क्या इतने मशहूर हो सकते थे। आखिर भिंड-मुरैना के चैंपियन एथलीट पानसिंह तोमर को भी लोगों ने तभी जाना, जब वह बड़े पर्दे पर असली पान सिंह की नकल बन कर आया।

हमारी पीढ़ी के लोग भाग्यशाली हैं कि उन्‍होंने दारा सिंह को तब से जाना था, जब उनमें बहुत कुछ असल भी था।

(उदय प्रकाश। मशहूर कवि, कथाकार, पत्रकार और फिल्मकार। कई कृतियों के अंग्रेजी, जर्मन, जापानी एवं अन्य अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में अनुवाद उपलब्ध। लगभग समस्त भारतीय भाषाओं में रचनाएं अनूदित। 'उपरांत' और 'मोहन दास' के नाम से इनकी कहानियों पर फीचर फिल्में भी बन चुकी हैं। उनसे udayprakash05@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)


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