गलत दिशा में आगे जा रहा है देश

भारत के करीब 38 फीसद लोग ही मानते हैं कि देश सही दिशा की ओर जा रहा है। इससे यह बात साफ है ज्यादातर लोगों का मानना है कि देश की दिशा सही नहीं है। देश की इस बिगड़ी दिशा के लिए जनता सरकार को दोषी मानती है। जबकि कुछ हालातों के लिए खुद की भी आलोचना करती है। यह बात अमेरिकी थिंक टैंक प्यू रिसर्च सेंटर के 21 देशों पर किए सर्वेक्षण में सामने आई है।
2011 में देश की दिशा से संतुष्ट लोगों का आंकड़ा 51 फीसद था। इस मामले में चीन हमसे आगे है वहां करीब 82 फीसद लोगों का मानना है कि उनका देश सही दिशा की ओर बढ़ रहा है।
अमेरिकी थिंक टैंक प्यू रिसर्च सेंटर का यह सर्वेक्षण कांग्रेस सरकार और उनके नेतृत्व के लिए दूसरा झटका है इससे पहले टाइम मैगजीन ने भी मनमोहन सिंह के नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाए थे। जिसके बाद कांग्रेस नेतृत्व की सरकार और मनमोहन सिंह की काबलियत पर हर जगह चर्चा गर्म हो गई थी। अब इस सर्वेक्षण ने देश के लोगों की मनोदशा को जगजाहिर कर दिया है। इस सर्वेक्षण से साफ पता चलता है कि देश की जनता की नजर में देश का हाल पहले से बुरा हो गया है। और जनता सरकार की नीतियों से खुश नहीं है। सरकार की बनाई नीतियों से लगातार महंगाई बढ़ रही है। प्रधानमंत्री हर बार तीन महीने बाद महंगाई कम होने का दिलासा देते हैं पर होता कुछ भी नहीं है। सर्वेक्षण में भी 92 फीसद लोगों का मानना है कि देश के ऐसे हाल के लिए सरकार जिम्मेदार है।
सरकार को भी इस बात का एहसास है कि देश सही दशा में नहीं जा रहा है। करीब एक महीने पहले ही अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पूअर्स ने चेतावनी दी थी कि यदि भारत आर्थिक सुधार नहीं करता तो वह पूँजी निवेश से संबंधी इनवेस्टमेंट ग्रेड रेटिंग को गंवा सकता है। अप्रैल में स्टैडर्ड एंड पूअर्स ने भारत की क्रेडिट रेटिंग को सामान्य से घटाकर निगेटिव (यानी बीबीबी माइनस) कर दिया था। इसके अलावा अप्रैल में भारत में औद्योगिक विकास दर मामूली बढ़त के साथ 0.1 फीसद रही। जिसके बाद तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने निराशा जताई थी। यही औद्योगिक विकास दर पिछले साल अप्रैल में 5.3 फीसद थी। सरकार को इन बातों का एहसास होने के बाजूद कोई ठोस कदम उठाने के बजाय वे उटपटांग बयान देने से नहीं चूकते हैं।
इस सर्वेक्षण में एक खास बात और है। कि भारतीय खुद की भी आलोचना करते हैं। और 64 फीसद स्थतियों को लिए खुद को जिम्मेदार मानते हैं। अगर पिछले एक साल पर नजर ड़ाले तो पता चलता है कि देश भ्रष्टाचार और घोटालों के प्रति जागृत हुआ है। अब आम जनता इन मामलों पर और अपनी गतलियों पर खुल कर बात कर रही है। देश की जनता चाहती है कि वे खुद और सरकार दोनों ही जिम्मेदार बने। यह कहीं न कहीं सही भी है क्योंकि सरकार हमारे द्वारा ही चुनी जाती है। और जल्दी काम करवाने के चक्कर में हम घूस देने से भी पीछे नहीं हटते। लेकिन पिछले एक साल में स्थिति में थोड़ा बदलाव आया है। पिछले साल हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बाद कई जगह सार्वजनिक तौर घूस न लेने की कसम खाई गई थी। इसमें आम जनता और सरकारी कर्मचारी दोनों ही शामिल थे। अब देखनेवाली बात होगी कि सरकार इन आलोचनाओं से क्या सबक लेती है।

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