तय करो किस ओर हो! FB की ओर हो या फेल्डा की ओर हो?

♦ अरविंद कुमार सेन
वैश्विक बिजनेस हलकों में पीटरनोस्टर स्कवैयर से लेकर वालस्ट्रीट तक फेसबुक बनाम फेल्डा की गरमागरम बहस थमने का नाम नहीं ले रही है। एक तरफ दुनिया के आका अमेरिका की बहुप्रचारित कंपनी फेसबुक है, जिसका आईपीओ बाजार में आने से पहले ही पूरे पश्चिमी मीडिया ने कंपनी की शान में कसीदे काढ़ने का अभियान छेड़ दिया था। फेसबुक को शेयर बाजार के मैदान में पछाड़ने वाली कंपनी उभरते एशिया की मलेशियाई पाम ऑयल कंपनी फेल्डा (फेडरल लैंड डवलपमेंट ऑथोरिटी) है, जिसके आईपीओ ने निवेशकों पर मुनाफे की बारिश कर दी है। फेल्डा की सफलता ने शेयर बाजार के इस बुनियादी सिद्धांत पर दोबारा मोहर लगायी है कि चाहे बाजार कितना ही डावांडोल हो, निवेशक मजबूत आधार और सुनहरे भविष्य वाली कंपनी में खुलकर पैसा लगाते है। फेल्डा की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस पाम ऑयल कंपनी का आईपीओ मौजूदा साल में एशिया का सबसे बड़ा और वैश्विक स्तर पर फेसबुक के बाद दूसरा सबसे बड़ा साबित हुआ है। यह आलम तब है जबकि फेसबुक का आईपीओ आने से पहले ही पश्चिमी बिजनेस मीडिया ने निवेशकों का एजेंडा तय करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, मगर इसके बावजूद फेसबुक का आईपीओ पहले हफ्ते में ही धराशायी हो गया था।
कुआलालमपुर मुख्यालय वाली फेल्डा की अनुषंगी कंपनी फेल्डा ग्लोबल वेंचर्स होल्डिंग (एफजीवीएच) पाम के खेतों के हिसाब से दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी पाम ऑयल कंपनी है। सरकारी मालिकाना हक वाली यह कमोडिटी कंपनी पाम ऑयल शोधन, रबर और गन्ने का कारोबार करती है लेकिन कंपनी का पाम ऑयल के कारोबार में फेल्डा का एकाधिकार है। गरीब जनता को रोजगार देने के मकसद से जुलाई 1956 में फेल्डा का गठन किया गया था और इस कंपनी के पास 8,88,000 हैक्टेयर इलाका है, जिसके 90 फीसदी भाग पर पाम ऑयल की खेती की जाती है। फेल्डा में किसानों की सीधी हिस्सेदारी है और ज्यादातर किसान मलय मुस्लिम (मलेशियाई आबादी के दो-तिहाई) नस्ल के हैं। जाहिर है, किसानों की यह बड़ी तादाद मलेशिया का मस्तकबिल तय करने में अहम भूमिका निभाती है और यही वजह है कि मौजूदा प्रधानमंत्री नजीब रज्जाक ने आईपीओ से जुटाया गये धन का हिस्सा किसानों तक पहुंचाने में कोताही नहीं बरती है। मलेशियाई जनता आगामी सितंबर में नयी सरकार चुनेगी और चुनावी समीकरणों को अपने पक्ष में करने के लिए चीनी व भारतीय मूल के लोगों की रहनुमाई करने वाले विपक्षी नेता अनवर इब्राहिम ने भी फेल्डा के मुनाफे में किसानों की हिस्सेदारी का मामला जोर-शोर से उठाया। प्रधानमंत्री नजीब रज्जाक ने फेल्डा की शेयर बाजार में लिस्टिंग के बाद 527 लाख डॉलर किसानों को देने का ऐलान किया और फेल्डा ने अपने 20 फीसदी शेयर किसान ट्रस्ट को आवंटित कर दिये है, जिनका सालाना डिवीडेंड किसानों को मिलता रहेगा।
किसानों को मुनाफे में सीधा भागीदार बनाकर फेल्डा ने भविष्य का विकास सुरक्षित कर लिया है लेकिन इस पाम ऑयल दिग्गज की सफलता की और भी वजहें हैं। दुनिया की आबादी व आमदनी बढ़ने के साथ ही खाने की मांग बढती जा रही है और खाने की मांग में बढ़ोतरी होने के साथ ही फेल्डा की बैलेंसशीट भी मोटी होती जा रही है। न्यूट्रिएंट की चाह तेजी से डाइट डायवर्सिफिकेशन हो रहा है और इसी कारण 2005 में सोया ऑयल को पछाड़कर 30 फीसदी हिस्सेदारी के साथ पाम ऑयल दुनिया में सबसे ज्यादा खपत वाला खाद्य तेल बन गया। ग्लोबल पाम ऑयल डिमांड में भारत, चीन, इंडोनेशिया और पाकिस्तान की आधे से ज्यादा हिस्सेदारी और फेल्डा में निवेशकों की दिलचस्पी की एक वजह यह भी है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य तेल आयातक व उपभोक्ता देश है, वहीं भारत में क्रुड ऑयल के बाद सबसे ज्यादा आयात की जाने वाली चीज पाम ऑयल है। शहरीकरण बढ़ने के साथ ही फूड हैबिट्स बदलती जाएंगी और बाहर खाने का चलन पाम ऑयल की मांग में इजाफा करता रहेगा। चूंकि पाम ऑयल की खपत वाली एशियाई अर्थव्यवस्थाओं का आकार बढ़ने के साथ ही फेल्डा के मुनाफे में इजाफा होता जाएगा, लिहाजा यूरोप और अमेरिका में हाथ जलाये बैठे निवेशक फेल्डा में पैसे झौंक रहे हैं।
क्लाइमेट चेंज के खतरे से निपटने के लिए दुनियाभर में सरकारें बायोडीजल का रुख कर रही हैं और यहां भी एक बार फिर बाजी पाम ऑयल के पक्ष में जाती है। एफएमसीजी (फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स) उत्पाद बनाने वाली कंपनी यूनीलीवर दुनिया की सबसे बड़ी पाम ऑयल उपभोक्ता है क्योंकि सौंदर्य प्रसाधन से लेकर पर्सनल केयर उत्पाद और साबुन जैसी कई रोजाना इस्तेमाल होने वाली चीजों को बनाने में पाम ऑयल का इस्तेमाल किया जाता है। दरअसल पाम ऑयल का कारोबार करने वाली फेल्डा जैसी कमोडिटी कंपनी का इस्तेमाल निवेशक एक तरह से रियल स्टेट और इक्विटी को काउंटर बैलेंस करने के लिए हैजिंग (जोखिम से प्रतिरक्षा) के रूप में कर रहे हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था चाहे कितने भी गहरे संकट में फंस जाए, खाने की मांग कम नहीं होगी। लोग जिंदा रहेंगे तो भोजन करना ही पड़ेगा और उम्दा क्वालिटी के सबसे सस्ते खाद्य तेल के रूप में पाम ऑयल को इसका फायदा मिलेगा। फेल्डा की सबसे बड़ी ताकत है मलेशिया सरकार से मिलने वाला बेशुमार सियासी समर्थन। पाम ऑयल मलेशियाई अर्थव्यवस्था का चौथा सबसे बड़ा उद्योग है, ऐसे में कोई भी सरकार इस उद्योग की विदाई का जोखिम नहीं उठा सकती है। मलेशिया की बड़ी आबादी को गरीबी से बाहर निकालने में पाम ऑयल की नकदी फसल ने अहम भूमिका निभायी है और यह फेल्डा को मलेशियाई जनता से मिल रहा समर्थन ही है कि प्रधानमंत्री नजीब रज्जाक ने खुद कंपनी की लिस्टिंग प्रोसेस की शुरुआत की।
फेल्डा ने मलेशिया के अलावा इंडोनेशिया समेत दूसरे दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों और अफ्रीका में तेजी से पाम ऑयल साम्राज्य का विस्तार करके 2020 तक दुनिया की नंबर वन कमोडिटी कंपनी बनने का लक्ष्य तय किया है। दोहरी मंदी की आशंका से शेयर बाजारों में मची भगदड़ से बिदक कर दुनिया के रईसों की दुलारी मोटर रेसिंग कंपनी फार्मूला वन समेत दूसरे कई बड़े नामों ने बाजार में लिस्टेड होने की योजनाएं टाल दी हैं। वहीं एक पाम ऑयल कंपनी की सफलता ने साबित कर दिया है कि निवेशक गिरावट के दौर में भी सही जगह पर खरीददारी करने को तैयार हैं और पश्चिमी बिजनेस मीडिया के इनवेस्टमेंट गुरू किसी कंपनी को सफल नहीं बना सकते हैं। मलेशिया की अर्थव्यवस्था से कई गुना बड़ा अर्थशास्त्रियों से अटा पड़ा खाद्य तेल आयातक देश भारत क्या फेल्डा की सफलता से कोई सबक सीख सकता है?
(अरविंद कुमार सेन आर्थिक पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं।)
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