राजेंद्र यादव के नाम महेंद्र राजा जैन का खुला पत्र
श्री यादव जी
उस दिन जब मैं एक बहुत ही जरूरी बात करने आपके कार्यालय में पहुंचा ही था कि आपने कहा कि मैं मुकदमेबाज हूं। यह सुनकर मेरा हतप्रभ रह जाना स्वाभाविक था क्योंकि आपके संबंध में अभी तक मेरी यही धारणा थी कि किसी भी प्रश्न पर आप सभी पक्षों पर विचार करने के बाद ही कोई निर्णय लेते हैं। जो कुछ भी हो, प्रतिक्रियास्वरूप जब मैंने केवल इतना कहा कि 'आपके पास तो हंस है। आपको यदि किसी से कुछ शिकायत होती है तो आप तुरंत आठ-दस पृष्ठों का संपादकीय लिखकर बदला ले लेते हैं। पर मेरे पास क्या है। आप बतलाइए कि मैं अदालत के सिवा और कहां जा सकता हूं। ' आप इसका क्या जवाब देते? आपने कोई जवाब नहीं दिया। और बात आई गई हो गई। लेकिन उसके बाद मेरे मन में बराबर यह बात रही कि मेरे संबंध में यदि आपकी यह धारणा बन गई है तो कुछ अन्य लोग भी शायद यही सोचते हों। अत: मैं जरूरी समझता हूं कि आपके मन में यदि मेरे प्रति यह गलतफहमी घर कर गई है तो उसे दूर किया जाना चाहिए।
इसमें कोई संदेह नहीं कि आपके मन में मेरे मुकदमेबाज होने संबंधी जो धारणा बनी है वह निश्चय ही जनसत्ता में भारतीय ज्ञानपीठ और भारत भारद्वाज इन दोनों के विरुद्ध अलग-अलग जमानती वारंट निकलने संबंधी समाचारों को पढ़कर हुई है। पर शायद आप भूल गए कि दैनिक पत्रों के समाचारों में सभी बातें विस्तार से नहीं दी जातीं। अत: पहले मैं इन्हीं के संबंध में अपनी बात कहना चाहूंगा।
भारतीय ज्ञानपीठ के खिलाफ मुकदमा शुरू करना कोई हंसी खेल नहीं है। इसे मैं 'दिया और तूफान की लड़ाई' ही कहना चाहूंगा क्योंकि आजकल पैसे के बल पर क्या नहीं किया जा सकता—यह बतलाने की आवश्यकता नहीं। फिर भी मुझे विश्वास था और है कि मेरे पास जो साक्ष्य हैं उनके बल पर भारतीय ज्ञानपीठ के पदाधिकारियों को झूठा, धोखेबाज और छलकपट करने वाला साबित किया जा सकता है। अब आप देख ही रहे हैं कि मेरी इस बात की पुष्टि अदालत द्वारा भारतीय ज्ञानपीठ के खिलाफ जमानती वारंट निकलने से हुई है।
किसी प्रकाशक द्वारा किसी व्यक्ति से कोई पुस्तक तैयार करने के लिए अनुबंध करना और जब पुस्तक लगभग पूरी तैयार हो जाए तो बिना कोई कारण बतलाए उसे एकाएक रुकवा देना और यह कहकर भुगतान नहीं करना कि जब कोई काम किया ही नहीं तो भुगतान कैसा और बाद में काम किए जाने का प्रमाण मिलने पर यह कहना कि किए गए काम में गलतियां थीं (वस्तुत: किए गए काम में पृष्ठों का हेरफेर कर और मैटर बदलकर यह आरोप लगाया गया) क्या धोखाधड़ी नहीं है? यहां यह जानना भी जरूरी है कि यह सब निदेशक की शह पर उस व्यक्ति यानी मुख्य प्रकाशन अधिकारी द्वारा किया गया जो पहले अपने द्वारा हस्ताक्षरित रिपोर्ट में तब तक किए गए कार्य पर संतोष प्रगट कर चुका था और लिख चुका था कि अब तक किए गए कार्य की जांच कर ग्यारह खंडों को फाइनल रूप दिया जा चुका है। इतना ही नहीं इसके बाद दोनों पक्षों द्वारा आपसी सहमति से एक निश्चित रकम (जो मूल दावे की रकम से लगभग आधी थी) पर राजी होने के बाद भी भुगतान करने में तरह-तरह की अड़ंगेबाजी करने को आप धोखाधड़ी के अलावा और क्या कहेंगे?
आप स्वयं प्रकाशक हैं और किसी से कोई पुस्तक तैयार करने को कहते हैं, तो इसका अर्थ क्या यह भी नहीं है कि पुस्तक तैयार हो जाने पर उसे प्रकाशित किया जाएगा। यानी कोई प्रकाशन पांडुलिपि का अचार डालने के लिए पुस्तक तैयार नहीं कराता। पर शायद भारतीय ज्ञानपीठ कुछ दूसरे ही खयाल का है। तभी तो मुख्य प्रकाशन अधिकारी को कहना पड़ा कि पुस्तक प्रकाशित करने न करने का निर्णय करना हमारा काम है। आपको तो अपने पैसे से मतलब होना चाहिए। क्या यह भी धोखाधड़ी या अमानत में खयानत नहीं है? क्या केवल पचास हजार रु. यानी प्रति माह मात्र रु. 1300 के लिए मैं तीन वर्ष तक इंडेक्स बनाने में दिमाग खपाता रहा?
भारतीय ज्ञानपीठ ने लगभग छह वर्ष पूर्व मेरी पुस्तक 'विराम चिह्न : क्यों और कैसे?' प्रकाशन के लिए स्वीकृत की थी। दो बार पुस्तक में आवश्यक संशोधन के लिए मुझे दिल्ली बुलाया। इस बीच वर्तमान निदेशक एवं मुख्य प्रकाशन अधिकारी द्वारा लिखित आश्वासन मिलता रहा कि वे जल्दी से जल्दी प्रकाशित करने की कोशिश में हैं। मेरे द्वारा चार बार प्रूफ देखे जाने के बाद मुख्य प्रकाशन अधिकारी ने कवर के लिए मेरा परिचय, ब्लर्ब और फोटो मंगाया। बाद में मुझे भारतीय ज्ञानपीठ के आजीवन न्यासी द्वारा प्रबंध न्यासी को लिखे गए पत्र की फोटोकापी मिली जिससे पता चला कि उनकी दृष्टि में मेरी पुस्तक बिलो ऐवरेज है, ज्ञानपीठ की प्रतिष्ठा के अनुकूल नहीं है और नहीं छपना चाहिए पर यदि मैं भारतीय ज्ञानपीठ के न्यासियों को पत्र लिखकर 'अपने द्वारा किए गए कृत्य' [कौन सा कृत्य और कैसा कृत्य यह स्पष्ट नहीं] के लिए माफी मांग लूं तो पुस्तक छप सकती है। इसके बाद बिना कोई कारण बतलाए वर्तमान निदेशक ने यह कहकर पुस्तक वापस कर दी कि पुस्तक छपेगी भी या नहीं या कब तक छपेगी कहना मुश्किल है। क्या यह लेखक के साथ स्पष्ट धोखाधड़ी और अमानत में खयानत का केस नहीं है?** [**बाद में यह पुस्तक किताबघर से छह माह के अंदर प्रकाशित हुई और पहला संस्करण एक वर्ष के अंदर समाप्त हो गया। ]
मैं बतला देना चाहता हूं कि यह मुकदमा पैसे को लेकर नहीं वरन सिद्धांत को लेकर है और इससे निश्चय ही मेरे जैसे कुछ अन्य लोगों को कुछ करने की पे्ररणा मिलेगी। फिर भी मैं कहना चाहूंगा कि यदि कोई अनायास से धोखाधड़ी कर मेरा एक पैसा भी दबा लेता है तो वह एक पैसा वसूल करने के लिए मैं एक सौ रु. या अधिक भी खर्च करने को तैयार रहता हूं (इसे आप मेरी मूर्खता भी कह सकते हैं) जैसा कि बहुवचन वाले केस में किया जा रहा है।
भारतीय ज्ञानपीठ ने लगभग छह वर्ष पूर्व मेरी पुस्तक 'विराम चिह्न : क्यों और कैसे?' प्रकाशन के लिए स्वीकृत की थी। दो बार पुस्तक में आवश्यक संशोधन के लिए मुझे दिल्ली बुलाया। इस बीच लिखित आश्वासन मिलता रहा कि वे जल्दी से जल्दी प्रकाशित करने की कोशिश में हैं। मेरे द्वारा चार बार प्रूफ देखे जाने के बाद कवर के लिए मेरा परिचय, ब्लर्ब और फोटो मंगाया। बाद में पत्र की फोटोकापी मिली जिससे पता चला कि उनकी दृष्टि में मेरी पुस्तक बिलो ऐवरेज है, ज्ञानपीठ की प्रतिष्ठा के अनुकूल नहीं है और नहीं छपना चाहिए।
बहुवचन में उसके तत्कालीन संपादक के आग्रह पर मैंने लंदन से एक बहुत ही सामयिक लंबा लेख कूरियर से भेजा जो उन्होंने प्रमुखता से प्रकाशित किया। कुछ माह बाद भारत लौटने पर पता चला कि लगभग उसी समय 'छिनाल' प्रसंग छिड़ गया था और शायद इसी कारण बहुवचन के तत्कालीन संपादक को हटा दिया गया। यह भी पता चला कि उस अंक में प्रकाशित सभी लेखकों को पारिश्रमिक मिल चुका था पर मुझे नहीं मिला था। पहले मैंने संपादक से इस विषय में पूछा तो उन्होंने कहा कि पारिश्रमिक के लिए लेखकों की सूची में मेरा नाम भी था। मैं सीधे वर्धा लिखकर पूछूं। मैंने पहले लेखाधिकारी को, बाद में प्रकाशन अधिकारी को और अंत में कुलपति महोदय को लिखा। किसी की ओर से उत्तर नहीं मिलने पर वकील का नोटिस भिजवाया। नोटिस मिलते ही उन लोगों को शायद अपनी गलती का पता चला और कुछ समय बाद पारिश्रमिक भिजवा दिया पर वकील का नोटिस भेजने और अन्य दीगर बातों का खर्च नहीं दिया। यानी पारिश्रमिक वसूल करने के लिए मुझे जो लगभग तीन हजार रु. खर्च करना पड़ा वह भी उन्हें देना चाहिए था पर उन्होंने देने से मना कर दिया। अब उसे वसूल करने के लिए वाद दाखिल किया जा चुका है।
जहां तक भारत भारद्वाज की बात है, तो आपको मालूम होना चाहिए कि उन्हें वकील का नोटिस भिजवाने के पहले मैंने भरसक कोशिश की कि बात आगे न बढऩे पाए और भारत भारद्वाज अपनी गलती मानकर भूल सुधार कर लें। पर नहीं, उन्होंने तो मेरे पत्रों का उत्तर देना तक ठीक नहीं समझा जब कि कांतिकुमार जैन सार्वजनिक रूप से विज्ञप्ति छपाकर अपनी गलती मानकर खेद प्रगट कर चुके थे और प्रकाशक भी पुस्तकों की बिक्री रुकवाकर उनमें से आपत्तिजनक अंश हटवा चुका था। इसके बावजूद भारत भारद्वाज अपने हठ पर अड़े रहे। ऐसी स्थिति में मैं और क्या कर सकता था?
कुछ समय पूर्व मैनेजर पांडेय ने मेरी पत्नी डॉ. उर्मिला जैन को बताया कि उन्होंने उनकी कविता एक संग्रह में देखी है। उर्मिला जी को इसकी कोई जानकारी नहीं थी। बाद में उन्होंने फोन द्वारा संग्रह का नाम और प्रकाशक का पता आदि दिया। उर्मिला जी ने प्रकाशक को पत्र लिखकर पुस्तक की प्रति की मांग की। पर पुस्तक की प्रति मिलना तो दूर प्रकाशक ने पत्र का उत्तर तक नहीं दिया। अब आप बताइए कि ऐसे प्रकाशक के साथ क्या किया जाए?
उसी प्रकार कुछ समय पूर्व लंदन के एक सार्वजनिक पुस्तकालय में मोहनदास नैमिशराय की 'आवाजें' शीर्षक पुस्तक देखने को मिली थी। उसमें जैन और हिंदू महिलाओं के संबंध में बहुत ही अपमानजनक एवं आपत्तिजनक निराधार बातें लिखी गई थीं। मैंने पहले लंदन से ही प्रकाशक तथा लेखक को पत्र लिखकर इस संबंध में पूछा कि पुस्तक में जो कुछ लिखा है उसका स्रोत क्या है। उसका कोई उत्तर नहीं मिला। बाद में इलाहाबाद लौटने पर दोनों को रजिस्टर्ड डाक से पत्र भेजे। पर किसी ने उत्तर देना ठीक नहीं समझा। अंतत: वकील का नोटिस भिजवाया। फिर भी उनका मौन भंग नहीं हुआ। अब आप बतलाइए कि ऐसे लेखक और प्रकाशक के साथ क्या सुलूक किया जाए? क्या इस प्रकार की हरकतें रोकने के लिए कुछ नहीं किया जाना चाहिए? स्पष्ट है कि लेखकों द्वारा चुप रह जाने के कारण ही प्रकाशकों को इस प्रकार की हरकतों के लिए बढ़ावा मिलता है। मैं चाहूंगा कि आप मेरा यह पत्र हंस में अपने उत्तर के साथ प्रकाशित करें या संपादकीय में ही इस प्रश्न को उठाएं ताकि हंस के पाठकों को भी तो सही स्थिति का पता चले।
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