Twitter

Follow palashbiswaskl on Twitter

Memories of Another day

Memories of Another day
While my Parents Pulin babu and Basanti devi were living

Saturday, July 14, 2012

Fwd: [New post] निरामिषता की हिंसक राजनीति



---------- Forwarded message ----------
From: Samyantar <donotreply@wordpress.com>
Date: 2012/7/14
Subject: [New post] निरामिषता की हिंसक राजनीति
To: palashbiswaskl@gmail.com


New post on Samyantar

निरामिषता की हिंसक राजनीति

by कृष्ण सिंह

Beef-festival-osmania-university

अप्रैल में हैदराबाद के उस्मानिया विश्व-विद्यालय में एक ऐसा उत्सव हुआ जिसने हिंदुत्ववादी-ब्राह्मणवादी ताकतों खासकर संघ परिवार को अंदर से हिला कर रख दिया है। जिस गाय को राजनीतिक हथियार बनाकर हिंदुत्ववादी ताकतें मुसलमानों को निशाना बनाती रही हैं, अब हिंदुत्ववादी ताकतों को इसी हथियार से दलित समुदाय के नौजवानों ने चुनौती दी है। उस्मानिया विश्वविद्यालय में दलित छात्रों ने एक बीफ फेस्टिवल का आयोजन किया। बीफ यानी डंगरों का मांस या गोमांस (जिसे भारत में प्रचलित भाषा में बड़े का मांस कहा जाता है, इसमें गाय, बछड़ा, भैंस, कटड़ा, बैल आदि गौवंश के जानवरों का मांस शामिल होता है) के इस उत्सव में बड़ी संख्या में दलित छात्रों ने गोमांस बिरयानी खाई। संघ परिवार के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने आक्रामक तरीके से इसका विरोध किया। पूरे परिसर में हिंसा और अफरा-तफरी का माहौल बना दिया गया। एकत्र दलित छात्रों पर चाकू से हमला किया गया। पथराव किया गया और कई वाहनों में आग लगा दी गई। इस घटना के बाद उस्मानिया विश्वविद्यालय के कुलपति एस. सत्यनारायण ने एक बयान जारी करके कहा कि छात्रावासों में खाने में बीफ नहीं परोसा जाएगा। विश्वविद्यालय के दलित छात्रों का एक तबका काफी समय से मांग कर रहा था कि छात्रावासों के मेन्यू में बीफ शामिल होना चाहिए।

वैसे इससे पहले मार्च में इसी तरह के एक आयोजन का प्रस्ताव दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भी आया था जो तब कार्यान्वित नहीं हो पाया। वहां भी इसका हिंदूवादी ताकतों ने विरोध किया गया। अब सुना जा रहा है कि जल्दी ही इस तरह का आयोजन जनेवि में किए जाने की योजना है।

उस्मानिया विश्वविद्यालय में दलित छात्रों ने जो बीफ फेस्टिवल आयोजित किया उसके जरिए उन्होंने अपने खानपान की संस्कृति को उजागर किया। यह दलित नौजवानों का अपनी खानपान की परंपरा को लेकर एक नया उभार है, क्योंकि कर्नाटक में भी अंबेडकर जयंती के अवसर पर दलितों ने इसी तरह का प्रदर्शन किया। उन्होंने अंबडेकर जयंती के दिन मांस पकाया और उसे वितरित किया। ऐसा करके उन्होंने राज्य के उस कानून का उल्लंघन किया जिसके तहत इस दिन मांस की बिक्री और उसके उपभोग पर रोक है। लेकिन दलितों के इस प्रदर्शन ने राज्य की भारतीय जनता पार्टी सरकार को चुपचाप अपने इस आदेश का वापस लेने पर मजबूर कर दिया।

इस बीफ फेस्टिवल के जरिए खानपान की अपनी संस्कृति के लिए दलित समुदाय के नौजवानों ने आधुनिक भारत के इतिहास में पहली बार हिंदुत्ववादी-ब्राह्मणवादी ताकतों के सामने एक जटिल चुनौती पेश कर दी है। जैसा कि प्रसिद्ध अंग्रेजी पत्रिका इकॉनामिक एंड पोलिटिकल वीकली (ईपीडब्ल्यू) ने 28 अप्रैल के संपादकीय में लिखा: ''हिंदुत्ववादी ताकतों ने, जाहिर है, अपेक्षित हिंसा के साथ प्रतिक्रिया व्यक्त की, लेकिन उनका विरोध अव्यवस्थित और स्थानीय था और संकेत यही था कि वे वास्तव में नहीं जानते कि कैसे इस वैचारिक और राजनीतिक तर्क से निपटा जाए कि गोमांस दलित खानपान-संस्कृति का एक अभिन्न हिस्सा है और इसे विश्वविद्यालय के छात्रावासों और कैंटीन में उपलब्ध कराया जाना चाहिए। हिंदुत्व की गाय से जुड़ी राजनीति मुख्यत: मुसलमानों को निशाना बनाने के लिए रही है, जबकि यहां विरोधी दलित थे, जिन्हें हिंदुत्ववादी ताकतें अपने राजनीतिक गोल में लाने के लिए लालायित हैं। इस अवसर में यह उनकी वैचारिक और राजनीतिक अव्यवस्था को ज्यादा दर्शाता है। यह बीफ फेस्टिवल अंबेडकर जयंती के मौके पर हुआ, जिसने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार के लिए ज्यादा परेशानी इसलिए पैदा कर दी क्योंकि वह इस दलित महापुरुष के प्रति शत्रुता नहीं दर्शाना चाहते थे। ''

असल में संघ परिवार काफी समय से इस प्रयास में जुटा है कि किसी तरह से अंबेडकर और बौद्धों को अपने गोल में लाए। हिंदुत्ववादी ताकतें यह तर्क देती हैं कि बौद्ध हिंदू धर्म का ही एक हिस्सा है। संघ परिवार इस विचार से काफी सहज महसूस करता है कि सिख और बौद्ध संयुक्त हिंदू परिवार के कनिष्ठ सदस्य हैं, व्यापक हिंदू वंशावली की अनुज शाखाएं हैं। संघ परिवार के लिए इसमें परेशानी इसलिए भी नहीं है क्योंकि आम हिंदू यह सोचता है कि बुद्ध विष्णु के दस अवतारों में से एक हैं। आम हिंदुओं में यह सोच उच्च जाति की ब्राह्मणवादी व्यवस्था की ओर से ही पैदा किया गया है, जो दलितों को उच्च स्थान देने से तो इनकार करता है लेकिन बुद्ध को विष्णु का अवतार इसलिए प्रचारित करता है ताकि दलित, जिन्होंने बड़ी संख्या में बौद्ध धर्म को अपनाया है वे हिंदू धर्म का हिस्सा बनकर रहें। संघ परिवार इसी गणित के तहत नव-बौद्ध दलितों को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास करता रहता है। हालांकि सत्य यही है कि जिस तरह से मुख्यधारा के हिंदुत्व ने बौद्धवाद को हाशिए पर धकेला, उसी तरह से हिंदुओं ने दलितों को हाशिए पर धकेला। उनके साथ सदियों से अमानवीय व्यवहार किया। यह बौद्ध धर्म ही था जिसने हिंदू धर्म के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति को शरण दी। अंबेडकर ने उसी बौद्ध धर्म को अपनाया, जिसने सदियों पहले उसके समुदाय के लोगों को सम्मान दिया। गौर करने की बात यह भी है कि बौद्ध धर्म और जैन धर्म ने जानवरों की बलि और डंगरों को मारने का विरोध तो किया है, लेकिन उनके धर्मवैधानिक कार्य गाय के बारे में यह नहीं बताते हैं कि वह एक पवित्र जानवर है। बल्कि वे सभी जानवरों को बराबर मान कर चलते हैं और हिंसा का विरोध करते हैं।

उस्मानिया विश्वविद्यालय में जो बीफ फेस्टिवल आयोजित किया गया वह दलित नौजवानों का अपनी खानपान की परंपरा को लेकर एक नया उभार है। वहीं नहीं बल्कि बगल के राज्य कर्नाटक में भी अंबेडकर जयंती के अवसर पर दलितों ने इसी तरह का प्रदर्शन किया। उन्होंने अंबेडकर जयंती के दिन मांस पकाया और उसे वितरित किया। ऐसा करके उन्होंने राज्य के उस कानून का उल्लंघन किया जिसके तहत इस दिन मांस की बिक्री और उसके उपभोग पर रोक है। लेकिन दलितों के इस प्रदर्शन ने राज्य की भारतीय जनता पार्टी सरकार को चुपचाप अपने इस आदेश को वापस लेने पर मजबूर कर दिया। मीडिया की खबरों पर अगर गौर किया जाए तो उस्मानिया विश्वविद्यालय में जो हुआ वह तो एक उदाहरण है। आगे, दलित पूरे देश में इस तरह के बीफ और मांस के उत्सव आयोजित कर सकते हैं ताकि वे गैर ब्राह्मणवादी खानपान परंपराओं को सामने ला सकें। उस्मानिया विश्वविद्यालय के राजनीतिक विज्ञान विभाग से संबद्ध रहे सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और चिंतक कांचा इलैया अपनी पुस्तक पोस्ट-हिंदू इंडिया के मीट एंड मिल्क इकोनामिस्ट्स अध्याय में लिखते हैं- ''चावल और मांस से बनाई जाने वाली बिरयानी, यद्यपि मूलत: दलित-बहुजन द्वारा मानकीकृत की गई जिन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया था, भारत के एक विशेष पकवान के बतौर पूरे भारत में फैली। यह अब मुसलमानों और गैर मुस्लिम दलित-बहुजन के बीच एक सांस्कृतिक संपर्क के रूप में कायम है। क्योंकि भारतीय इस्लाम और दलित-बहुजन जनता के बीच इस तरह के मजबूत भोजन संस्कृति संपर्क के कारण हिंदूवादी ताकतें भारत में इस्लामी ताकतों और उनकी सांस्कृतिक विरासत को खत्म करने में सफल नहीं हो सकी थीं। वास्तव में, भारतीय मुसलमानों और दलित-बहुजन के बीच सांस्कृतिक जुड़ाव कहीं अधिक मित्रतापूर्ण है बजाय कि दलित-बहुजन का ब्राह्मणों और बनियों के। इस रिश्ते को विकसित करने में भोजन संस्कृति ने मुख्य भूमिका अदा की है, मांस खाने की संस्कृति ने आधारभूत भूमिका निभाई। मांस खाद्य उत्पाद बाजार में बने हुए हैं क्योंकि चरवाहा समुदाय ने ब्राह्मणवादी होने से इनकार कर दिया, और एक व्यापक स्तर तक, यहां तक कि हिंदूवादी होने से भी इनकार कर दिया। ''

PTI4_16_2012_000156Aसबसे महत्त्वपूर्ण और ध्यान देने वाली बात यह है कि बीफ मुख्यत: गरीबों का भोजन है, चाहे उसका कोई भी धार्मिक संबंध हो। इसके अलावा इसके जरिए गरीबों को सबसे सस्ते में प्रोटीन मिल जाता है। सरकारी आंकड़े खुद यह बताते हैं कि गैर शाकाहारी भोजन में बीफ सामान्यत: अधिक खाया जाता है। यूनाइटेड नेशंस फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में जो सबसे अधिक मांस खाया जाता है वह बीफ (गौवंश के जानवरों का मांस) है। पश्चिम बंगाल और केरल में गौमांस गैरकानूनी नहीं है। हिंदुओं की ऐसी बहुत बड़ी संख्या है जो गौवंश के जानवरों का मांस खाती है। दक्षिण केरल में सभी समुदायों, जिसमें हिंदू भी शामिल हैं, द्वारा जितना मांस खाया जाता है उसमें आधा हिस्सा बीफ का होता है। साफ है कि बीफ गरीबों का भोजन है जिसे केवल मुसलमान ही नहीं खाते हैं। वर्तमान में केरल में 72 समुदाय ऐसे हैं, जिनमें सभी अछूत नहीं हैं, जो महंगे बकरे के मांस के बजाय गौमांस (गौवंश के जानवरों का मांस) को ज्यादा तरजीह देते हैं। दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में बीफ खाना एक सामान्य बात है। भारत के विभिन्न हिस्सों में आदिवासी, दलित और मुसलमान बीफ खाते हैं। यही नहीं, उत्तर-पूर्वी भारत के पहाड़ी समुदायों के लोग भी बीफ खाते हैं। साहित्य और कई पुस्तकों में हमें ऐसे उदाहण मिलते हैं जब गांव में भैंस या गाय के मरने की खबर से ही दलितों के चेहरों पर मुस्कान आ जाती थी, क्योंकि उन्हें लगता था कि उन्हें मांस खाने का अवसर मिलेगा। पूर्व में गांवों में ऐसे बहुत सारे उदाहरण रहे हैं जब उच्च जाति के हिंदू गाय या भैंस के मरने पर उसे दलितों या निम्न जाति के लोगों को सौंप देते थे।

उत्तराखंड में आज भी बड़े पैमाने पर भैंसे की बलि चढ़ाने की परंपरा है पर उच्च जातियां इसके मांस को नहीं खातीं। लेकिन तार्किक रूप से ऐसा लगता है कि यहां भैंस का मांस तो निश्चित ही खाया जाता होगा क्योंकि जो भी देवताओं का चढ़ता है वह पवित्र होता है और उसे खाया जाता है। उत्तराखंड के बगल के नेपाल में हिंदुओं द्वारा भैंसा खाने की प्रथा है ही। उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों और नेपाल के कम से कम पश्चिमी क्षेत्र की परंपराओं और आचार-व्यहार में काफी समानताएं हैं।

यह गौर करने वाली बात है कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बीफ निर्यातक देश है। समाचार पत्र डीएनए ने अपने मुंबई संस्करण में 31 मई, 2012 को एक रिपोर्ट प्रकाशित की जिसमें उसने लिखा है- ''भारत इस साल दुनिया के प्रमुख बीफ निर्यातक के बतौर उभरने को तैयार है। यूएस डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर (यूएसडीए) की विदेश कृषि सेवा ने यह भविष्यवाणी की है। यूएसडीए की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2012 में भारत जहाजों में 15 लाख टन बीफ का लदान करेगा। जो कि वर्तमान मुख्य निर्यातक आस्ट्रेलिया को अचंभे में डालने वाला है। ''

अगर संघ परिवार को याद हो तो उनके सिद्धांतकार के.आर. मलकानी ने कहा था कि प्राकृतिक मौत से मरी गाय के मांस को खाने की बिना किसी शब्दछल के इजाजत दी जानी चाहिए। पर हिंदुत्ववादी ताकतें प्राकृतिक रूप से मरी हुई गाय के मांस को खाने की इजाजत देना तो दूर इस तरह से मरी हुई गाय की खाल तक नहीं निकालने देतीं। इसका उदाहरण हरियाणा के झज्जर में 2002 की वह घटना है जिसमें पांच दलितों की इसलिए हत्या कर दी गई थी क्योंकि वह मरी हुई गाय की खाल निकालने की जुर्रत कर रहे थे। उस समय संघ परिवार के संगठन विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने कहा था कि गाय की सुरक्षा और संरक्षण दलितों की जान से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है।

इस सब के बावजूद हिंदुत्ववादी ताकतें लगातार यह प्रचार करती रहती हैं कि गोमांस या गौवंश के जानवरों का मांस मुसलमान खाते हैं। इन ताकतों ने गाय को हथियार बनाकर मुसलमानों के खिलाफ इसका इस्तेमाल किया। भारत में एक सदी से ज्यादा समय से गोमांस या डंगरों का मांस लगातार एक मुद्दा बना हुआ है। इसके तहत बहुत बार दंगे, हत्याएं और सामाजिक विभाजन तक हुए। अभी भी हिंदुत्ववादी ताकतें अपनी साजिश में लगी रहती हैं। उस्मानिया विश्वविद्यालय की इस घटना से एक हफ्ते पहले हिंदूवादी कट्टरपंथियों ने हैदराबाद के पुराने शहर में सांप्रदायिक हिंसा भड़काने की कोशिश की। हिंदू कट्टरपंथियों ने कुरमागुडा के हनुमान मंदिर में गोमांस के टुकड़े फेंक दिए। इसके बाद यह अफवाह उड़ा दी गई कि यह मुसलमानों का कारनामा है। निर्दोष मुसलमानों को निशाना बनाया गया। कुछ बसों को आग के हवाले कर दिया गया। बाद में असली दोषियों का पता लगा और उनकी गिरफ्तारी भी हुई। अगर संघ परिवार को याद हो तो उनके सिद्धांतकार के.आर. मलकानी ने कहा था कि प्राकृतिक मौत से मरी गाय के मांस को खाने की बिना किसी शब्दछल के इजाजत दी जानी चाहिए। पर हिंदुत्ववादी ताकतें प्राकृतिक रूप से मरी हुई गाय के मांस को खाने की इजाजत देना तो दूर इस तरह से मरी हुई गाय की खाल तक नहीं निकालने देतीं। इसका उदाहरण हरियाणा के झज्जर में 2002 की वह घटना है जिसमें पांच दलितों की इसलिए हत्या कर दी गई थी क्योंकि वह मरी हुई गाय की खाल निकालने की जुर्रत कर रहे थे। उस समय संघ परिवार के संगठन विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने कहा था कि गाय की सुरक्षा और संरक्षण दलितों की जान से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। असल में, दलित और कई अन्य निम्न जातियां सदियों से जानवरों की खाल निकालने का काम करती रही हैं। यह उनकी रोजी-रोटी का एक हिस्सा रहा है जबकि हिंदुत्ववादी ताकतों और संघ परिवार के लिए गाय मात्र एक राजनीतिक हथियार है, जिसे वह समय-समय पर ईसाइयों और मुसलमानों के खिलाफ इस्तेमाल करते रहते हैं। यह उनके वोट बैंक का एक औजार भर है। इसी वोट बैंक की खातिर ही गुजरात में नरेंद्र मोदी सरकार ने गाय के मोतियाबिंद और दांतों की सर्जरी की व्यवस्था की है। राज्य सरकार ने घोषणा की है कि गाय को इन चिकित्सकीय सेवाओं का लाभ देने के लिए तीन किलोमीटर से अधिक पैदल न चलना पड़े, यह सुनिश्चित किया जाए। गुजरात में इस साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं। जाहिर है गाय भाजपा के लिए वोट का बड़ा माध्यम है, इसलिए उसका इस्तेमाल किया जा रहा है। यह वही गुजरात है जहां पूरी दुनिया ने मोदी के शासन में मुसलमानों का भीषण नरसंहार देखा है। अभी भी वहां बहुत बड़ी संख्या में मुसलमान शिविरों में रह रहे हैं। उन्हें मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराई जाएं, यह तक भी मोदी सरकार को स्वीकार नहीं है।

देखा जाए तो भारत में गाय को लेकर पवित्रता का मिथक और धर्मग्रंथों के जरिए इसका प्रचार बहुत बाद में परिघटित हुआ है। गाय को मां का दर्जा देने और उसे मारने को अधर्म और पापकर्म बताने का सिलसिला भारत में कृषि आधारित सामाजिक संरचना के धीरे-धीरे मजबूत होने के साथ ही परवान चढ़ता हुआ नजर आता है। कई जाने-माने इतिहासकार हमें यही बताते हैं कि कृषक समाज में इसकी आर्थिक कीमत के कारण ही गाय विशेषतौर पर महत्त्वपूर्ण और परमपावन हो गई, क्योंकि ब्राह्मणों को यह दक्षिणा के रूप में मिलती थी और वे नहीं चाहते थे कि इसकी हत्या कर दी जाए। सुप्रसिद्ध इतिहासकार और द मिथ ऑफ होली काउ पुस्तक के लेखक डीएन झा कहते हैं, ''ऐसे बहुत साक्ष्य हैं जो वैदिक काल के बाद भी गौमांस खाने की परंपरा के बारे में बताते हैं। मनुस्मृति ( 200 बी.सी.- ए. डी. 200), जो कि बहुत ही प्रभावशाली धर्मशास्त्र पुस्तक है, ऐसे पौराणिक उदाहरणों की याद दिलाती है कि बहुत सारे सच्चरित्र ब्राह्मण भुखमरी से बचने के लिए बैल का मांस या कुत्ते का मांस खाते थे। याज्ञवल्क्य की स्मृति (ए.डी. 100-300) बताती है कि पढ़े-लिखे ब्राह्मण (शरोत्रया) का स्वागत बड़े बैल या बकरे से किया जाता था। यह संभवत: स्मरण कराती है कि महाभारत में बहुत सारे पात्र मांस खाने वाले थे, और आश्चर्यजनक नहीं है, यह राजा रणतिदेवा का उदाहरण देती है, जिसकी रसोई में हर रोज दो हजार गाएं मारी जाती थीं और उनका मांस, अनाज के साथ, ब्राह्मणों में वितरित किया जाता था। ... कहा जाता है कि ऋषि भारद्वाज ने राम का स्वागत करते हुए उनके स्वागत में एक हृष्ट-पुष्ट बछड़ा मारा था। जो धार्मिक और धर्मशास्त्रों की पाठ्य पुस्तकों में पाया जाता है वह धर्मनिरपेक्ष साहित्य में भी प्रतिबिंबित होता है। शुरुआती भारतीय चिकित्सा पुस्तकें गोमांस के चिकित्सीय इस्तेमाल के बारे में बताती हैं। और साहित्य रचने वाले बहुत सारे लेखक ( कालीदास, भवभूति, राजशेखर और श्रीहर्ष, जो कि कुछ ही नाम हैं) गौमांस खाने का स्मरण दिलाते हैं।'' (डीएन झा का साक्षात्कार फ्रंटलाइन पत्रिका के 24 फरवरी, 2012 के अंक में प्रकाशित हुआ था)। महान गणितज्ञ, दार्शनिक, इतिहासकार और महान चिंतक दामोदर धर्मानंद कोसंबी अपनी प्रख्यात पुस्तक मिथक और यथार्थ के 'चतुष्पथ पर : मातृदेवी पूजास्थलों का अध्य्यन' नामक अध्याय में लिखते हैं, ''एक ऐसी संस्कार विधि जरूर थी जो ऊपर उद्धृत नाटकों में प्रचलित थी और जो प्रस्तुत प्रसंग से संबद्ध जान पड़ती हैं। कीथ के शब्दों में, अंतिम अष्टका (पूजा) के पहले वाली सांझ के लिए विचित्र संस्कार- विधि मानव शाखा (संप्रदाय) द्वारा विहित है : (इसके अनुसार) बलि देने वाला एक गाय को चतुष्पथ (चौराहे) पर मारकर उसके टुकड़े करता है और मांस को मुसाफिरों में बांट देता है। ''

असल में खानपान की संस्कृति किसी भी समुदाय की भौगोलिक परिस्थितियों, आर्थिक हालात और सामाजिक संरचना से जुड़ी होती है। यह काल और समय के साथ बदलती भी रहती है। अगर आप किसी के दैनिक आहार के पसंदों को नियंत्रित या आदेशित करते हैं तो यह भी एक तरह से खानपान का फासीवाद है।

Comment    See all comments

Unsubscribe or change your email settings at Manage Subscriptions.

Trouble clicking? Copy and paste this URL into your browser:
http://www.samayantar.com/beef-politics-in-osmania-university/



No comments:

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...