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Memories of Another day

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While my Parents Pulin babu and Basanti devi were living

Monday, July 8, 2013

आइये एक दिया जलाएं इल्वारसन की याद में विद्या भूषण रावत


  • आइये एक दिया जलाएं इल्वारसन की याद में 

    विद्या भूषण रावत 

    तमिलनाडू की धर्मपुरी जिले में रहने वाले इल्वार्सन ने प्यार करके शायद बहुत बड़ा गुनाह कर दिया क्योंकि जिले के वन्नियार लोगो ने उनकी दलित बस्ती को जल दल और उसके प्रेमिका दिव्या के पिता ने अपनी बेटी के इस विद्र्हो से डरकर आत्महत्या कर ली। और फिर दवाब और ब्लैकमेल की इस पूरी व्यवस्था ने अंततः इल्वारासन की जान भी ले ली। हालाँकि मामला कोर्ट में है और इल्वारासन के माता पिता ने दोबारा पोस्ट मार्टम की मांग की है लेकिन इस घटना ने हमारे समाज के विभत्स सच को उजागर कर दिया के जाति व्यवस्था की जड़े हमारे दिमागो में कूट कूट कर भरी हुयी है और उसको थोडा से भी छेड़ने पर मौत की सजा के आलावा और कुछ नहीं है और हमारी सेक्युलर दिखने वाली सरकार और उसका प्रशाशन कुछ नहीं कर पाटा क्योंकि हकीकत यह है सेकुलरिज्म केवल किताबी बाते है क्योंकि कानून लागु करने वाले मनु के चेले उसको नहीं मानते और यह भी सोचना जरुरी है के ब्राह्मणवाद को बचने की लड़ाई अब केवल ब्राह्मणों या सवर्णों के हाथ में ही नहीं है अपितु शुद्रो को तो उसकी सबसे बड़ी जिम्मेवारी दी गयी लगती है। यह ही हिंदुत्व का अजेंडा है और जरुरत है के हम एक मानववादी समाज की स्थापना की बात कहें जो हमारे संविधान के मूल्यों को ईमानदारी से लागु करके ही संभव है .

    आज हमें स्वयं से सवाल पूछने हैं क्योंकि यह वक्त चुप रहने का नहीं है और न ही दुसरे को दोष देने का ? हम अपने लेवल पर एक सभ्य समाज बनाने के लिए क्या कर रहे हैं ? जातिवादी व्यवस्था का शिकार बने इल्वार्सन के लिए क्या हम कोई कैंडल लाइट मार्च कर सकते हैं ? भारत की वर्णवादी व्यस्था का सबसे कटु सत्य है जातिवाद और उसके सहारे राजनीती करने वाले लोग. इस हत्या ने तमिनाडु की 'द्रविड़ियन' राजनीती की भी पोल खोल दी है जो गैर ब्राह्मणवाद के नाम पर शुरू हुयी थी और जिसने दलितों को और अधिक हाशिये पर दखेल दिया। 

    पिछले पचास वर्षो से बदलाव की बात करने वाले तमिलनाडु में एक दलित लड़के का वन्नियार यानि पिछड़ी जाती की लड़की के साथ प्रेम सम्बन्ध अगर दलितों के घर जलाने और अंत में इल्वारासन की मौत से होती है तो मामला गंभीर है और तमिलनाडु सरकार को इस पर कार्यवाही करनी चाहिये। शर्मनाक बात यह है के एक तरफ हमारा संविधान कहता है हमें आधुनिक बनना है और दो बालिग युवक युवतियों को अपनी मर्जी से शादी करने की अनुम्पति होनी चाहिए लेकिन हमारा समाज इसके लिए तैयार नहीं है. 

    हम सभी जातियों के उन्मूलन की बात करते हैं और वो बाबा साहेब आंबेडकर का सपना था और यही पेरियार का सपना भी था लेकिन यह बात समझ में नहीं आती के उसका उन्मूलन कैसे होगा यदि हमारा समाज अपने पूर्वाग्रहों को समाप्त करने के लिए तैयार नहीं है। दुखद बात यह है के इन पूर्वाग्रहों की बुनियाद पर बहुत से नेता अपनी दूकान चला रहे हैं यह वो दल हैं जो मंडल कमीशन के समय दलित बहुजन एकता का नारा देते हैं और इन्हें पता है के मंडल की सबसे बड़ी लड़ाई पिछडो ने नहीं दलितों ने लड़ी। आज सवाल इस बात का है के अपने को पिछड़ी जातियों का नुमैन्दा कहने वाली यह पार्टियाँ क्यों ऐसी घटनाओं का विरोध नहीं करती। जातिवाद का विरोध केवल ब्राह्मणवाद के नाम पर ब्राह्मण विरोध से नहीं हो सकता अपितु हर प्रकार के कट्टरवाद और यथास्थिति वाद के विरोध से करना पड़ेगा। यह भी जरुरी है के हम सभी को अपने युवाओं को अपने साथी चुनने की आज़ादी देनी होगी तभी जातिवाद और वर्णव्यस्था टूटेगी अन्यथा शादिय और प्यार केवल दुनिया को दिखने के लिए नहीं होता और कोई भी व्यक्ति केवल अंतरजातीय विवाह करने के लिए स्वयं तैयार नहीं होंगे। वर्णव्यस्था का सबसे बड़ा खेल पित्र्सत्ता की सर्वोच्चता और महिलाओं की 'पवित्रतता' है और इन सिद्धांतो पर हमला करे बगैर हम कभी एक सभ्य समाज की स्थापना नहीं कर सकते। सभी ब्रह्मवादी शक्तियों को गरियाते हैं लेकिन यह भूल जाते हैं की सामंतवाद की यह विचारधारा किसी के जरिये भी आ सकती है और इसलिए इसे समाप्त करने लिए एक बेहतरीन विचार की जरुरत होगी।

    इल्वारासन की मौत अपने प्यार के लिए हुऎ चाहे वो आत्महत्या हो या हत्या क्योंकि दोनों ही मामलो में उस पर समाज का दवाब था और सरकार उसे सुरक्षा नहीं प्रदान कर पाई . क्या हम ऐसी कुर्बानियों को बेकार जाने देंगे जो हमारे देश के वर्णव्यस्था को तोड़ने का सबसे बड़ा साधन है . आइये प्यार पर कुर्बान इस जांबाज़ साथी की याद में एक रौशनी जलाएं। क्या हम तैयार हैं ? क्या हम जातिवाद के इस खतरनाक किले को तोड़ने के लिए तैयार हैं ?

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