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Memories of Another day

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Monday, May 16, 2011

Fwd: सरकारी पैसे पर फ्री थिएटर नहीं चल सकताः बादल सरकार से एक बातचीत



---------- Forwarded message ----------
From: reyaz-ul-haque <beingred@gmail.com>
Date: 2011/5/16
Subject: सरकारी पैसे पर फ्री थिएटर नहीं चल सकताः बादल सरकार से एक बातचीत
To: deewan@sarai.net


बादल सरकार के निधन के बाद शम्सुल इसलाम ने मेल के जरिए सरकार से की गयी अपनी एक बातचीत की कटिंग भेजी है, जो द संडे टाइम्स ऑफ इंडिया के 11 अक्तूबर, 1992 संस्करण में छपी थी. हम यहां इसका अनुवाद पेश कर रहे हैं. इसे हम यहां बादल सरकार के रंगमंच पर जारी बहस के सिलसिले के रूप में पोस्ट कर रहे हैं.

आपने तीसरा रंगमंच के सिद्धांत की शुरुआत की और आप अपनी राय बदलते रहे हैं. अब आप फ्री थिएटर को कैसे देखते हैं?

यह सही है, एक बार मैंने तीसरा रंगमंच को शहरी और ग्रामीण रंगमंच के मेल (संश्लेषण) से बने रंगमंच के रूप में सोचा था. लेकिन इस पर काम करते हुए मैंने अपने विचारों को सुधारा. मुझे लगा कि अगर तीसरा रंगमंच को एक वैकल्पिक रंगमंच होना था तो यह किसी का भी संश्लेषण नहीं हो सकता था. पहले मैं यांत्रिक नजरिये का शिकार हो गया था. मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि तीसरा रंगमंच को फ्री थिएटर होने के लिए उसे महंगा, स्थिर और व्यवसायिकरण का शिकार होने से बचना चाहिए. इसे दर्शकों से संवाद बनाने की कोशिश करनी चाहिए.
एक बार जब आप पारंपरिक मंच नाटक (प्रोसीनियम थिएटर) की चीजों से पार पा लेते हैं तो आपको मुख्यतः मानव देह पर निर्भर रहना पड़ता है. इसकी क्षमताओं को गहरे प्रशिक्षण के जरिये विकसित किया जाना चाहिए. फ्री थिएटर को बीते हुए समय की तरह नहीं लिया जा सकता. हमारे लिए किसी कहानी को कहने के बजाय रंग अनुभव अधिक प्रासंगिक होता है. किसी भी हालत में भाषा पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय शारीरिक अनुभव कहीं अधिक असरदार होता है.

पूरी बातचीत पढ़ें - सरकारी पैसे पर फ्री थिएटर नहीं चल सकताः बादल सरकार से एक बातचीत




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Palash Biswas
Pl Read:
http://nandigramunited-banga.blogspot.com/

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