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Memories of Another day

Memories of Another day
While my Parents Pulin babu and Basanti devi were living

Wednesday, June 21, 2017

दलित राष्ट्रपति का हकीकतःगुजरात पुलिस ने बलात्कार की शिकार दलित पीड़िता से कहा 'जाओ जाकर पहले कास्ट सर्टिफिकेट लेकर आओ'! हिंदुत्व के एजंडे के मुकाबले गजब का दलित एजंडा है।जिससे समूचा विपक्ष तितर बितर है और संघ के खेमे में दलित हितों के बहाने एंट्री और रीएंट्री की दौड़। देश में मेहनतकश तबका, देश के किसान, बहुजन समाज, बहुसंख्य आम जनता इसी तरह अलग अलग इसी तरह बंटे हुए हैं।छात्र युवा स्

दलित राष्ट्रपति का हकीकतःगुजरात पुलिस ने बलात्कार की शिकार दलित पीड़िता से कहा 'जाओ जाकर पहले कास्ट सर्टिफिकेट लेकर आओ'!

हिंदुत्व के एजंडे के मुकाबले गजब का दलित एजंडा है।जिससे समूचा विपक्ष तितर बितर है और संघ के खेमे में दलित हितों के बहाने एंट्री और रीएंट्री की दौड़।

देश में मेहनतकश तबका, देश के किसान, बहुजन समाज, बहुसंख्य आम जनता इसी तरह अलग अलग इसी तरह बंटे हुए हैं।छात्र युवा स्त्री तमाम सामाजिक शक्तियां इसी तरह बंटी हुई है।निजीकरण,विनिवेश और एकाधिकार कारपोरेट नरसंहारी रंगभेदी राजकाज का प्रतिरोध इसलिए संभव नहीं है।

हर छोटे बड़े चुनाव में चुनाव में इसी तरह सैकडो़ं,हजारों बंटवारा होता है और सत्ता वर्ग की एकता,उनके हित अटूट हैं।

 

पलाश विश्वास

गुजरात पुलिस ने बलात्कार की शिकार दलित पीड़िता से कहा 'जाओ जाकर पहले कास्ट सर्टिफिकेट लेकर आओ',जिग्नेश मेवाणी ने फेसबुक वाल पर बाकायदा एक प्रेस बयान जारी किया है।जिसे आप आगे पूरे ब्यौरे के साथ पढ़ेंगे।

दलित अस्मिता की राजनीति धुंआधार है और चूंकि संघ परिवार ने दलित कार्ड खेल दिया है,तो विपक्ष का खेल खत्म है।

दूसरी ओर,संघ की बुनियादी हिंदुत्व प्रयोगशाला में दलितों की स्थिति यह है।

गोरक्षा कार्यक्रम में जैसे मुसलमान मारे जा रहे हैं,वैसे ही दलित मारे जा रहे हैं।

राजकाज का असल योगाभ्यास यही है।

राजनेताओं को दलितों की कितनी परवाह है,उनके वोट के सिवाय, इसका खुलासा उसी तरह हो रहा है कि मुसलमानों की परवाह कितनी है मुस्लिम वोट बैंक के सिवाय,यह निर्मम हकीकत।

वनवासी कल्याण कार्यक्रम से सलवा जुड़ुम का रिश्ता घना है।आदिवासी फिर भी लड़ रहे हैं बेदखली के खिलाफ अपने हकहकूक के लिए।

दलितों का राष्ट्रपति फिर बन रहा है।

ओबीसी के कितने तो मुख्यमंत्री हैं और अब सर्वशक्तिमान प्रधानमंत्री भी है।

मुसलमान प्रधानमंत्री नहीं बने,बहरहाल राष्ट्रपति,उपराष्ट्रपति बनते रहते हैं तो कभी कभार मुख्यमंत्री भी।

सत्ता में भागेदारी का मतलब यही है।

जाहिर है कि दलित नहीं लडे़ंगे अपने हकहकूक के लिए।

जाहिर है कि ओबीसी नहीं लड़ेंगे अपने हकहकूक के लिए।

जाहिर है कि मुसलमान नहीं लड़ेगे अपने हक हकूक के लिए।

लड़ेंगे तो राष्ट्रद्रोही बनाकर मार दिये जायेंगे।

देश में मेहनतकश तबका, देश के किसान, बहुजन समाज, बहुसंख्य आम जनता इसी तरह अलग अलग इसी तरह बंटे हुए हैं।छात्र युवा स्त्री तमाम सामाजिक शक्तियां इसी तरह बंटी हुई है।

निजीकरण,विनिवेश और एकाधिकार कारपोरेट नरसंहारी रंगभेदी राजकाज का प्रतिरोध इसलिए संभव नहीं है।

हर छोटे बड़े चुनाव में चुनाव में इसी तरह सैकडो़ं,हजारों बंटवारा होता है और सत्ता वर्ग की एकता,उनके हित अटूट हैं।

दलितों की परवाह विपक्ष को पहले थी तो उसने संघ परिवार से पहले दलित उम्मीदवार की घोषणा क्यों नहीं कर दी?

अगर विचारधारा का ही सवाल है तो संघ परिवार की विचारधारा और हिंदुत्व के एजंडे के लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष विरोधियों को राष्ट्रपति पद पर संघ की सहमति से उम्मीदवार चुनने की नौबत क्यों आयी?

अब चूंकि मायावती ने कह दिया है कि राष्ट्रपति पद के लिए दलित उम्मीदवार ही उन्हें मंजूर होगा तो पहले से लगभग तय विपक्ष के उम्मीदवार गोपाल कृष्ण गांधी को बदलकर पहले मीरा कुमार,सुशील कुमार सिंधे और बाबासाहेब के पोते प्रकाश अंबेडकर के नाम चलाये गये और विपक्षी एकता ताश के महल की तरह तहस नहस हो जाने के बाद अब स्वामीनाथन का नाम चल रहा है।

यानी हिंदुत्व के दलित कार्ड के मुकाबले वाम लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष दलित कार्ड का खुल्ला खेल फर्रूखाबादी?

समता ,न्याय,सामाजिक न्याय का क्या हुआ?

इसमें कोई शक नहीं है कि स्वामीनाथन बेशक बेहतर उम्मीदवार हैं तमाम राजनेताओं के मुकाबले।तो पहले विपक्ष को उनका नाम क्यों याद नहीं आया,यह समझ से परे हैं।

जब मोहन भागवत और लालकृष्ण आडवाणी के नाम चल रहे थे ,तब भी क्या विपक्ष को समझ में नहीं आया कि किसी स्वयंसेवक को ही राष्ट्रपति बनाने के पहले मौके को खोने के लिए संघ परिवार कतई तैयार नहीं है।

यह जानना दिलचस्प होगा कि संघ परिवार की ओर से पेश किस नाम पर विपक्ष आम सहमति बनाने की उम्मीद कर रहा था?

मोहन भागवत?

लाल कृष्ण आडवाणी?

मुरली मनोहर जोशी?

सुषमा स्वराज?

सुमित्रा महाजन?

प्रणव मुखर्जी?

गौरतलब है कि विपक्षी मोर्चाबंदी में ताकतवर नेता ममता बनर्जी ने भागवत और जोशी के अलावा बाकी सभी नामों का विकल्प सुझाव दिया है।

दार्जिलिंग में जैसे आग लगी हुई है और उस आग को ईंधन देने में लगा है संघ परिवार और बंगाली सवर्ण उग्र राष्ट्रवाद,अगर बंगाल का विभाजन कराने में कामयाब हो गया संघ परिवार,तो दीदी की अनंत लोकप्रियता काअंजाम क्या होगा कहना मुश्किल है।

संघ परिवार और केंद्र की जांच एजंसियों ने जैसी घेराबंदी दीदी की की है,बचाव के लिए संघम शरणं गच्छामि मंत्र के सिवाय कोई चारा उनके पास

नहीं बचा है।

दीदी फिलहाल विदेश यात्रा पर हैं और दार्जिलिंग के साथ साथ सिक्किम भी बाकी देश से कटा हुआ है।आज स्कूलों को खाली करने के लिए गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने बारह घंटे की मोहलतदी है।दीदी की वपसी तक हालात कितने काबू में होंगे कहना मुश्किल है।

जैसे प्रणव मुखर्जी का प्रबल विरोध करने के बाद दीदी ने वोट उन्हीं को दिया था,बहुत संभव है कि इस बार भी कम से कम दार्जिलिंग बचाने के लिए दीदी नीतीश की तरह संघ परिवार के साथ हो जाये।वैसे वे संघ परिवार के पहले मंत्रिमंडल में भारत की रेलमंत्री भी रही हैं।

प्रणव मुखर्जी और संघ परिवार के मुखिया मोहन भागवत की शिष्टाचार मुलाकात पर हम पहले ही लिख चुके हैं।

संघ परिवार चाहता तो विपक्ष उनके नाम पर भी सहमत हो जाता,क्योंकि सहमति के इंतजार में उसने गोपालकृष्ण का नाम तय होने पर भी घोषित नहीं किया जबकि सहमति न होने की वजह यह बतायी जा रही है कि संघ परिवार ने पहले से नाम नहीं बताया।

अब संघ परिवार ने नाम बताया तो विपक्ष अपना प्रत्याशी बदलकर दलित चेहरे की खोज में लगा है।

हिंदुत्व के एजंडे के मुकाबले गजब का दलित एजंडा है।जिससे समूचा विपक्ष तितर बितर है और संघ के खेमे में दलित हितों के बहाने एंट्री और रीएंट्री की दौड़।

सत्ता की राजनीति, वोटबैंक की राजनीति,सत्ता में साझेदारी,संसदीय राजनीति में विचारधारा के ये विविध बहुरुपी आवाम हैं,जिसकी शब्दावली बेहद फरेबी हैं लेकिन इससे निनानब्वे प्रतिशत भारतवासियों, किसानों, मेहनतकशों, दलितों, आदिवासियों, स्त्रियों, मुसलमानों और बहुसंख्य हिंदुओं और स्त्रियों के भले बुरे,जीवन मरण का कुछ लेना देना नहीं है।

राष्ट्रपति चुनाव का दलित कार्ड दरअसल वोटबैंक का एटीएम कार्ड है और इसे सत्ता की चाबी भी कह सकते हैं।

पिछले लोकसभा चुनाव में ओबीसी कार्ड खेलने के बाद संघ परिवार राष्ट्रपति चुनाव में दलित कार्ड भी खेल सकता है,विपक्ष के हमारे धुरंधर राजनेताओं को इसकी हवा क्यों नहीं लगी?

नाथूराम गोडसे को महानायक बनाने पर आमादा संघ परिवार जिस तेजी से गांधी नेहरु का नामोनिशान मिटाने पर तुला हुआ है,ऐसी हालत में गोपाल कृष्ण गांधी के वह कैसे राष्ट्रपति बनने देता?

तमिलनाडु,ओड़ीशा,तेंलगना और आंध्र के क्षत्रपों ने पहले से संघी कोविंद को अपना समर्थन दे दिया है।

समाजवादी मुखिया मुलायम पहले से ही राजी रहे हैं और वे मायावती अखिलेश समझौते के खिलाफ हैं।

नीतीश कुमार के जदयू ने लालू प्रसाद यादव और उनकी पार्टी राजद की परवाह किये बिना संघ परिवार का समर्थन कर दिया और जाहिर है कि वे देर सवेर संघ परिवार से फिर नत्थी होने की जुगत लगा रहे हैं।

वे पहले भी संघ परिवार के साथ रहे हैं और उनके इस कदम से किसी को हैरत नहीं होनी चाहिए।शरद यादव तो अटल जमाने में संघी गठबंधन के मुखिया भी रहे हैं।

अब चाहे दलित उम्मीदवार भी विपक्ष कोई खड़ा कर दें, देश का पहला केसरिया राष्ट्रपति बनना तय है और प्रधानमंत्री के साथ भारत के राष्ट्रपति भी स्वयंसेवक ही बनेंगे।वे दलित हों न हों,केसरिया होंगे कांटी खरा सोना,इसमें कोई शक नहीं है।

जाहिर है कि चुनाव में प्रतिद्वंद्विता अब प्रतीकात्मक ही होगी जिसके लिए सिर्फ वामपंथी अडिग हैं।जबकि हकीकत यह है कि  वामपंथी बंगाल में सत्ता गवांने के बाद राष्ट्रीय राजनीति में हाशिये पर चले जाने के बाद ऐसी कोई ताकत नहीं हैं कि अकेले दम संघियों से पंजा लड़ा सके।

वाम का सारा दम खम कांग्रेस के भरोसे हैं।उनकरी विचारधारा अब कुल मिलाकर कांग्रेस की पूंछ है जिसका केसरिया रंगरोगन ही बाकी है।

गौरतलब है कि कांग्रेस के साथ वे दस साल तक सत्ता में नत्थी रहे हैं।

पांच साल के मनमोहन कार्यकाल के दौरान परमाणु संधि को लेकर समर्थन वापसी में नाकामी के बावजूद उन्होंने कांग्रेस का दामन छोड़ा नहीं है।तब सोमनाथ चटर्जी को पार्टीबाहर कर दिया लेकिन परमाणु संधि या भारत अमेरिकी संबंध या कारपोरेट हमलों की जनसंहार संस्कृति के खिलाफ कुछ भी जन जागरण उन्होंने नहीं किया है।उनकी धर्मनिरपेक्षता का जरुर जलवा बहार है।

वैसे आपातकाल के बाद जनता पार्टी सरकार में संघी खास भूमिका में थे,तब वाम ने उस सरकार का समर्थन दिया था और वीपी मंत्रिमंडल के समर्थन में वाम और संघ परिवार दोनों थे।इसलिए वैचारिक शुद्धता का सवाल हास्यास्पद है। इसी वैचारिक शुद्धता के बहाने कामरेड ज्योति बसु को उन्होंने प्रधानमंत्री बनने से रोका था।लेकिन केंद्र की सत्ता से नत्थी हो जाने में उनकी वैचारिक शुद्धता वैदिकी हो जाती है।

इस पर भी गौर कीजिये कि सोशल मीडिया पर बहुत लोगों ने लिखा है कि सिख नरसंहार के वक्त सिख राष्ट्रपति जैल सिंह थे तो गुजरात नरसंहार के दौरान मुसलमान राष्ट्रपति थे।

सत्ता में जो लोग इस वक्त दलितों के जो राम श्याम मंतरी संतरी हैं,वे देश में दलितों,दलित  स्त्रियों  के खिलाफ  रोजाना हो रहे अत्याचारों के खिलाफ कितने मुखर हैं,संसद से लेकर सड़क तक सन्नाटा उसका गवाह है।

कोविंद बेशक राष्ट्रपति बनेंगे।लेकिन उनसे पहले आरके नारायण भी राष्ट्रपति बन चुके हैं,जो दलित हैं,उनके कार्यकाल में दलितों पर अत्याचार बंद हुए हों या समता और न्याय की लड़ाई एक इंच आगे बढ़ी हो,ऐसा सबूत अभी तक नहीं मिला है।

मायावती चार बार मुख्यमंत्री यूपी जैसे राज्य की बनी रहीं,बाकी देश की छोड़िये ,यूपी में दलितों का क्या कायाकल्प हुआ बताइये।होता तो दलित संघी कैसे हो रहे हैं?

स्त्री अस्मिता की बात करें तो इस देश में स्त्री प्रधानमंत्री, सबसे शक्तितशाली प्रधानमंत्री का नाम इंदिरा गांधी है।तो राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील भी बनी हैं।

सुचेता कृपलानी से अब तक दर्जनों मुख्यमंत्री बन चुकी हैं लेकिन पितृसत्ता को तनिक खरोंच तक नहीं आयी।स्त्री आखेट तो अब कारपोरेट खेल है।

बाबासाहेब दलित थे,भारत के संविधान का मसविदा उन्होंने रचा और राजकाज राजनीति में कांग्रेस के बाद अब संघ परिवार भी परमेश्वर बाबासाहेब हैं,इसलिए नहीं कि उन्होंने संविधान रचा,इसलिए कि उनके नाम पर दलितों के वोट मिलते हैं। बाबासाहेब के संवैधानिक रक्षाकवच के बादवजूद दलितों,पिछडो़ं,आदिवासियों और स्त्रियों पर अत्याचार का सिलसिला जारी है।

पंचायत से लेकर विधानसभाओं और संसद से लेकर सरकार और प्रशासन में आरक्षण और कोटे के हिसाब से जाति,धर्म,लिंग,भाषा,नस्ल, क्षेत्र के नाम जो लोग पूरी एक मलाईदार कौम है,वे अपने लोगों का भला कैसे साध रहे हैं और उनपर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ किस तरह सन्नाटा बुनते हैं,इसे साबित करने की भी जरुरत नहीं है।

जाहिर सी बात है कि ओबीसी प्रधानमंत्री हो या दलित राष्ट्रपति,ओबीसी या दलितों के हित साधने के लिए वे चुने नहीं जाते हैं,उनके चुनने का मकसद विशुद्ध राजनीतिक होता है।

जैसे अब यह मकसद हिंदू राष्ट्र का कारपोरेट एजंडा है।

जाति के नाम पर कोविंद का समर्थन और विरोध दोनों वोटबैंक की राजनीति है,इससे दलितों पर अत्याचार थमने वाले नहीं हैं।

गुजरात पुलिस ने बलात्कार की शिकार दलित पीड़िता से कहा 'जाओ जाकर पहले कास्ट सर्टिफिकेट लेकर आओ',जिग्नेश मेवाणी ने फेसबुक वाल पर बाकायदा एक प्रेस बयान जारी किया है।कृपया पढ़ लेंः

गुजरात के बनासकांठा जिले के डिशा तहसील के बुराल गांव की 18 साल की दलित लड़की जब स्वच्छता अभियान के सारे नारो के बावज़ूद जब घर पर टॉयलेट नही होने के चलते खुले में शौच करने गई तब दबंग जाति के एक इंसान रूपी भेड़िये ने उस के साथ बलात्कार किया।

10 जून दोपहर के 12 बजे यह घटना घटी।

पीड़िता ने घर जाकर अपने माँ बाप को यह बात बताई।

दोपहर के 2 बजे पीड़िता, उस के माता-पिता और बराल गांव के कुछ लोग डिशा रूरल पुलिश थाने में मामले कि रिपोर्ट दर्ज करवाने गए।

थाना इन्चार्ज मौजूद नही थे।

डयूटी पर बैठे पुलिस स्टेशन ऑफीसर ने कहा कि थाना इन्चार्ज (पुलिस इंस्पेक्टर) वापस आएंगे उस के बाद ही करवाई होगी।

पीड़िता, उसके माता पिता और गांव के लोग बारबार गिड़गिड़ाते रहे,

लेकिन रिपोर्ट दर्ज नही करी गई।

फिर पीड़िता के माता-पिता ने लोकल एडवोकेट मघा भाई को थाने बुलाया।

वकील साहब ने कहा कि मामला इतना संगीन है,

बलात्कार हुआ है और आप पुलिस इंस्पेक्टर का इंतजार कर रहे हो, यह कैसे चलेगा ?

इसके बाद भी कोई कार्यवाही नही हुई।

पुलिस स्टेशन ऑफिसर ग़लबा भाई ने कहा कि इंस्पेक्टर साहब आपको धानेरा तहसील के एक चौराहे पर मिलेंगे।

बलात्कार का शिकार यह दलित लड़की अपने मां-बाप और गांव के लोगो के साथ रोती गिड़गिड़ाती हुई धानेरा हाई वे पर पहुंची और अपनी आपबीती सुनाई।

सुनकर पुलिस इंस्पेक्टर डी. डी. गोहिल ने कहा - बलात्कार हुआ और तू दलित है तो जा जाकर पहले अनुसूचित जाति का सर्टिफिकेट लेकर आ।

यह है गुजरात का गवर्नेन्स,

यह है गुजरात मॉडल,

यह है दलितो के साथ गुजरात पुलिस का रवैया,

बाद में पीड़ित लड़की अपने मां बाप के साथ 24 किलोमीटर दूर अपने गांव वापस गई और कास्ट सर्टिफिकेट लेकर पुलिस थाने पहुंची।

फिर जो हुआ वह और भी भयानक है।

बगल के पुलिस थाने की शर्मिला नाम की एक महिला पुलिस कर्मी ने मामला दर्ज करवाने आई इस पीड़िता को एक अंधेरे कमरे में ले जाकर दो चांटे मारकर धमकी देते हुए कहा कि यदि बलात्कार का मामला दर्ज करवाया तो तुझे और तेरे मां-बाप को जेल में डाल देंगे।

बाद में इस थाने में IPC की धारा 376(Rape) के बजाय 354 (sexual abuse) के लिए मुकद्दमा दर्ज किया गया।

यहाँ तक कि इस पीड़िता के बारबार कहने के बावजूद उस की मेडिकल जांच नही करवाई गई।

यानी कुछ भी करके मामले को रफादफा करने की कोशिश की गई।

यहाँ उल्लेखनीय है कि कुछ दिन पहले ही BJP के कुछ नेता नालिया सैक्स रैकेट में इनवॉल्व पाये गए थे और गुजरात पुलिस और बीजेपी के नेताओं का वास्तविक चरित्र उजागर हुआ था।

यह भी उल्लेखनीय है कि गुजरात में 2004 में 24 दलित बहनो के ऊपर बलत्कार हुए थे जो 2014 में 74 तक पहुंच गए।

हम लोगो ने पाटिदार समाज की नेता रेशमा पटेल और चिराग पटेल और बनासकांठा के साथी चेतन सोलंकी वगैरा के साथ मिलकर आज प्रेस कॉन्फ्ररेन्स के जरिये यह ऐलान किया है कि यदि 25 तारीख शाम के 6 बजे तक धारा 376 के तहत मुकदमा दर्ज नही किया गया और यदि थाना इन्चार्ज के खिलाफ एट्रोसिटी एक्ट की धारा -4 के तहत करवाई नही हुई तो हम सब मिलकर 26 तारीख को सुबह 11 बजे बनासकांठा जिले की बनास नदी के उपर का bridge (ब्रिज) और हाई वे बंद करवा देंगे।

बलात्कार के मामले में कोई समझौता नही चलेगा।

गुजरात सरकार तैयारी कर ले हमे रोकने की,

हम तैयारी कर लेंगे रास्ता रोकने की।

इंकलाब ज़िन्दाबाद।

Jignesh Mevani की वाल से

 

 

Monday, June 19, 2017

ओबीसी प्रधानमंत्री के बाद दलित राष्ट्रपति का हिंदुत्व दांव, मुकाबले में धर्मनिरपेक्ष विपक्ष चारों खाने चित्त! विपक्ष के ब्राह्मणवाद के मुकाबले ओबीसी, पिछड़ों,आदिवासियों,स्त्रियों और अल्पसंख्यकों को भी जहां जरुरत पड़ी,वहां नेतृत्व देने से संघ परिवार हिचका नहीं। विचारधारा की इतनी परवाह थी तो संसद में आर्थिक सुधारों या आधार पर विपक्ष कैसे सहमत होता रहा।नीति निर्माण में सहमति �

ओबीसी प्रधानमंत्री के बाद दलित राष्ट्रपति का हिंदुत्व दांव, मुकाबले में धर्मनिरपेक्ष विपक्ष चारों खाने चित्त!

विपक्ष के ब्राह्मणवाद के मुकाबले ओबीसी, पिछड़ों,आदिवासियों,स्त्रियों  और अल्पसंख्यकों को भी जहां जरुरत पड़ी,वहां नेतृत्व देने से संघ परिवार हिचका नहीं।

विचारधारा की इतनी परवाह थी तो संसद में आर्थिक सुधारों या आधार पर विपक्ष कैसे सहमत होता रहा।नीति निर्माण में सहमति और राजकाज के समक्ष आत्मसमर्पण,बहुजनों को नेतृत्व देने से इंकार और सिर्फ वोट बैंक के लिहाज से भाजपा के हिंदुत्व के विरोध में अपने हिंदुत्व की राजनीति के तहत मनुस्मृति की बहाली- विपक्ष की विचारधारा का सच यही है।जो हिंदुत्व के एजंडे के खिलाफ तो कतई नहीं है।सारी विपक्षी कवायद वोट बैंक साधने की है और इस खेल में संघ परिवार ने उसे कड़ी शिकश्त दे दी है।

जाति वर्ण के सत्ता वर्ग के हित में विपक्ष को संघ परिवार की इस जीत से कोई फर्क नहीं पड़ा और कहना होगा कि मोदी की निरंकुश सत्ता में विपक्ष की भी हिस्सेदारी है और मोदी के उत्थान में भी उसका हाथ है।

पलाश विश्वास

मेरे विचारधारा वाले मित्र माफ करेंगे कि यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि संघ परिवार ने बहुजनों को अपने पक्ष में करने के सिलसिले में धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक विपक्ष को कड़ी शिकस्त दे दी है।

ओबीसी प्रधानमंत्री चुनकर देश की जनसंख्या के पचास फीसद को उन्होंने हिंदुत्व अश्वमेधी अभियान की पैदल सेना बना लिया है और अब दलित राष्ट्रपति बनवाकर विपक्ष के दलित वोटबैंक और अंबेडकरी आंदोलन दोनों पर कब्जा करने के लिए भारी बढ़त हासिल कर ली है।

आखिर तक विपक्ष को संघ परिवार की रणनीति की हवा नहीं लगी या संघ परिवार विपक्षी दलों में ओबीसी,दलित,आदिवासी और अल्पसंख्यकों को नेतृत्व न देने की जिद को जानकर यह ट्रंप कार्ड खेला है,कहना मुश्किल है।

द्रोपदी मुर्मु का नाम चल ही रहा था और आडवाणी ,मुरली मनोहर जैसे लोग पहले ही हाशिये पर कर दिये गये हैं और मोहन भागवत को राष्ट्रपति बनाकर संघ परिवार अपने हिंदुत्व एजंडे के समावेशी मुखौटा को बेपर्दा करने वाला नहीं है,क्या विपक्ष के लिए संघ परिवार के सोशल इंजीनियरिंग के तौर तरीके समझना इतना भी मुश्किल था।

मोदी को जब संघ परिवार ने प्रधानमंत्रित्व का उम्मीदवार चुना तो उसका जबाव खोजने के लिए विपक्ष का सही उम्मीदवार पेश करने की कवायद की जगह अंधाधुंध मोदी का विरोध हिंदुत्व की राजनीति की जमीन पर किया गया,जो उग्र धर्मोन्मादी हिंदुत्व के ओबीसी कायाकल्प के आगे फ्लाप हो गया।इसी के साथ हिंदुत्व ध्रूवीकरण और असहिष्णु धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद की सुनामी चल पड़ी जो अब  भी जारी है।

संघ परिवार ने अपनी राजनीति के हिसाब से सामाजिक यथार्थ के मुकाबले खुद को काफी हद तक बदल लिया है लेकिल संघ विरोधी हिंदुत्व राजनीति का सामंती और औपनिवेशिक चरित्र और मजबूत होता गया।विचारधारा के पाखंड के सिवाय उसके पास कुछ भी नहीं बचा।न जनाधार ,न आंदोलन और न वोटबैंक।

हिंदुत्व के इस अभूतपूर्व पुनरूत्थान के लिए, भारतीय जनता और बारतीय लोकतंत्र,इतिहास और संस्कृति से विस्वासघात का सबसे बड़ा अपराधी यह पाखंडी,मौकापरस्त,जड़ों से कटा,जनविरोधी विपक्ष है जिसने पूरा देश,देश के सारे संसाधन और पूरी अर्थव्यवस्था नरसंहारी कारपोरेट हिंदुत्व के हवाले कर दी।

जमीन पर प्रतिरोध की बात रही दूर,राजनीतिक विरोध की जगह राजनीतिक आत्मसमर्पण की उसकी आत्मघाती राजनीति का उदाहरण पिछला लोकसभा चुनाव रहा है,जिसपर हमने अभी चर्चा नहीं की कि कैसे मोदी को विपक्ष ने भस्मासुर बना दिया।फिर राष्ट्रपति चुनाव में संघ परिवार के साथ विपक्ष का  लुकाछिपी खेल सत्ता व्रग की नूरा कुश्ती का ही जलवाबहार है।

इस बार भी विपक्ष प्रधानमंत्रित्व की तर्ज पर राष्ट्रपति चुनाव में धर्मनिरपेक्ष उम्मीदवार पर सहमति जताने में जुटा रहा और संघ परिवार के सोशल इंजीनियरिग और डायवर्सिटी मिशन से बेखबर रहा,सीधे तौर पर मामला यही लगता है लेकिन थोड़ी गहराई से देखें तो यह बात समझने वाली है कि मनुस्मृति मुक्तबाजारी रंगभेदी हिंदुत्व का एजंडा लागू करने के लिए संघ परिवार ने कांग्रेस और वामदलों के विपरीत, विपक्ष के ब्राह्मणवाद के मुकाबले ओबीसी, पिछड़ों,आदिवासियों,स्त्रियों  और अल्पसंख्यकों को भी जहां जरुरत पड़ी,वहां नेतृत्व देने से परिवार हिचका नहीं।

कांग्रेस लगातार मुंह की खाने के बावजूद वंश वर्चस्व के शिकंजे से उबर नहीं सकी तो भारतीय राजनीति में हाशिये पर चले जाने के बावजूद वामदलों ने किसी भी स्तर पर अभी तक दलितों, पिछड़ों,आदिवासियों,स्त्रियों और अल्पसंख्यकों को नेतृत्व देने की पहल नहीं की ।

यही नहीं,भारत में हिंदी प्रदेशों के महत्व को सिरे से नजरअंदाज करते हुए हिंदी भाषियों के नेतृत्व और प्रतिनिधित्व से भा वामदलों ने दशकों से परहेज किया है।

बंगाली और मलयाली वर्चस्व की वजह से वाम दलों का राष्ट्रीय चरित्र ही नहीं बन सका है।

बंगाल में कड़ी शिकश्त  मिलने के बाद संगठन में बदलाव की जबर्दस्त मांग के बावजूद पार्टी में कोई खास संगठनात्मक बदलाव नहीं किया गया तो केरल में दलित और ओबीसी नेतृत्व को लगातार हाशिये पर डाला गया है।

इसके विपरीत संघ परिवार ने लगातार हर स्तर पर दलितों,पिछड़ों,आदिवासियों को जोड़कर हिंदुत्व के ध्रूवीकरण की रणनीति बनायी है।

दलित,पिछड़ा और अल्पसंख्यक वोटबैंक तोड़कर ही संघ परिवार को यूपी जीतने में मदद मिली है,इस सच को उग्र हिंदुत्व के प्रतीक योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से विपक्ष भूल गया।

दलित और ओबीसी राजनीति में भी मजबूत जातियों का वर्चस्व है, जिसका फायदा भाजपा ने कमजोर जातियों को अपने पाले में खीचकर किया और लगातार विपक्ष के दलित,पिछड़ा और आदिवासी चेहरों को अपने खेमे मेंशामिल करने से कोई परहेज नहीं किया।

नतीजा ,ओबीसी प्रधानमंत्री के बाद दलित राष्ट्रपति का हिंदुत्व दांव, मुकाबले में धर्मनिरपेक्ष विपक्ष चारों खाने चित्त!

अब कोई फर्क शायद नहीं पड़ने वाला है कि रामनाथ कोविंद  के राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाने के संघ परिवार के सोशल इंजीनियरिंग का हम चाहे जो मतलब निकाल लें।

मोहन भागवत,द्रोपदी मुर्मु और आडवाणी के नाम चलाकर विपक्ष को चारों खाने चित्त कर देने की उनकी रणनीति अपना काम कर गयी है और विपक्षी एकता तितर बितर है।क्षत्रपों के टूटने के आसार है और दलित वोट बैंक खोने के डर से कोविंद के विरोध का जोखिम वोटबैंक राजनीति में जीने मरने वाले राजनीतिक दलों के लिए लगभग असंभव है।

खबर यह है कि संघ परिवार के दलित प्रत्याशी के मुकाबले अपने घोषित उम्मीदवार गोपाल कृष्ण गांधी की जगह किसी दलित चेहरे की खोज चल रही है।जबकि अपना उम्मीदवार को आसानी से जिताने के लिए पर्याप्त वोट का जुगाड़ पहले ही संघ परिवार ने कर लिया है।

हालत यह है कि विपक्ष की बोलती बंद हो गयी है और अब जबकि एनडीए प्रत्याशी के रूप में रामनाथ कोविंद के नाम का ऐलान हो गया है, कांग्रेस समेत समूचे संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) तथा वामदलों, तृणमूल कांग्रेस, आदि विपक्षी पार्टियों को फैसला करना होगा कि वे राष्ट्रपति पद के लिए अपना प्रत्याशी खड़ा करना चाहते हैं या एनडीए के प्रत्याशी को ही समर्थन देंगे।

हालांकि कांग्रेस ने अपनी पहली प्रतिक्रिया में सावधानी बरतते हुए यह तो कहा है कि बीजेपी ने रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा कर एकतरफा फैसला किया है, लेकिन कोविंद तथा उनकी उम्मीदवारी को लेकर कोई टिप्पणी करने से इंकार कर दिया है।

अब गोपाल कृष्ण गांधी के बदले सिर्फ भाजपाई उम्मीदवार के विरोध की वजह से मीरा कुमार जैसे किसी दलित चेहरे को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाया जाता है तो विपक्ष की धर्मनिरपेक्षता का पाखंड भी बेनकाब होने वाला है।

अब भाजपाई उम्मीदवार की जीत तय मनने के बावजूद अपना दलित उम्मीदवार खड़ा करता है विपक्ष तो सवाल यह है कि संघ परिवार के एजंडे के विरोध के बावजूद उसने संघ परिवार के उम्मीदवार पर सहमति उसका नाम घोषित होने के बाद देने का दांव क्यों खेला,क्यों नहीं अपनी विचारधारा के मुताबिक अपने उम्मीदवार का ऐलान पहले ही कर दिया चाहे वह दलित हो न हो?

विचारधारा की इतनी परवाह थी तो संसद में आर्थिक सुधारों या आधार पर विपक्ष कैसे सहमत होता रहा।नीति निर्माण में सहमति और राजकाज के समक्ष आत्मसमर्पण,बहुजनों को नेतृत्व देने से इंकार और सिर्फ वोट बैंक के लिहाज से भाजपा के हिंदुत्व के विरोध में अपने हिंदुत्वकी राजनीति के तहत मनुस्मृति की बहाली- विपक्ष की विचारधारा का सच यही है।

विपक्ष की यह हिंदुत्व राजनीति  हिंदुत्व के एजंडे के खिलाफ तो कतई नहीं है।

सारी विपक्षी कवायद वोट बैंक साधने की है और इस खेल में संघ परिवार ने उसे कड़ी शिकश्त दे दी है।

जाति वर्ण के सत्ता वर्ग के हित में विपक्ष को संघ परिवार की इस जीत से कोई फ्रक नहीं पड़ा और कहना होगा कि मोदी की निरंकुश सत्ता में विपक्ष की भी हिस्सेदारी है और मोदी के उत्थान में भी उसका हाथ है।

वोटबैंक की राजनीति को किनारे रखकर हिंदुत्व राजनीति में भाजपा के सबसे प्राचीन सहयोगी शिवसेना सुप्रीम उद्धव ठाकरे ने हालांकि भाजपा के इस फैसले को वोटबैंक की राजनीत कह दिया है।मराठी मीडिया के मुताबिकः

राष्ट्रपतिपदाचे उमेदवार म्हणून दलित चेहरा असलेले बिहारचे राज्यपाल कोविंद यांच्या उमेदवारीला शिवसेनेने विरोध दर्शवला आहे. 'दलित समाजाची मते मिळवण्यासाठी जर दलित उमेदवार दिला जात असेल तर त्यात आम्हाला रस नाही', अशा स्पष्ट शब्दात उद्धव ठाकरे यांनी कोविंद यांची उमेदवारी शिवसेनेला मान्य नसल्याचे स्पष्ट संकेत दिले आहेत.


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Saturday, June 17, 2017

हिंदुत्व एजंडा को राष्ट्रपति ने दी वैधता! फिरभी विचारधारा के धारकों वाहकों की खामोशी हैरतअंगेज! आरएसएस प्रणव को फिर राष्ट्रपति बनाये तो क्या विपक्ष समर्थन करेगा? क्या भारत के राष्ट्रपति भवन से निकलकर प्रणव मुखर्जी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के राष्ट्रीय प्रचारक बनकर गायत्री मंत्र जाप का प्रशिक्षण देगें? पलाश विश्वास

हिंदुत्व एजंडा को राष्ट्रपति ने दी वैधता!

फिरभी विचारधारा के धारकों वाहकों की खामोशी हैरतअंगेज!

आरएसएस प्रणव को फिर राष्ट्रपति बनाये तो क्या विपक्ष समर्थन करेगा?

क्या भारत के राष्ट्रपति भवन से निकलकर प्रणव मुखर्जी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के राष्ट्रीय प्रचारक बनकर गायत्री मंत्र जाप का प्रशिक्षण देगें?

पलाश विश्वास

 

संघ परिवार के सुप्रीमो से भारत के राष्ट्रपति की शिष्टाचार मुलाकात से एकात्मकता यात्रा के समापन पर नई दिल्ली पहुंचने के बाद संघ सुप्रीमो बालासाहेब देवरस की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की अगवानी का इतिहास याद आ रहा है।

आपातकाल के दौरान आरएसएस पर रोक लगाने वाली इंदिरा गांधी का यह कदम भारत की राजनीति में हिंदुत्व के पुनरूत्थान का टर्निंग पाइंट कहा जा सकता है और इसके बाद आपरेशन ब्लू स्टार के साथ साथ राम जन्म भूमि आंदोलन के साथ संग परिवार और कांग्रेस के चोली दामन के रिश्ते के साथ साथ कारपोरेट हिंदुत्व के शिकंजे में यह भारत राष्ट्र फंसता ही चला गया है।

गौरतलब है कि प्रणव मुखर्जी इंदिरा गांधी के खास सिपाहसालार और रणनीतिकार रहे हैं और हिंदुत्व के पुनरूत्थान के साथ ही मुक्तबाजारी कारपोरेट हिंदुत्व एजंडे में उनकी भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है।इसी के साथ आधार परियोजना,कर सुधार से लेकर आटोमेशन और निजीकरण, विनिवेश से लेकर डायरेक्ट टैक्स कोड और जीएसटी जैसे आर्थिक सुधार उन्हीके शुरु किये हैं,जिसपर संघ परिवार अब बेहद तेजी से अमल कर रहा है।

प्रणव मुखर्जी के बजट में इन्हीं सुधारों पर 2011 में मेरी एक किताब भी प्रकाशित हुई थीः प्रणव मुखर्जी का बजेट = पोटाशियम सायनाइड।

इस शिष्टाचार मुलाकात के नतीजे भी दीर्घकालीन होगें।

गौरतलब है कि भारत के राष्ट्रपति के लिए संवैधानिक पद पर बहाल किसी देशी विदेशी व्यक्ति के साथ शिष्टाचार मुलाकात के लिए न्यौता दिये जाने की परिपाटी है।

गौरतलब है कि संघ सुप्रीमो हमारी जानकारी के मुताबिक ऐसे किसी संवैधानिक पद पर नहीं है और न ही वे किसी लोकतांत्रिक संस्थान या किसी राजनीतिक दल का प्रतिनिधित्व करते हैंं।

इस शिष्टाचार का मतलब क्या है,यह समझना मुश्किल है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ घोषित तौर पर अराजनीतिक हिंदू सांस्कृतिक संगठन है जिसका राजनीतिक एजंडा हिंदू राष्ट्र का है और उसकी राजनीतिक शाखा भारत की सत्ता में बहाल होकर रंगभेदी मनुस्मृति राजकाज की नरसंहार संस्कृति का कारपोरेट एजंडा लागू कर रही है।

आज तक राष्ट्रपति भवन से पहले किसी संघ सुप्रीमो के साथ ऐसी शिष्टाचार मुलाकात के लिए किसी राष्ट्रपति के न्यौता दिये जाने की कोई घटना मेरी स्मृति में नहीं है।आजतक किसी भी दौर में संघ परिवार के मुख्यालय से भारत सरकार की नीतियां तय नहीं हो रही थी।

इस लिहाज से यह शिष्टाचार भेंट अभूतपूर्व है।

राष्ट्रपति की इस अभूतपूर्व पहल से संघ परिवार के हिंदुत्व एजंडा को वैधता मिली है क्योंकि भारत के राष्ट्रपति के संवैधानिक पद से लोकतंत्र, सहिष्णुता, धर्मनिरपेक्षता, विविधता,बहुलता,सत्य,अहिंसा जैसे तमाम मूल्यों के पक्ष में आज तक के सारे वक्तव्य रहे हैं,जिनका संघ परिवार के अतीत,वर्तमान और भविष्य से कोई नाता नहीं रहा है।

भारत के राष्ट्रपति ने संघ परिवार के राष्ट्रद्रोही एजंडा को इस शिष्टाचार मुलाकात से वैधता दी है और विडंबना है कि विचारधाराओं के धारक वाहक  सत्ता वर्ग के विद्वत जन से लेकर राजनीति के तमाम खिलाड़ी इस प्रसंग में खामोश हैं।

क्या दोबारा राष्ट्रपति बनकर रायसीना हिल्ज के राजमहल में पांच साल और ठहरने के इरादे से संघ परिवार के समर्थन हासिल करने के लिए महामहिम ने यह न्यौता दिया है?

क्योंकि अपने लंबे राजनीतिक अनुभव के मद्देनजर उन्हें मालूम है कि राष्ट्रपति चुनाव के लिए आम सहमति का उम्मीदवार खोजना संघ परिवार के लिए मुश्किल है और मोहन भागवत को सीधे राष्ट्रपति बनाकर कोई बड़ा राजनीतिक जोखिम संघ परिवार उठाने नहीं जा रहा है और संघ परिवार समर्थन कर दें,तो विपक्ष उनके नाम पर सहमत हो सकता है।

क्या भारत के राष्ट्रपति भवन से निकलकर प्रणव मुखर्जी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के राष्ट्रीय प्रचारक बनकर गायत्री मंत्र जाप का प्रशिक्षण देगें?

गौरतलब है कि शिवसेना भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए शुरु से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सुप्रीमो मोहन भागवत को राष्ट्रपति बनाने की मुहिम छेड़ी हुई है।इस बीच राष्ट्रपति चुनाव के लिए चुनाव आयोग ने अधिसूचना जारी कर दी है और समूचा विपक्ष अब भी संघ परिवार के उम्मीदवार का नाम घोषित किये जाने का इंतजार कर रहा है ताकि सहमति से नया राष्ट्रपति का चुनाव हो सके।

इसी परिदृश्य में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने मोहन भागवत से मुलाकात कर ली है। मीडिया के मुताबिक राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने शुक्रवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक मोहन भागवत को राष्ट्रपति भवन में दोपहर के भोजन पर आमंत्रित किया।

आरएसएस के सूत्रों के मुताबिकभागवत राष्ट्रपति से मुलाकात के लिए रुद्रपुर से शुक्रवार को ही राष्ट्रीय राजधानी पहुंचे। वह संघ के स्वयंसेवक शिक्षण और प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल होने के लिए गुरुवार को रुद्रपुर में थे।

गौर करें कि संघ के स्वयंसेवक शिक्षण और प्रशिक्षण शिविर से लौटकर मोहन भागवत सीधे राष्ट्रपति भवन गये।जिसका महिमामंडन का यह शिष्टाचार है।

बहरहाल  राष्ट्रपति चुनाव से ऐन पहले हुई इस मुलाकात ने राजनीतिक हलकों में अटकलों को हवा दी है। इस पर संघ परिवार की सफाई है कि यह पूर्व निर्धारित शिष्टाचार भेंट थी और इसके कोई निहितार्थ नहीं निकाले जाने चाहिए।

क्या इस मुलाकात के बाद संघ परिवार के अनुमोदन पर प्रणव मुखर्जी को दोबारा राष्ट्रपति चुनने के किसी प्रस्ताव पर विपक्ष समहत हो जायेगा?

गौरतलब है कि कांग्रेस जमाने में तमाम घोटालों में महामहिम के नाम नत्थी हैं।लेकिन भारत के राष्ट्रपति होने की वजह से संवैधानिक रक्षाकवच के चलते उनपर कोई मामला बनता ही नहीं है और उनकी भूमिका की जांच पड़ताल हो सकती है।

उनके इस संवैधानिक रक्षा कवच का लाभ पक्ष विपक्ष के राजनेताओं और सत्ता वर्ग को भी मिली है जिसकी वजह से वे राष्ट्रपति लगभग आम सहमति से बन गये।अब भी वही स्थिति जस की तस है।

वैसे भी अपनी दिनचर्या गायत्री मंत्र से शुरु करने वाले प्रणव मुखर्जी ने राष्ट्रपति भवन को हिंदुत्व का धर्मस्थल में तब्दील कर दिया है और वे अपने कार्यकाल के दौरान अपने पैतृतिक गांव जाकर दुर्गा पूजा करते रहे हैं।

वे न सिर्फ बंगाल के ब्रह्मणवादी वर्चस्व के बल्कि भारतीय ब्राह्मणवादी मनुस्मृति कुलीन निरंकुश रंगभेदी सैन्यतंत्र के भीष्म पितामह हैं।इस हैसियत से उनकी संघ सुप्रीमो के साथ शायद शिष्टाचार मुलाकात बनती है और इसलिए सत्ता वर्ग को इससे खास ऐतराज भी नहीं है।

Friday, June 16, 2017

अब क्या ताजमहल भी तोड़ देंगे? जैसे बाबरी विध्वंस हुआ,जैसे मोहंजोदोड़ो और हड़प्पा की नगर सभ्यता को ध्व्सत कर दिया, उसी तरह? भारत में आदिवासियों के खिलाफ युद्ध क्यों जारी है? भारत में महिलाओं और दलितों पर अमानुषिक अत्याचार क्यों होते हैं? बाकी भारत के लिए कश्मीर या पूर्वोत्तर के लोग विदेशी क्यों हैं? गाय हमारी माता कैसे हैं? दंगों का सिलसिला क्यों खत्म नहीं होता? सिखों का नरसंहार क्य�

अब क्या ताजमहल भी तोड़ देंगे? जैसे बाबरी विध्वंस हुआ,जैसे मोहंजोदोड़ो और हड़प्पा की नगर सभ्यता को ध्व्सत कर दिया, उसी तरह?

भारत में आदिवासियों के खिलाफ युद्ध क्यों जारी है?

भारत में महिलाओं और दलितों पर अमानुषिक अत्याचार क्यों होते हैं?

बाकी भारत के लिए कश्मीर या पूर्वोत्तर के लोग विदेशी क्यों हैं?

गाय हमारी माता कैसे हैं?

दंगों का सिलसिला क्यों खत्म नहीं होता?

सिखों का नरसंहार क्यों हुआ?

गुजरात का नरसंहार क्यों हुआ?

यूपी के मुख्यमंत्री के अभूतपूर्व वक्तव्य में इन सारे सवालों के जबाव है।

जो भी कुछ भारत में हिंदुत्व के प्रतीक नहीं है,वे अब तोड़ दिये जायेंगे।जो भी भारत में सवर्ण हिंदू नहीं हैं,वे मार दिये जायेंगे।

पलाश विश्वास

बेहद खराब दौर चल रहा है भारतीय इतिहास का और निजी जिंदगी पर सरकार,राजनीति और अर्थव्यवस्था के चौतरफा हस्तक्षेप से सांस सांस के लिए बेहद तकलीफ हो रही है।

राजनीति का नजारा यह है कि पैदल सेना को मालूम ही नहीं है कि उनके दम पर उन्हीं का इस्तेमाल करके कैसे लोग करोड़पति अरबपति बन रहे हैं और उनके लिए दो गज जमीन या कफन का टुकड़ा भी बच नहीं पा रहा है।

यह दुस्समय का जलवा बहार है जब भारत की राजनीति ही सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदा बन गयी है। नोटबंदी पर तुगलकी अंदाज से जनता का जो पैसा खर्च हो गया है,अब पंद्रह लाख रुपये हर खाते में जमा होने पर भी उसकी भरपाई होना मुश्किल है।

विकास दर में दो प्रतिशत कमी के आंकड़े से गहराते भुखमरी ,बेरोजगारी और मंदी के मंजर को समझा नहीं जा सकता जैसे किसी को अंदाजा भी नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट के अनगिनत फैसलों के बावजूद निराधार आधार के डिजिटल इंडिया में हर बुनियादी सेवा को बायोमेट्रिक डैटा से जोड़कर किस तरह जनसंख्या के सफाये की तैयारी हो रही है।राजनीति में इसपर आम सहमति है।

बाद में जीएसटी की वजह से क्या आंकड़े बनेंगे,यह तो वक्त ही बतायेगा।इस पर भी स्रवदलीयआम सहमति है।

फिलहाल तीन साल पूरे होने के बाद कालाधन निकालने का नया शगूफा भी शुरु हो गया कि स्विस सरकार आटोमैटिकैलि स्विस बैंकों में जमा की जानकारी भारत को दे देगा।मारीशस, दुबई और दुनियाभर से कालाधन की जो अर्थव्वस्था भारत में चल रही है,उससे बदली हुई परिस्थितियों में कितना काला धन नोटबंदी की तर्ज पर स्विस बैंक से भारतीय नागरिकों के खाते में आना है,यह देखते रहिये।

हमारे पांव अब भी गावों के खेत खलिहान में जमे हुए हैं और मौत कहां होगी,यह अंदाजा नहीं है तो महानगर में प्रवास से हमारा कोई कायाकल्प नहीं हुआ है।

हम विद्वतजनों में शामिल नहीं हैं।निजी रिश्तों से ज्यादा देशभर के जाने पहचाने लोगों से हमारे रिश्ते रहे हैं।विचारधारा के स्तर पर हम सौ टका खरा हों न हों,अपने दोस्तों और साथियों से दगा हमने कभी नहीं किया और किसी की पीठ पर छुरा भोंका नहीं है।

इसलिए देश भर में जो घटनाएं दुर्घटनाएं हो रही हैं ,उनके शिकार लोगों की पीड़ा से हम वैसे ही जुड़े हैं,जैसे जन्मजात शरणार्थी और अछूत होने के बाद बहुजनों और किसानों,मजदूरों,विस्थापितों और शरणार्थियों से हम जुड़े हैं।

किसानों पर जो बीत रही है,वह सिर्फ कृषि संकट का मामला नहीं है और न ही सिर्फ बदली हुई अर्थव्यवस्था का मामला है।

यह एक उपभोक्ता समाज में तब्दील बहुजनों,किसानों और मजदूरों के उत्पादन संबंधों में रचे बसे सामाजिक ताने बाने का बिखराव का मामला है।

अर्थव्यवस्था के विकास के बारे में तमाम आंकड़ों और विश्लेषण का आधार उपभोक्ता संस्कृति है।यानी जरुरी गैर जरुरी जरुरतों और सेवाओं पर बेलगाम खर्च से बाजार की ताकतों को मजबूत करने का यह अर्थशास्त्र है।

इस प्रक्रिया में जो सांस्कृतिक नींव भारतीय समाज ने खो दी है,उसकी नतीजा यह धर्मोन्माद, नस्ली नरसंहार संस्कृति,असहिष्णुनता और मानवताविरोधी प्रकृति विरोधी ,धर्म विरोधी,आध्यात्म विरोधी, इतिहास विरोधी वर्चस्ववादी राष्ट्रवाद है,जिसका मूल लक्ष्य सत्ता वर्ग के कुलीन तबके के जनसंख्या के एक फीसद के अलावा बाकी लोगों का सफाया और यही राजनीति और राजकाज है।

कृषि संकट सिर्फ किसानों का संकट नहीं है,यह जनपदों का संकट है।

कृषि संकट सिर्फ किसानों का संकट नहीं है,यह भारतीय समाज का संकट है।

कृषि संकट सिर्फ किसानों का संकट नहीं है,यह मनुष्यता,प्रकृति और पर्यावरण का संकट है।

कृषि संकट सिर्फ किसानों का संकट नहीं है,यह भारतीय समाज,संस्कृति का संकट है।

कृषि संकट सिर्फ किसानों का संकट नहीं है,यह राजनीति और दर्शन, इतिहास, धर्म,आध्यात्म का भी संकट है।

हम मोहनजोदोड़ो और हड़प्पा के अवशेषों को लेकर चाहे जितना जान रहे होते हैं,उस सभ्यता का कोई सही इतिहास हमारे पास नहीं है।

आजादी की लड़ाई का सही इतिहास भी हमारे पास नहीं है।

अंग्रेजों से पहले भारत में जो सामाजिक राजनीतिक व्यवस्था रही है,उसके बारे में हम ब्यौरेवार कुछ नहीं जानते।

यह सांस्कृतिक वर्चस्व का मामला जितना है ,उससे कही ज्यादा सत्ता और राष्ट्र का रंगभेदी सैन्य चरित्र का मामला है।

अभी अभी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने जैसे फतवा दे दिया है कि ताजमहल हमारी संस्कृति नहीं है,उससे हमलावर सांस्कृतिक वर्चस्व के इतिहास को समझने की दृष्टि मिल सकती है।

उत्तर प्रदेश का विभाजन हो गया है लेकिन हमारे नैनीताल छोड़ने के वक्त उत्तराखंड भी उत्तर प्रदेश का हिस्सा रहा है।

जनम से उत्तर प्रदेश का वाशिंदा होने की वजह से हम उस प्रदेश की सहिष्णुता, बहुलता,विविधता और साझे चूूल्हें की विरासत को अब भी महसूस करते हैं।

अस्सी के दशक में मंदिर मस्जिद विवाद और आरक्षण विरोधी आंदोलन से लेकर हालात बेहद बदल गये हैं और दैनिक जागरण और दैनिक अमर उजाला में काम करते हुए यह बदलाव हमने नजदीक से देखा भी है।

फिरभी सिर्फ जनसंख्या की राजनीति के तहत संवैधानिक पद से लखनऊ से घृणा और हिसां की यह भाषा दिलो दिमाग को लहूलुहान करती है।

तो क्या बाबरी विध्वंस के बाद भारतीय इतिहास और संस्कृति के लिए दुनियाभर के लोगों के सबसे बड़े आकर्षण ताजमहल को तोड़ दिया जाएगा?

गौरतलबहै कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए ताजमहल एक इमारत के सिवा कुछ नहीं है। उन्होंने इसे भारतीय संस्कृति का हिस्सा मानने से इनकार कर दिया। उत्तरी बिहार के दरभंगा में गुरुवार (15 जून) को एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, देश में आने वाले विदेशी गणमान्य व्यक्ति ताजमहल और अन्य मीनारों की प्रतिकृतियां भेंट करते थे जो भारतीय संस्कृति को प्रतिबिंबित नहीं करते हैं।

भारत में आदिवासियों के खिलाफ युद्ध क्यों जारी है?

भारत में महिलाओं और दलितों पर अमानुषिक अत्याचार क्यों होते हैं?

बाकी भारत के लिए कश्मीर या पूर्वोत्तर के लोग विदेशी क्यों हैं?

गाय हमारी माता कैसे हैं?

दंगों का सिलसिला क्यों खत्म नहीं होता?

सिखों का नरसंहार क्यों हुआ?

गुजरात का नरसंहार क्यों हुआ?

इस अभूतपूर्व वक्तव्य में इन सारे सवालों के जबाव है।

जो भी कुछ भारत में हिंदुत्व के प्रतीक नहीं है,वे अब तोड़ दिये जायेंगे।जो भी भारत में सवर्ण हिंदू नहीं हैं,वे मार दिये जायेंगे।

 

Wednesday, June 14, 2017

रणजीत विश्वकर्मा असमय निधन से भीतर से बहुत कुछ टूट बिखर रहा है।


णजीत विश्वकर्मा  असमय निधन से भीतर से बहुत कुछ टूट बिखर रहा है।

पलाश विश्वास
उत्तराखण्ड आंदोलन व उत्तराखण्ड क्रान्ति दल के वरिष्ठ नेता रणजीत विश्वकर्मा नहीं रहे . लम्बे समय से गुर्दे की बीमारी से पीड़ित रणजीत दा ने हल्द्वानी के बेस अस्पताल में अपनी देह त्याग दी . लगभग 63 साल के थे रणजीत दा . उन्हें विनम्र अंतिम नमन !
यह खबर सुनकर थोड़ा जोरदार झटका लगा है।अभी नैनीताल में महेश जोशी जी से बात हो सकी है।पवन राकेश दुकान में बिजी हैं।काशी सिंह ऐरी और नारायण सिंह जंत्वाल से लंबे अरसे से संवाद हुआ नहीं है।
  मैं जिन रणजीत विश्वकर्मा को जानता हूं,जो डीएसबी कालेज में मेरे सहपाठी थे और शुरु से काशी सिंह के सहयोगी रहे हैं,मुंश्यारी में उनका घर है।वे मेरे साथ ही अंग्रेजी साहित्य के छात्र थे।उक्रांद से जब काशी विधायक बने तो लखनऊ से मुझे फोन भी किया था। 
महेशदाज्यू ने कंफर्म किया है कि वे मुंश्यारी के है।
फोटो से पहचान नहीं सका क्योंकि रणजीत इतने दुबले पतले थे नहीं।बल्कि मैं और कपिलेश भोज बहुत दुबले पतले थे।दोस्तों में रणजीत हट्टे कट्टे थे।
थोड़ी उलझन उम्र को लेकर भी हो रही है।मुंश्यारी के होने की वजह से हमसे थोड़ी देर से स्कूल में दाखिला हुआ भी होगा तो रणजीत की उम्र साठ साल से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।
उक्रांद में मैं कभी नहीं रहा हूं और हम लोग जब नैनीताल में थे,तब उत्तराखंडआंदोलन के साथ भी नहीं थे।लेकिन काशी सिंह ऐरी के अलावा दिवंगत विपिन त्रिपाठी से भी नैनीताल समाचार की वजह से बहुत अंतरंगता रही थी।नैनीताल छोड़ने के बाद भी जब तक वे जीवित रहे,उनसे संवाद रहा है।पीसी तिवारी भी राजनीति में हैं।उनसे यदा कदा संवाद होता रहता है।जंत्वाल नैनीताल में ही है,वह हम लोगों से जूनियर था डीएसबी में,लेकिन मित्र था।उससे कभी नैनीताल छोड़ने के बाद नैनीताल में एकाद मुलाकात के अलावा अलग से बात हो नहीं सकी है।
डीएसबी के मित्रों में निर्मल जोशी आंदोलन और रंगकर्म में हमारे साथी थे।फिल्मस्टार निर्मल जोशी हम लोगों से जूनियर थे।इन दोनों के निधन को अरसा हो गया।
गिरदा को भी दिवंगत हुए कई साल हो गये।
नैनीताल के ही हमारे पत्रकार सहकर्मी सुनील साह और कवि वीरेनदा हाल में दिवंगत हो गये।
रणजीत बेहद सरल ,मिलनसार,प्रतिबद्ध और ईमानदार मित्र रहे हैं।डीएसबी में हम लोग चार साल साथ साथ थे।चिपको आंदोलन के दौरान हम सभी एक साथ थे,जिसमें राजा बहुगुणा,पीसीतिवारी,जगत रौतेला,प्रदीप टमटा सांसद भी शामिल हैं।
रणजीत विश्वकर्मा  असमय निधन से भीतर से बहुत कुछ टूट बिखर रहा है।

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