तो क्या यूं ही काल का ग्रास बन जाएगा, नैनीताल ?
नैनीताल से प्रयाग पाण्डे
कहते है कि सियासत जब जन सरोकारों से दूर हो, सत्तान्मुखी हो जाती है तो नौकरशाही की बन आती है। अपनी सुविधा और मर्जी से संचालित नौकरशाही कुछ भी गुल खिला सकती है। नैनीताल की हिल सार्इट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ समिति इस बात का जिन्दा सबूत है। नैनीताल की कमजोर पहाडि़यों की हिफाजत और यहा के सुन्दर तालाब व नालातंत्र की देख-रेख एवं रखरखाव की मंशा से पिच्चासी साल पहले बनी हिल सार्इट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ समिति सरकारी मशीनरी के नकारापन के चलते अपनी अहमियत गवा चुकी है। अलग राज्य बनने के बाद अफसरशाही ने इस विशेषज्ञ समिति का वजूद खतम कर दिया है। पिछले एक दशक से इस कमेटी की बैठक नहीं बुलार्इ जा रही है। इस उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति के बारे में सरकारी अमले के फौरी और टालू रवैये की वजह से आज विश्व विख्यात इस पर्यटन नगरी के वजूद के ऊपर खतरे के बादल मड़राने लगे है। हिल सार्इट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ समिति के पहले अध्यक्ष और कुमाऊँ के डिप्टी कमीश्नर सी. एल. विवियन की यहा के बारे में सितम्बर 1928 की समीक्षात्मक रपट और कमेटी ने नैनीताल के तालाब,पहाडि़यो और नालों के रखरखाव के लिए 1930 में जारी स्टैडिंग आर्डरों को ठण्डे बस्ते के हवाले कर देने से आज यह नगर असुरक्षा के कगार पर जा पहुचा है।
नैनीताल भू-गर्भीय नजरिये से बेहद कमजोर मानी जाने वाली पहाडि़यों पर बसा है। यह नगर बसने के बाद से अब तक दर्जनों छोटे-बडे़ भू-स्खलनों को झेल चुका है। नैनीताल में 1840 में बसासत शुरू हुर्इ थी। बसासत के सत्रह साल बाद यहा पहला भू-स्खलन हुआ। 1867 में शेर का डांडा नाम की पहाडी़ में हुए इस भू-स्खलन ने तब की ब्रिटिश सरकार को यहा की पहाडि़यों के कमजोर होने का एहसास करा दिया था। ब्रिटिश हुकूमत इस बारे में सचेत भी हो गर्इ थी। 1867 के भू-स्खलन के फौरन बाद तात्कालीन बि्रटिश सरकार ने भू-स्खलन की वजहों की जाच के वास्ते इंजीनियरों की एक कमेटी बनार्इ। इसके छ:ह साल बाद 1873 में इंजीनियराें की एक और कमेटी बनी। इन कमेटियों ने यहा की पहाडि़यों की हिफाजत और तालाब की सेहत के मददेनजर यहा नालों और सुरक्षा दीवारें बनाने का सुझाव दिया।
नैनीताल की बसासत के चालीस साल बाद 18 सितम्बर, 1880 में यहा एक और जबरदस्त विनाशकारी भू-स्खलन हुआ। इसमें 151 लोग मारे गये। तब एशिया का सबसे भव्य समझा जाने वाले विक्टोरिया होटल समेत इसके आस-पास के कर्इ मकान मलवे में दब गये। तालाब का एक कोना मलवे से पट गया। स्नोभ्यू के पास बने तब के गवर्नमेंट हाऊस समेत पहाडी़ में सिथत दूसरे मकानों में दबरदस्त दरारे आ गर्इ। इस भू-स्खलन के बाद ब्रिटिश सरकार ने यहा के लिए भू-वैज्ञानिक आर. डी. ओल्हाम की अध्यक्षता में एक कमेटी बनार्इ। इस कमेटी ने यहा की पहाडि़यों की सुरक्षा के लिए चौदह उपाय सुझायें। इसी साल तत्कालीन कुमाऊँ कमिश्नर सर हेनरी रामजे की अध्यक्षता में भी एक और रामजे कमेटी बनीं। बि्रटिश गवर्नमेंट ने 1882 में आर. र्इ. फौरबेस की अध्यक्षता में एक कमेटी बनार्इ। 1883 में हैन्स लोव की अध्यक्षता में एक और कमेटी बनी।
इन कमेटियों की सस्तुतियों के आधार पर नार्थ वैस्टन प्रोविन्सेज अवध के अण्डर सिक्रेट्री ने 15 जुलार्इ 1890 को कुमाऊँ के अधिशासी अभियन्ता और जिला इंजीनियर को यहा की पहाडि़यों की सुरक्षा के लिए कारगर उपाय सुझाने और प्रदेश सरकार को जमीनी हालात से समय-समय पर वाकिफ कराने के आदेश दिये। आदेश में लोक निमार्ण विभाग से खास पुस्तक में यहा की पहाडि़यों में आ रही दरारें, भू-स्खलन, पहाडि़यों में हो रहे बदलाव और खतरनाक जगहों पर मौजूद बोल्डरों का सालाना रिकार्ड कायम करने को भी कहा गया।
1894 में सरकार ने यहा के बारे में एक और कमेटी बनार्इ। इस कमेटी को शेर का डांडा पहाडी में सिथत तब के राजभवन की सुरक्षा के बारे में रिपोर्ट देनी थी। कमेटी को मार्च 1895 से पहले रिपोर्ट देने को कहा गया। यह भी निर्देश दिये गये कि अगर यह इलाका कमजोर पाया गया तो 1895 की बरसात से पहले राजभवन का खाली करा लिया जाए। 22 अप्रैल, 1895 को इसी मकसद से एक और कमेटी बनी। जियोलाजीकल सर्वे आफ इंडिया के तब के निदेशक ग्रीस बैग व भू-वैज्ञानिक ओल्हाम को इस कमेटी का मैम्बर बनाया गया। 1896 में मिस्टर ओल्हाम व भू-गर्भ विज्ञान विभाग ने समूचे नैनीताल की गहरार्इ से भू-गर्भीय जाच की। यह रपट इसी साल भारत सरकार ने सार्वजनिक की। इसी वर्ष सरकार ने जियोलाजीकल सर्वे आफ इंडिया के कार्यवाहक सुपरिटेंडेन्ट थौम्स एच. हौलेन्ड से नैनीताल का सर्वे करवाया।
17 अगस्त 1898 को नैनीताल की जड़ से लगे बलियानाले में जबरदस्त भू-स्खलन हुआ। इसमें सत्तार्इस लोग मारे गये। यहा सिथत शराब बनाने वाली फैक्ट्री समेत आस-पास के अनेक घर मलवे में दब गये। इस भू-स्खलन की जाच के लिए सरकार ने भू-गर्भ विज्ञान विभाग के वैज्ञानिक मि. हौलेन्ड की अध्यक्षता में 1898 में फिर एक कमेटी बनार्इ। 1907 में बि्रटिश सरकार ने यहा के ब्रेमार और सेन्टलू पहाडी़ के सर्वेक्षण के वास्ते मि. हौलेन्ड की अगवार्इ में जाच कमेटी बनवार्इ। 1915 में यहा के पहाडि़यों के बारे में जिला इंजीनियर ओ. ओलिफ और अधिशासी अभियन्ता एच.जे. ओलिफैन्ट ने सालाना रपट छपार्इ। 1916 में चढ़ता हिल के बारे में एक कमेटी और बनी।
ब्रिटिश सरकार ने यहा की पहाडि़यों और तालाब की सुरक्षा के लिहाज से नैनीताल में एक नायाब नालातंत्र विकसित किया। इसे रखरखाव के लिहाज से बडा़ नाला सिस्टम, अयारपाटा नाला सिस्टम, शेर का डांडा नाला सिस्टम और तालाब के बाहर गिरने वाला नाला सिस्टम नाम से चार हिस्सों में बाटा। 1880 से 1928 के बीच यहा 56 बडे़ और 229 छोटे ब्रान्च नाले बनवाये। ये नाले करीब 53 किलोमीटर लम्बे थे। नालों की ऊँचार्इ, चौडा़र्इ और गहरार्इ का भी ब्यौरा रखा गया। कौन नाला किस जगह से बना और किस इंजीनियर ने बनवाया, इसका भी पूरा-पूरा ब्यौरा रखा जाता था। शेर का डांडा नाला सिस्टम के तहत 1880 से 1928 के बीच 22 बड़े और 111 छोटे नाले बने। बडा़ नाला सिस्टम में 1880 से 1900 के बीच 11 बडे़ और 71 छोटे नाले बनाये गये। अयारपाटा नाला सिस्टम में 1899 से 1904 के बीच 9 बडे़ और 5 छोटे नाले बनाये गये। जबकि तालाब से बाहर गिरने वाले 4 छोटे और 14 बडे़ नाले बने। इन नालों का निमार्ण 1900 से 1924 के बीच हुआ। 1903 से 1908 के बीच शहर में 10 बड़े और 11 छोटे नाले और बनाये गये।
6 सितम्र, 1927 को गवर्नमेंट के आदेश संख्या 163सी56 के जरिये नैनीताल के नाला तंत्र, पहाडि़यों व तालाब की हिफाजत की मंशा से हिल सार्इट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ समिति बनार्इ गर्इ। तब के डिप्टी कमिश्नर को इस कमेटी का अध्यक्ष, लो.नि.वि. के कुमाऊँ के अधिशासी अभियन्ता को पदेन सचिव बनाया गया। डिप्टी चीफ इंजीनियर, कार्यवाहक चीफ इंजीनियर, स्वास्थ्य विभाग, सिंचार्इ विभाग के कुमाऊँ डिवीजन के अधिशासी अभियन्ता और जियोलाजीकल सर्वे आफ इंडिया के असिस्टेंट भू-वैज्ञानिक इस कमेटी के सदस्य बनाये गये। हिल सार्इट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ समिति ने नैनीताल की बसासत के बाद यहा हुए भू-गर्भीय हलचलों और इस बारे में पहले बनी तमाम विशेषज्ञ कमेटियों की जाच रिर्पोटों और सालाना रपटों के आधार पर यहा की झील व पहाडि़यों का व्यापक सर्वे किया। समिति के अध्यक्ष और तब के डिप्टी कमिश्नर सी.एल. विवयन ने 24 सितम्बर, 1928 को नैनीताल के बारे में पहली समीक्षात्मक रपट सरकार को दी।
28 अगस्त, 1930 को हिल सार्इट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ कमेटी के पदेन सचिव डब्ल्यू. एफ. वार्नेस ने यहा के बारे में विशेषज्ञ समितियों की रपट के आधार पर तालाब, पहाडि़यों व नाला तंत्र के रखरखाव के लिए आधा दर्जन से ज्यादा स्टैणिडंग आर्डर जारी किये। इसमें वर्षा का सालाना औसत का रजिस्टर, तालाब के रखरखाव व डिस्चार्ज का लेखा-जोखा, वर्षा और पहाडि़यों की सुरक्षा कार्यो का रिकार्ड व रजिस्टर और औबजर्वेशन पीलरों का रिकाड़ रखना शामिल था। इस बारे में बकायदा फार्मो का खाका भी तय किया गया था। यहा के कोने-कोने के औबजर्वेशन पीलर बनाये गये। शहर को निमार्ण के लिए सुरक्षित और असुरक्षित दो भागों में बाटा गया। सड़क व नालों की फेहरिश्त बनार्इ गर्इ। नाले और सड़कों की लम्बार्इ-चौडा़र्इ वगैरह का रिकार्ड कायम किया गया।
शहर के नालों, सडकों, निमार्ण के लिए पाबन्दी वाले इलाकों, भू-स्खलन प्रभावित क्षेत्रों की हिफाजत और आबजर्वेशन कामों के लिए नियमित मुआयनों की जिम्मेदारिया तय की गर्इ। जूनियर इंजीनियर , असिस्टेंट इंजीनियर और अधिशासी अभियंता के मुआयने तय किये गये। मुआयनों के लिए बकायदा फार्म तय किये गये। आदेश दिया गया कि संबनिधत अफसर अपने तयशुदा मुआयनों के बाद इस बारे में बने रजिस्टरों में मुआयना रपट दर्ज करेंगे। बाद में इसे सालाना रपट के रूप में छापा जाता था। शुरूआत के कुछ सालों में हिल सार्इट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ कमेटी ने यहा के बारे में अपनी सालाना रपट जारी की। इन रपटों के आधार पर यहा के लिए सुरक्षात्मक उपाय तय किये जाते थे और उनमें अमल होता था।
आजादी के बाद 1949 में कुमाऊँ व उत्तराखंड के कमिश्नर की हैसियत से बी.आर. बोरा ने हिल सार्इट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ कमेटी के मामलों में दिलचस्पी दिखार्इ। उन्होंने 6 अप्रैल, 1949 को प्रदेश सरकार को पत्र भेजकर इस कमेटी में और महकमों को भी सदस्य बनाये जाने की सिफारिश की। इसके बाद इस उच्चस्तरीय विशेषज्ञ कमेटी को तकरीबन भूला सा दिया गया। 1976 में यहा के बारे में ए.के. सूर की अगुवार्इ में सूर कमेटी बनी। इस कमेटी ने यहा के बारे में अनेक अहम सुझाव सुझाये थे, पर उन पर अमल नहीं हुआ। हा, इस कमेटी के आने के बाद हिल सार्इट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ कमेटी ने भी कागजी खानापूर्ति का काम शुरू कर दिया। इसके बाद कमेटी ने 1976 से 1984 तक 9 साल लगातार सालाना मीटिगें की। मीटिगों में खूब प्रस्ताव पास किये, पर अमल एक पर भी नहीं किया। 1987 में नैनापीक मे भू-स्खलन के बाद कमेटी फिर सक्रिय हो गर्इ। कमेटी की साल में एक दफा मीटिगें होने लगी। पर उनमें तय मुद्दों में अमल करना तो दूर, कमेटी खुद के पास प्रस्तावों के उलट काम करती रही।
ब्रिटिश शासनकाल के दौरान तब के डिप्टी कमिश्नर सी.एल. विवयन की 1928 की रिर्पोट और 1976 में बनी ए.के.सूर कमेटी की रपट के अलावा हिल सार्इट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ कमेटी बनने के बाद इन 85 सालों के दौरान इसकी दो दर्जन से ज्यादा मीटिगें हो चुकी है। हरेक मीटिंग में यहा के तालाब, नाले, पहाडि़यों, सड़क, पीने के पानी, पेड़ व पर्यावरण समेत शहर से जुडे़ अहम मसलों पर विचार हुआ। प्रस्ताव बने। पास हुए। पर अमल नहीं हुआ। यहा तक की कमेटी ने श्री विवयन की 24 सितम्बर 1928 की रपट और 1867 से 1907 के दरम्यान यहा के बारे में बनी दर्जनों विशेषज्ञ समितियों की राय के आधार पर 28 अगस्त 1930 में Þहिल सार्इट सेफ्टी एवं लेक कन्ट्रोलÞ के बारे में बनाये गये नियमों का पालन नहीं करा पार्इ। जबकि हिल सार्इट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ कमेटी को यहा के तालाब व पहाडि़यों की हिफाजत के बारे में उच्चस्तरीय दर्जा हासिल है। तालाब और पहाडि़यों की सुरक्षा के बारे में उपाय सुझाने और उन पर अमल कराने की जिम्मेदारी इसी कमेटी की है। यहा किसी भी किस्म के निमार्ण काम से पहले हिल सार्इट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ कमेटी की अनापत्ति लेना जरूरी था। कुमाऊँ के कमिश्नर इस कमेटी के पदेन अध्यक्ष होते है।
पर हाल के वर्षो में इस कमेटी ने अपनी जिम्मेदारियों के प्रति कोताही ही नहीं बरती बलिक नैनीताल की हिफाजत के लिए बनाये गये कायदों को खुद तोडा़ भी है। शेर का डांडा पहाडी़ में जहा 1880 में जबरदस्त भू-स्खलन में 151 लोग मरे थे। इस भू-स्खलन के बाद यहा स्थित राजभवन को हटाना पडा़ था। इस पहाड़ी को निमार्ण के लिए निषिद्ध घोषित किये जाने के बावजूद कमेटी ने उसी पहाडी़ पर रोप-वे के भारी-भरकम निमार्ण की अनुमति दे दी। सियासी दबावों के चलते निमार्ण के लिए पाबंदी वाले अनेक इलाकों को सुरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया गया। शहर के लिए बतौर खून की नस का काम करने वाले नालों का विस्तार तो दूर पहले से बने नालों का भी सही तरीके से रखरखाव नहीं किया। कमेटी के लिए ये नाले महज आमदनी का जरिया बन गये। नतीजन शहर के दर्जनों नालों के ऊपर मकान और दूसरे निमार्ण कार्य हो गये है। शहर के ज्यादातर नाले देखरेख, मरम्मत और रखरखाव के बिना अपना वजूद ही गवां बैठे है।
इस शहर के प्रति जरूरत से ज्यादा उदासीनता और लापरवाही के चलते हिल सार्इट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ कमेटी की मौजूदगी अब महज कागजों तक सिमट कर रह गर्इ है। शहर के असितत्व से जुडे़ सवालों के मामले में कमेटी ने खुद को अप्रांसगिक ही नहीं बना दिया है बलिक नैनीताल के भविष्य से जुड़े मसलों को भी हाशिये में धकेल दिया है। एक दशक पहले तक हिल सार्इट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ कमेटी नैनीताल के वजूद का डर दिखाकर सरकार से ज्यादा से ज्यादा रकम हासिल करने की कोशिशें जरूर करती थी। अब वह भी बंद हो गया है।

No comments:
Post a Comment