| Tuesday, 17 September 2013 10:22 |
ज्ञान प्रकाश पिलानिया विश्व के सत्ताईस फीसद लोगों ने कहा कि उन्होंने पिछले साल भर के दौरान रिश्वत देकर काम कराया है। लेकिन अकेले भारत में यह आंकड़ा चौवन फीसद रहा। यानी हर दो में से एक भारतीय ने यह माना कि उसने रिश्वत दी है। भारत में सबसे ज्यादा भ्रष्ट समूहों, या कहें कि संस्थानों के बीच राजनीतिक दलों का नंबर सबसे ऊपर रहा। इनकी दर पांच के पैमाने पर 4.4 रही। इस आंकड़े में एक का मतलब सबसे कम भ्रष्ट और पांच के मायने सबसे ज्यादा भ्रष्ट। समझा जा सकता है कि ऊपर से सब कुछ अच्छा होने की हकीकत क्या है। इसी तरह, पुलिस महकमे को बहुत ज्यादा भ्रष्ट आंका गया। सर्वेक्षण में भारत के चालीस फीसद लोगों ने स्वीकार किया है कि देश में भ्रष्टाचार बहुत तेजी से बढ़ रहा है। लगभग सैंतालीस फीसद ने इसे एक बेहद गंभीर समस्या मानते हुए कहा कि इसका तत्काल निदान बहुत जरूरी है। इसी साल स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर कैग की एक रिपोर्ट में वीवीआइपी हेलिकॉप्टर में भी घपले के तथ्य सामने आए। रॉबर्ट वडरा के जमीन के सौदे को लेकर भी विवाद चल रहे हैं। उन पर आरोप है कि उन्होंने बहुत कम समय में जमीन की सौदेबाजी से सैकड़ों करोड़ रुपए की संपत्ति बनाई। हालांकि आज भ्रष्टाचार के हम्माम में कौन बचा हुआ है, कहना मुश्किल है। सुरेश कलमाडी, गोपाल कांडा, ए राजा, मधु कोड़ा, बाबू सिंह कुशवाहा जैसे नेता तो इस शृंखला में चंद नाम हैं। चिंताजनक यह है कि अगर हमारा समाज भी इस तरह के नेताओं के नक्शे-कदम पर चलने लगे तो हमारेलोकतंत्र के भविष्य का अंदाजा लगाने के लिए ज्यादा मेहनत करने की जरूरत नहीं है। गौरतलब है कि करीब साढ़े तीन हजार करोड़ रुपए की वीवीआइपी हेलिकॉप्टर खरीद में दलाली खाए जाने के आरोपों के संदर्भ में कैग की तेरह अगस्त को संसद में पेश की गई रिपोर्ट ने अनियमितताओं के लिए रक्षा मंत्रालय को कठघरे में खड़ा किया है और रक्षा-सामान की खरीद नीति के अनेक प्रावधानों के उल्लंघन के लिए मंत्रालय की जमकर खिंचाई की है। हालांकि इस सौदे की जांच सीबीआइ कर रही है और इटली में भी यह मामला अदालत में है। खुद रक्षामंत्री एके एंटनी मान चुके हैं कि इस सौदे में कुछ न कुछ गड़बड़ हुई। रक्षा मंत्रालय इस सौदे पर रोक लगा रहा है। रक्षा सौदों में रिश्वतखोरी देश के खिलाफ युद्ध और देशद्रोह के अपराध से कम नहीं है। ऐसे मामले पहले भी सामने आ चुके हैं। मगर इसके लिए आज तक किसी भी नेता या उच्चस्तर के अधिकारी को दोषी नहीं ठहराया जा सका है। भारत में जहां भ्रष्टाचारी अपराध करके भी आसानी से बच निकलते हैं और खुले घूमते हैं, वहीं कुछ समय पहले चीन की एक अदालत ने वहां के पूर्व रेलमंत्री लियू झिजुन को भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग के मामले में मौत की सजा सुनाई थी। मृत्युदंड की वकालत तो नहीं की जा सकती, लेकिन भ्रष्टाचार के मामलों पर सरकारी और सामाजिक सहनशीलता पर जरूर सवाल उठाए जाने चाहिए। सवाल है कि क्या हम अनैतिक हैं और इस तरह भ्रष्ट हैं? महात्मा गांधी की मान्यता थी कि राजनीति को उच्च मूल्यों और मानदंडों से परिचालित और शुचिता से अनुप्राणित होना चाहिए। लेकिन 'नेशनल इलेक्शन वॉच' की एक रिपोर्ट के मुताबिक पांच सौ तैंतालीस लोकसभा सदस्यों में से एक सौ बासठ यानी तीस फीसद के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें से छिहत्तर यानी चौदह फीसद पर गंभीर किस्म के अपराधों से संबंधित मुकदमे शामिल हैं। इसी तरह दो सौ बत्तीस राज्यसभा सदस्यों में से चालीस यानी सत्रह फीसद पर गंभीर आपराधिक मामले चल रहे हैं। देश में एक हजार दो सौ अट्ठावन विधायकों के खिलाफ कई तरह के अपराधों के मुकदमे दर्ज हैं, जिनमें से तीन सौ चौदह पर गंभीर आरोप हैं। केंद्र और राज्य सरकारों के कई मंत्री भी दागी हैं। 2004 के चुनावों से अब तक कांग्रेस के टिकट पर जो लोग विधायक और सांसद बने, उनमें से बाईस फीसद दागी हैं और इसी दौरान भाजपा के टिकट पर जो लोग विधायक और सांसद बने, उनमें से इकतीस फीसद ने अपने आपराधिक इतिहास का उल्लेख किया। इसके अलावा समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, जनता दल (एकी) और कई मामलों में वामदल भी दागी नेताओं के बचाव में खड़े दिखाई पड़ते हैं। आज हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती नैतिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता की भारी कमी है। भ्रष्टाचार पर काबू पाने और इसे खत्म करने के लिए सबसे जरूरी है इच्छाशक्ति, जो आज केंद्र से लेकर किसी भी राज्य सरकार के भीतर नहीं दिखाई देती।
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Wednesday, September 18, 2013
भ्रष्टाचार का भयावह मंजर
भ्रष्टाचार का भयावह मंजर
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