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Memories of Another day

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While my Parents Pulin babu and Basanti devi were living

Wednesday, March 26, 2014

लोकसभा चुनाव-2014 - हाँ, हमें चुनना तो है! लेकिन किन विकल्पों के बीच?

लोकसभा चुनाव-2014 - हाँ, हमें चुनना तो है! लेकिन किन विकल्पों के बीच?

Indian-_Election_Cartoonसाथियो!

16वें लोकसभा चुनाव सिर पर हैं। हमें फिर चुनने के लिए कहा जा रहा है। लेकिन चुनने के लिये क्या है? झूठे आश्वासनों और गाली-गलौच की गन्दी धूल के नीचे असली मुद्दे दब चुके हैं। दुनिया के सबसे अधिक कुपोषितों, अशिक्षितों व बेरोज़गारों के देश भारत के 66 साल के इतिहास में सबसे महँगे और दुनिया के दूसरे सबसे महँगे चुनाव (30 हज़ार करोड़) में कुपोषण, बेरोज़गारी या भुखमरी मुद्दा नहीं है! बल्कि "भारत निर्माण" और देश के "विकास" के लिए चुनाव करने की दुहाई दी जा रही है! विश्व पूँजीवादी व्यवस्था गहराते आर्थिक संकट तले कराह रही है और इसका असर भारत के टाटा, बिड़ला, अम्बानी-सरीखे पूँजीपतियों पर भी दिख रहा है। ऐसे में, भारत का पूँजीपति वर्ग भी चुनाव में अपनी सेवा करने वाली चुनावबाज़ पार्टियों के बीच चुन रहा है। पूँजीवादी जनतंत्र वास्तव में एक धनतंत्र होता है, यह शायद ही इससे पहले किसी चुनाव इतने नंगे रूप में दिखा हो। सड़कों पर पोस्टरों, गली-नुक्कड़ों में नाम चमकाने वाले पर्चों और तमाम शोर-शराबे के साथ जमकर दलबदली, घूसखोरी, मीडिया की ख़रीदारी इस बार के चुनाव में सारे रिकार्ड तोड़ रही है। जहाँ भाजपा-कांग्रेस व तमाम क्षेत्रीय दल सिनेमा के भाँड-भड़क्कों से लेकर हत्यारों-बलात्कारियों-तस्करों-डकैतों के सत्कार समारोह आयोजित करा रहे हैं, तो वहीं आम आदमी पार्टी के एनजीओ-बाज़ "नयी आज़ादी", "पूर्ण स्वराज" जैसे भ्रामक नारों की आड़ में पूँजीपतियों की चोर-दरवाज़े से सेवा करने की तैयारी कर रही है; भाकपा-माकपा-भाकपा(माले) जैसे संसदीय वामपंथी तोते हमेशा की तरह 'लाल' मिर्च खाकर संसदीय विरोध की नौटंकी के नये राउण्ड की तैयारी कर रहे हैं। उदित राज व रामदास आठवले जैसे स्वयंभू दलित मसीहा सर्वाधिक सवर्णवादी पार्टी भाजपा की गोद में बैठ कर मेहनतकश दलितों के साथ ग़द्दारी कर रहे हैं। ऐसे में प्रश्न यह खड़ा होता है कि हमारे पास चुनने के लिए क्या है?

किसे चुनें-सांपनाथ, नागनाथ या बिच्छुप्रसाद को?

देश का पूँजीवादी जनतंत्र आज पतन के उस मुकाम पर पहुँच चुका है, जहाँ अब इस व्यवस्था के दायरे में  छोटे-मोटे सुधारों के लिये भी आम जनता के सामने कोई विकल्प नहीं है। अब तो जनता को इस चुनाव में चुनना सिर्फ Election_Exhibition_12यह है कि लुटेरों का कौन-सा गिरोह उन पर सवारी गाँठेगा! विभिन्न चुनावी पार्टियों के बीच इस बात के लिये चुनावी जंग का फैसला होना है कि कुर्सी पर बैठकर कौन देशी-विदेशी पूँजीपतियों की सेवा करेगा; कौन मेहनतकश अवाम को लूटने के लिये तरह-तरह के कानून बनायेगा; कौन मेहनतकश की आवाज़ कुचलने के लिये दमन का पाटा चलायेगा; दस साल से सत्ता में मौजूद कांग्रेस को ज़ाहिरा तौर पर उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों से जनता पर टूटे कहर का ख़ामियाजा भुगतना पड़ रहा है। रही-सही कसर रिकार्डतोड़ घपलों-घोटालों ने पूरी कर दी है। देश में उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों का श्रीगणेश करनेवाली कांग्रेस को उम्मीद थी कि चुनाव करीब आने पर लोक-लुभावन योजनाओं का पिटारा खोलकर वह जनता को एक बार फिर बरगलाने में कामयाब हो जायेगी! मगर घनघोर वित्तीय संकट ने इस कदर उसके हाथ बाँध दिये है कि चाहकर भी वह चन्द हवाई वादों से ज़्यादा कुछ नहीं कर पा रही है। उसके 'भारत निर्माण' के नारे की हवा निकल चुकी है।

उधर नरेन्द्र मोदी पूँजीपति वर्ग के सामने एक ऐसे नेता के तौर पर अपने को पेश कर रहा है जो डण्डे के ज़ोर पर जनता के हर विरोध को कुचलकर मेहनतकशों को निचोड़ने और संसाधनों को मनमाने ढंग से पूँजीपतियों के हवाले करने में कांग्रेस से भी दस कदम आगे रहकर काम करेगा! बार-बार अपने जिस गुजरात मॉडल का वह हवाला देता है वह इसके सिवा और कुछ भी नहीं है। याद रहे कि इसी नरेन्द्र मोदी ने 2007 में कहा था कि वह पूरे देश को एक 'विशेष आर्थिक क्षेत्र' (सेज़) में तब्दील कर देगा! जो भी व्यक्ति जानता है कि 'सेज़' के भीतर किस कदर मज़दूरों का खून निचोड़ा जाता है, वह नरेन्द्र मोदी के इस दावे का मतलब समझ जायेगा। नरेन्द्र मोदी देश के पूँजीवादी आर्थिक संकट की पैदावार है जो कि जनता के अज्ञान और झूठे प्रचार के ताबड़-तोड़ हमले का सहारा लेकर 'जादू की छड़ी' से हर समस्या का समाधान कर देने का दावा करता है! यह जादू की छड़ी वास्तव में तानाशाहाना तरीके से निजीकरण-उदारीकरण और देशी-विदेशी पूँजी के लिए देश को लूट का खुला चरागाह बनाने की नीतियाँ हैं, जो कि मोदी गुजरात में लागू कर चुका है और अब पूरे देश में लागू करना चाहता है। ये नीतियाँ जहाँ एक ओर देश के अमीरज़ादों, कारपोरेट घरानों, उच्च मध्यवर्ग के लिए चमक-दमक भरे मॉल, एक्सप्रेस वे, सेज़ आदि खड़े करेंगी वहीं देश के 80 फीसदी आम मेहनतकशों के जीवन को नर्क के रसातल में धकेल देंगी। यही मोदी के विकास का मतलब है। संकट में बुरी तरह घिरे पूँजीपति वर्ग को इसीलिए अभी मोदी सबसे प्रिय विकल्प नजर आ रह है।

दरअसल यही हाल सभी चुनावबाज़ पार्टियों का है। चाहे वह उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी हो, बिहार में नीतीश कुमार की जद(यू) हो, हरियाणा में इनेलो व हरियाणा जनहित कांग्रेस हों या महाराष्ट्र में शिवसेना व मनसे हों-सभी जनता की मेहनत को लूटकर टाटा-बिड़ला-अम्बानी आदि की तिजोरियाँ भरने के लिए बेचैन हैं। उदारीकरण-निजीकरण की विनाशकारी नीतियाँ किसी पार्टी के लिये मुद्दा नहीं हैं क्योंकि इन नीतियों को लागू करने पर सबकी आम राय है। पिछले दो दशक के दौरान केन्द्र और राज्यों में संसदीय वामपन्थियों समेत सभी पार्टियाँ या गठबन्धन सरकारें चला चुके हैं या चला रहे हैं और सबने इन्हीं नीतियों को आगे बढ़ाया है। बल्कि इन तमाम क्षेत्रीय दलों ने जिस नंगे अवसरवाद और बिकाऊपन का प्रदर्शन किया है वह अभूतपूर्व है! मुलायम से लेकर जयललिता और ममता तक प्रधानमन्त्री की कुर्सी को ललचायी निगाहों से देख रहे हैं और खुले तौर पर कह रहे हैं कि वे उसके लिए कोई भी सौदा करने के लिए तैयार हैं!

इन सभी से अलग होने का दावा करते हुए प्रकट हुई अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने भ्रष्टाचार-विरोध के नारे के साथ दिल्ली की विधानसभा में कदम रखे और कांग्रेस और भाजपा से ऊबे लोगों ने इन्हें वोट भी दिये। लेकिन 49 दिनों की सरकार और उसके बाद के दौर ने इनके चरित्र को नंगा कर दिया है। 'आप' के भीतर सीटों के बँटवारे पर जो कुत्ताघसीटी और जूतमपैजार जारी है उससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि 'आप' सन्तों के चोंगे में शैतान ही है; अरविन्द केजरीवाल की एक प्रमुख समाचार चैनल के पत्रकार के साथ मिलीभगत और 'आप' का नाम चमकाने के लिए सस्ते दाँव-पेच ने दिखला दिया है कि केजरीवाल भी चुनावी गटर-गंगा के बडे़ महारथी हैं! लेकिन इन सबसे अहम बात है कि केजरीवाल की 'आप' भी वही नीतियाँ लागू करने के बात कर रही है जो कि भाजपा और कांग्रेस लागू करती रही हैं। पूँजीपतियों के मंच सीआईआई पर केजरीवाल की पूँछ नियन्त्रण से बाहर हो गयी थी और बेतरह हिले जा रही थी! केजरीवाल ने सभी पूँजीपतियों से वायदा किया कि अगर 'आप' की सरकार बनती है तो वह 'धन्धे में कोई हस्तक्षेप' नहीं करेगी और देश में 'धन्धा लगाना और चलाना आसान बना देगी!' इसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ है पूँजीपतियों को हर रोक-टोक (जैसे कि सुरक्षा सम्बन्धी क्लियरेंस लेना, पर्यावरण क्लियरेंस लेना, श्रम कानूनों का पालन करना, बिक्री कर आदि देना!) से पूरी छूट दी जायेगी! और पूँजीपतियों के मुनाफ़े को और अधिक बढ़ाया जायेगा, क्योंकि 'आप' सरकार सरकारी विभागों से भ्रष्टाचार समाप्त कर देगी और पूँजीपतियों को सरकारी अफसरों को घूस नहीं देनी पड़ेगी! दिल्ली में 'आप' ने अपनी सरकार के दौरान दिल्ली से सभी सरकारी और ग़ैर-सरकारी ठेका कर्मचारियों से जो ग़द्दारी और वायदा-ख़ि‍लाफ़ी की वह आज सबके सामने है। आज सभी जानते हैं कि केजरीवाल ने पानी और बिजली पर जनता की जेब से जो सब्सिडी कम्पनियों को दी थी वह भी सिर्फ़ 31 मार्च तक के लिए थी! आम आदमी पार्टी एक मायने में भाजपा और कांग्रेस से भी ज़्यादा ख़तरनाक है क्योंकि यह जनता को "साफ़-सुथरे पूँजीवाद" का झूठा सपना दिखाकर भरमा रही है; ठीक वैसे ही जैसे एक समय में जेपी आन्दोलन और मोरारजी देसाई सरकार ने किया था! जब भी पूँजीवादी व्यवस्था गम्भीर संकट का शिकार होती है, तो कोई सन्त, कोई श्रीमान सुथरा प्रकट होते हैं और पूँजीवादी व्यवस्था पर से जनता के विश्वास को बनाये रखने का काम करते हैं। आज यही काम अरविन्द केजरीवाल की 'आप' कर रही है।

ऐसे में, जब चुनाव आयोग और तमाम स्वयंसेवी संगठन से लेकर आमिर ख़ान का 'सत्यमेव जयते', चाय कम्पनियाँ, मोबाइल कम्पनियाँ अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए जनता का वोट देने के लिए "आह्वान" करते हैं, तो हँसी फूट पड़ती है! चुनाव आयोग की स्थिति विशेष तौर पर हास्यास्पद होती है! वह प्रत्याशियों के लिए नये-नये नियम बनाता है, उनका प्रचार करता है, उनके बारे में प्रशिक्षण देता है और अन्त में सारे चुनावी दल इन नियमों के पुलिन्दों का कागज़ी जहाज़ बनाकर उड़ा देते हैं! वोट डालने के लिए अपील का भी तमाम कम्पनियाँ अपने उत्पाद के बाज़ार के लिए इस्तेमाल करती हैं। क्या यह सब दिखलाता नहीं है कि यह सब एक विशालकाय, खर्चीली और घृणा पैदा करने वाली नौटंकी से ज़्यादा कुछ नहीं है? यही कारण है कि इन अपीलों का कुछ ख़ास असर नहीं होता। पन्द्रहवें लोकसभा चुनाव में सिर्फ करीब 59 फ़ीसद मतदाताओं ने मत डाले, जिसमें करीब 37 फीसद ही जीतने वाले दल, कांग्रेस को मिले। यानी कुल मतदाताओं के 30 फीसदी से भी कम। इसके ऊपर से दारु बाँटकर, पैसे से ख़रीदकर और बूथ कब्ज़ा करके हासिल किये मतों का फीसद भी कम से कम 15-20 फीसद होता है। यानी, इस देश की सरकार चुनने का काम महज़ 10 फीसदी लोग ही करते हैं। इस चुनाव में अब तक घोषित उम्मीदवारों की सूची ही दिखा रही है कि इस बार पहले से भी अधिक चोर-उचक्कों, बलात्कारियों, गुण्डों और करोड़पतियों को टिकट दिया गया है। भगवाधारी भाजपा हो, तिरंगा उड़ाने वाली कांग्रेस हो, टोपी पहनाने वाली आम आदमी पार्टी हो या फिर तमाम क्षेत्रीय पार्टियाँ या विरोध की नौटंकी करने वाले नकली वामपंथी-लुटेरी आर्थिक नीतियों के सवाल पर सबमें एकता है! यह बात सापफ़ है कि सरकार चाहे इस चुनावी दल की हो या उस चुनावी दल की-वह शासक वर्गों की मैनेजिंग कमेटी ही होती है। इसी मैनेजिंग कमेटी की भूमिका कौन-सा दल निभायेगा यही तय करने के लिए हर पाँच साल पर चुनावों की महानौटंकी आयोजित की जाती है और इसका भी भारी-भरकम ख़र्च आम ग़रीब जनता की जेब से ही वसूला जाता है। यह जनतन्त्र देश के अस्सी फीसदी मेहनतकश लोगों के लिए पूँजीपतियों का धनतन्त्र है। ऐसे में, प्रश्न यह उठता है कि हमें क्या करना चाहिए?

नाउम्मीदों की एक उम्मीद-इंक़लाब

इस बेहद ख़र्चीली चुनावी नौंटकी और जनता की छाती पर भारी चट्टान की तरह लदी पूँजीवादी संसदीय प्रणाली को हम सिरे से ख़ारिज करते हैं। वैसे भी पिछले 62 सालों के पन्द्रह लोकसभा चुनावों में पूँजीवादी राजनीति की फूहड़ता और नग्नता जनता के सामने उजागर है। साफ है कि गैर-बराबरी और अन्याय पर टिकी पूँजीवादी व्यवस्था में चुनाव एक धोखा है पूँजीवादी जनतन्त्र जनता के लिए धनतन्त्र और डण्डातन्त्र है। हमारे पास विकल्प यही है कि नागनाथ, साँपनाथ आदि में से एक को चुन लें। ऐसे में, 'सबसे कम बुरे' का चुनाव करने से आज हमें कुछ भी नहीं हासिल होगा। हमें इस चुनावी नौटंकी की असलियत को समझना होगा। हमें समझना होगा कि मौजूद पूँजीवादी व्यवस्था की नींव में देश की 75 से 80 फीसदी मज़दूरों, आम मेहनतकश आबादी की लूट है। इस व्यवस्था के दायरे के भीतर हम किसी को भी चुन लें,कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

इसलिए बेहतर है हम पूँजीवाद के विकल्प की बात करें। पूँजीवाद और साम्राज्यवाद अमर नहीं हैं। आज समय के गर्भ में महत्वपूर्ण बदलाव के बीज पल रहे हैं। विकल्प के निर्माण के लिए उन्हें ही आगे आना होगा जो ठगे जा रहे हैं, लूटे जा रहे हैं और आवाज़ उठाने पर कुचले जा रहे हैं! वैसे भी हम पहले ही बहुत देर कर चुके है और सड़ाँध मारते पूँजीवाद का एक-एक दिन हमारे लिए भारी है! यह घुटन, यह गतिरोध अब ज़िन्दा आदमी के बर्दाश्त के काबिल नहीं! हमें उठ खड़ा होना होगा और अपने ज़िन्दा होने सबूत देना होगा! वरना आने वाली पीढ़ियों को इतिहास क्या बतायेगा कि हम क्या कर रहे थे? जब देश ज्वालामुखी के दहाने पर बैठा हुआ था, तबाही के नर्ककुण्ड में झुलझ रहा था?

इसलिए हमें समूची पूँजीवादी व्यवस्था का ध्वंस करने की फैसलाकुन लड़ाई शुरू करनी होगी। हमें क्रान्तिकारी तरीके से मेहनतकश जनता का लोकस्वराज्य कायम करना होगा। इसलिए हमारा नारा है "खत्म करो पूँजी का राज, लड़ो बनाओ लोकस्वराज्य।" लोकस्वराज्य से हमारा अर्थ है उत्पादन, राजकाज और समाज के पूरे ढाँचे पर उत्पादन करने वाले सामाजिक वर्गो का नियन्त्रण और साथ ही मुनाफे और बाज़ार के लिए उत्पादन की पूरी व्यवस्था को नष्ट करके एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण जिसमें उत्पादन सामाजिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए हो और पैदावारों का समानतापूर्ण बँटवारा हो। लोकस्वराज्य व्यवस्था में जनप्रतिनिधियों की भूमिका अदा करने के लिए पेशेवर नेताओं का परजीवी वर्ग नहीं होगा, बल्कि आम लोग जो कि सारी चीज़ें बनाते और चलाते हैं, वही राजनीतिक निर्णय लेने का कार्य भी करेंगे। जो लोग सुई से लेकर जहाज़ तक हरेक चीज़ बनाते हैं वह पूरे देश की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था क्यों नहीं चला सकते? लोकस्वराज्य व्यवस्था पूँजीवादी जनवाद से इस मायने में भिन्न होगी कि उसमें एक ऐसी चुनावी प्रणाली होगी जिसमें जनता छोटे-छोटे निर्वाचक मण्डलों में अपने प्रतिनिधियों का सीधे चुनाव करेगी। कारखानों में, गाँवो-मुहल्लों में, सेना में लोग अपने बीच में से अपने सच्चे प्रतिनिधियों का चुनाव करेंगे। छोटे चुनाव क्षेत्र होने के कारण चुनाव प्रचार का खर्च नगण्य होगा और चुनाव में पैसे की वैध-अवैध भूमिका समाप्त हो जायेगी। हर नागरिक को चुनने और चुने जाने का अधिकार होगा। जनता को विश्वास खो चुके प्रतिनिधि को तत्काल वापस बुलाने का भी अधिकार होगा। जनप्रतिनिधियों की सभा किसी भी स्तर पर बहसबाज़ी के अड्डे नहीं रहेंगी बल्कि वे सरकार यानी कार्यपालिका के काम और संसद यानी विधायिका के काम को एक साथ सम्पन्न करेंगी। नौकरशाही का काम भी चुने हुए व्यक्ति द्वारा होगा। नेताओं का कोई स्वतंत्र पेशा नहीं होगा। वे आम मेहनतकश जनता के बीच के लोग होंगे और उनका वेतन और जीवन स्तर भी उन्हीं जैसा होगा। ज़ाहिरा तौर पर ऐसा सच्ची आज़ादी, ऐसा सच्चा जनवाद इस पूँजीवादी ढाँचे में सम्भव ही नहीं है। इसलिए हमें सबसे पहले जनमुक्ति के एकमात्र रास्ते-यानी इंक़लाब की तैयारी में जुटना होगा! शहीदेआज़म भगतसिंह के शब्दों में, हमें इंक़लाब के सन्देश को कल-कारखानों और खेतों-खलिहानों तक लेकर जाना होगा और जनता में इंक़लाब की अलख जगानी होगी।

आज से ही जुट जाना होगा!

पुरानी-जर्जर दीवार भी अपने आप नहीं गिरती है उसके लिए भी हथौड़े का प्रहार करना पड़ता है। उसी तरह जर्जर, मानवद्रोही हो चुकी पूँजीवादी व्यवस्था भी अपने आप नहीं गिर जायेगी। इसके लिए जनता को अपना फौलादी हाथ उठाना ही होगा। आज दुनिया में तमाम देशों में जनता यह समझ चुकी है कि मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था उसे बेरोज़गारी, गरीबी-बदहाली, महँगाई और युद्ध के अलावा कुछ नहीं दे सकती। पिछले दो वर्षों के दौरान मिस्र से लेकर कई यूरोपीय देशों तक में जनता मानवद्रोही पूँजीवादी व्यवस्था के ख़ि‍लाफ़ सड़कों पर है। यह एक दीगर बात है कि अभी इन स्वतःस्फूर्त आन्दोलनों के पास कोई क्रान्तिकारी संगठन और विकल्प नहीं है और ऐसे क्रान्तिकारी संगठन और विकल्प के बिना पूँजीवाद व्यवस्था को बदला नहीं जा सकता है। हमारे देश में भी आने वाले वर्ष भयंकर सामाजिक उथल-पुथल के होंगे क्योंकि किसी की भी सरकार आये, लूट और शोषण में कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। आने वाले समय में पूँजीवाद का अन्तकारी संकट और गहराने वाला है और इस संकट का बोझ भी पूँजीपति वर्ग मज़दूरों और मेहनतकशों के ऊपर डालेगा। इसलिए भविष्य में देश भर में मज़दूर आन्दोलनों, युवा आन्दोलनों, स्त्री आन्दोलनों का ज्वार उठेगा! ऐसे में, इन बिखरे आन्दोलनों को एक सूत्र में पिरोकर समूची पूँजीवादी व्यवस्था का ध्वंस करने वाले इंक़लाब में तब्दील करने के लिए एक इंक़लाबी पार्टी की ज़रूरत होगी जो कि पूँजीवादी व्यवस्था का एक वैज्ञानिक-व्यावहारिक विकल्प पेश कर सके। इसके लिए आज से ही तैयारियाँ करनी होंगी। गली, मोहल्लों, शहरों, कॉलेजों और गाँवों में मज़दूरों के संगठन, स्त्रियों के संगठन, छात्रों के संगठन, जाति-तोड़क संगठन आदि का जाल देश भर में बिछा देना होगा। साथ ही, आज से ही एक नयी क्रान्तिकारी पार्टी को खड़ा करने का काम भी शुरू करना होगा। ऐसी पार्टी के बगै़र परिवर्तन की यह परियोजना मुकाम तक नहीं पहुँचायी जा सकती है। हम ऐसे सभी ज़िन्दा, संवेदनशील, चिन्तनशील, न्यायप्रिय और साहसी मज़दूरों, छात्रों, स्त्रियों आदि का आह्वान करते हैं कि इस परिवर्तनकामी मुहिम में शामिल हों।

भगतसिंह का ख़्वाब-इलेक्शन नहीं, इंक़लाब!!

ख़त्म करो पूँजी का राज! लड़ो बनाओ लोकस्वराज्य!!

  • बिगुल मज़दूर दस्ता
  • दिल्ली मज़दूर यूनियन
  • नौजवान भारत सभा
  • दिशा छात्र संगठन

सम्पर्कः (011)64623928, 9540436262, 9711736435, 9873358124, 8750045975, 9289498250

http://www.mazdoorbigul.net/archives/5015

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