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Memories of Another day

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Thursday, June 20, 2013

समूचे हिमालय पर मंडराने लगा संकट, धसकने लगी हैं कश्मीर से किन्नौर तक की पहाड़ियां

समूचे हिमालय पर मंडराने लगा संकट, धसकने लगी हैं कश्मीर से किन्नौर तक की पहाड़ियां

Thursday, 20 June 2013 09:29

अंबरीश कुमार, लखनऊ। समूचे हिमालय क्षेत्र पर संकट मंडरा रहा है और उत्तराखंड की आपदा बड़े खतरे का संकेत दे रही है। यह चेतावनी पर्यावरण विशेषज्ञों के साथ विभिन्न जन संगठनों की भी है। हिमालय जिसे एशिया का 'वाटर टावर' कहा जाता है जो कई देशों के मीठे पानी का बड़ा स्रोत है, खुद बड़े संकट से गुजर रहा है। यह संकट कश्मीर और किन्नौर से लेकर सिक्किम तक है, तो दूसरी तरफ नेपाल और भूटान से लेकर चीन तक फैला हुआ है। 
नेपाल और आगे का दौरा कर आए आपदा विशेषज्ञ डा भानु ने कहा, उत्तराखंड की आपदा तो खतरे की घंटी जैसी है। समूचे हिमालय क्षेत्र में संकट मंडरा रहा है। नेपाल के बड़े इलाके से लेकर चीन की सीमा तक पहाड़ कई वजहों से कमजोर हो गए हैं जो बारिश में बहुत खतरनाक हो जाते हैं। इसकी एक वजह सड़कों के लिए पहाड़ पर अनियंत्रित ढंग से निर्माण किया जाना है और दूसरी प्रमुख वजह जंगलों का बुरी तरह काटा जाना है। इसके अलावा बड़े बांध और बेतरतीब ढंग से ऊंची इमारतों का निर्माण भी है। आने वाले समय में श्रीनगर से लेकर शिमला, नैनीताल, दार्जिलिंग और सिक्किम जैसे पर्यटक स्थल भी इसी तरह की प्राकृतिक आपदा का शिकार बन सकते हैं।
हरित स्वराज और हिमालय नीति अभियान पिछले करीब एक दशक से उत्तराखंड में सुंदरलाल बहुगुणा, अनिल जोशी और विमला बहुगुणा जैसे पर्यावरण के लिए सतत संघर्ष करने वालों के साथ हिमालय को लेकर बहस छेड़े हुए हैं। शेखर पाठक राष्ट्रीय मंच पर लगातार हिमालय की बदहाली का सवाल उठाते हुए चेतावनी देते रहे हैं कि किस तरह जलवायु परिवर्तन के कारण बांज बुरांस से लेकर देवदार के जंगल और ऊपर चले जा रहे हैं, तो सेब के बगीचे भी अब ज्यादा ऊंचाई वाले पहाड़ों पर ही बचे हुए हैं। यह सब बड़े पैमाने पर जंगलों के काटे जाने से लेकर बड़ी-बड़ी बिजली परियोजनाओं के कारण भी हुआ है। 
2011 में हिमालयी जन घोषणा पत्र के मसविदे में कई सुझाव भी दिए गए थे। इस अभियान में गांधी शांति प्रतिष्ठान, हरित स्वराज, नदी बचाओ अभियान, हिमालय सेवा संघ, लोकायन से लेकर प्रवासी नेपाली एकता मंच जैसे बहुत से जन संगठन जुड़े हुए थे। इसके प्रारूप में कहा गया है-हिमालय में छोटी-बड़ी बांध परियोजनाएं हमारी चिंता का विषय हैं। ऐसी सभी योजनाओं का मकसद यहां के परिवेश को बिगाड़ कर और लोगों को उजाड़ कर बड़े उद्योगों और संपन्न क्षेत्रों को बिजली पानी पहुंचाना है। यह एक ऐसी कानूनी डकैती है जिसे रोकना हर नागरिक का पहला कर्तव्य है।

इस अभियान से जुड़े भुवन पाठक के मुताबिक जंगल काटे गए तो नदियों को खनन कर के खत्म किया गया और बालू से लेकर पत्थर तक बेचे जा रहे हैं। ऐसे में जब नदी का पानी बढ़ेगा तो कैसे उसे रोक पाएंगे, यह कोई नहीं सोचता। इस हादसे ने हिमालय को बचाने को लेकर यह बहस फिर तेज कर दी है।
इस बीच अखिल भारतीय मजदूर सभा की केंद्रीय कार्यकारिणी ने उत्तराखंड की भारी बारिश के दौरान हुए आम जन-जीवन व संपत्ति को हुए नुकसान के लिए गहरी संवेदना जताई है और कहा है कि केंद्र व राज्य सरकारों व मीडिया का इसे ह्यप्रकृति का प्रकोपह्ण कहना गलत है। वन माफिया व ठेकेदारों ने लोगों के विरोध के बावजूद पूरे इलाके के पहाड़ों पर वन कवच समाप्त कर दिया है।
उत्तराखंड का 90 फीसद प्राकृतिक वन नष्ट किया जा चुका है। विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन की नई आर्थिक नीतियां जिन्हें भारत में डा मनमोहन सिंह के नेतृत्व में लागू किया जा रहा है, जल, जंगल, जमीन और खनिज आदि का व्यावसायिक शोषण बढ़ा कर प्राकृतिक सुरक्षा से समझौता कर लिया है। बड़े शहरों में जगह-जगह पानी का बहाव रोका गया है और विकास प्राधिकरणों से इसका संरक्षण केवल कागजों तक सीमित है। मुंबई में मीथी नदी का बहाव बाधित है। शहरी क्षेत्रों में सामान्य बारिश में जलभराव हो जाता है। दिल्ली की जीएमआर कंपनी का बनाया नया हवाई अड्डा डूबा है। 
पहाड़ों में वन कटने से भूस्खलन बढ़ा है और बिहार में हर साल कोसी नदी कई शहरों को डुबो देती है। उत्तरी बिहार में विकास के नाम पर बने ऊंचे रेलमार्ग व सड़कें पानी के बहाव को बाधित कर बाढ़ ला देती हैं।

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