| Thursday, 20 June 2013 09:29 |
अंबरीश कुमार, लखनऊ। समूचे हिमालय क्षेत्र पर संकट मंडरा रहा है और उत्तराखंड की आपदा बड़े खतरे का संकेत दे रही है। यह चेतावनी पर्यावरण विशेषज्ञों के साथ विभिन्न जन संगठनों की भी है। हिमालय जिसे एशिया का 'वाटर टावर' कहा जाता है जो कई देशों के मीठे पानी का बड़ा स्रोत है, खुद बड़े संकट से गुजर रहा है। यह संकट कश्मीर और किन्नौर से लेकर सिक्किम तक है, तो दूसरी तरफ नेपाल और भूटान से लेकर चीन तक फैला हुआ है। इस बीच अखिल भारतीय मजदूर सभा की केंद्रीय कार्यकारिणी ने उत्तराखंड की भारी बारिश के दौरान हुए आम जन-जीवन व संपत्ति को हुए नुकसान के लिए गहरी संवेदना जताई है और कहा है कि केंद्र व राज्य सरकारों व मीडिया का इसे ह्यप्रकृति का प्रकोपह्ण कहना गलत है। वन माफिया व ठेकेदारों ने लोगों के विरोध के बावजूद पूरे इलाके के पहाड़ों पर वन कवच समाप्त कर दिया है। उत्तराखंड का 90 फीसद प्राकृतिक वन नष्ट किया जा चुका है। विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन की नई आर्थिक नीतियां जिन्हें भारत में डा मनमोहन सिंह के नेतृत्व में लागू किया जा रहा है, जल, जंगल, जमीन और खनिज आदि का व्यावसायिक शोषण बढ़ा कर प्राकृतिक सुरक्षा से समझौता कर लिया है। बड़े शहरों में जगह-जगह पानी का बहाव रोका गया है और विकास प्राधिकरणों से इसका संरक्षण केवल कागजों तक सीमित है। मुंबई में मीथी नदी का बहाव बाधित है। शहरी क्षेत्रों में सामान्य बारिश में जलभराव हो जाता है। दिल्ली की जीएमआर कंपनी का बनाया नया हवाई अड्डा डूबा है। पहाड़ों में वन कटने से भूस्खलन बढ़ा है और बिहार में हर साल कोसी नदी कई शहरों को डुबो देती है। उत्तरी बिहार में विकास के नाम पर बने ऊंचे रेलमार्ग व सड़कें पानी के बहाव को बाधित कर बाढ़ ला देती हैं। |
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Thursday, June 20, 2013
समूचे हिमालय पर मंडराने लगा संकट, धसकने लगी हैं कश्मीर से किन्नौर तक की पहाड़ियां
समूचे हिमालय पर मंडराने लगा संकट, धसकने लगी हैं कश्मीर से किन्नौर तक की पहाड़ियां
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