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Memories of Another day

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While my Parents Pulin babu and Basanti devi were living

Thursday, June 20, 2013

सारे पीड़ितों को निकालने में लगेगा महीने भर का समय!

सारे पीड़ितों को निकालने में लगेगा महीने भर का समय!


नई दिल्ली। उत्तराखंड के भीषण प्राकृतिक आपदा की चपेट में आने के बाद लोग आरोप लगा रहे हैं कि सरकार इस आपदा से लड़ने में पूरी तरह से नाकाम नजर आ रही है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बाबत दायर याचिका में उत्तराखंड सरकार और केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। साथ ही राहत कामों में भेदभाव ना बरतने की सलाह दी है। इन सबके बीच उन लोगों का हाल बुरा है जो अलग-अलग इलाकों में फंसे हैं। लोगों की मानें तो अब नौबत भूख से मरने की आ गई है।

मदद की गुहार लगाते लोग 16 तारीख को आई आपदा के बाद से जगह-जगह फंसे हुए हैं। सैलाब के तांडव में राज्य के ज्यादातर रास्ते टूट चुके हैं। बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है। ऐसे में चारों धाम की यात्रा पर आए लोगों को कोई और रास्ता नजर नहीं आ रहा। पांच दिन बाद भी इन तक मदद पहुंचाने में राज्य सरकार और तमाम एजेंसियां नाकाम नजर आ रही हैं।

सारे पीड़ितों को निकालने में लगेगा महीने भर का समय!

जहां सरकार के मदद के हाथ पहुंच भी रहे हैं, वहां भी गहरी नाराजगी है। लोगों का कहना है कि बहुगुणा सरकार मदद के नाम पर क्रूर मजाक कर रही है। जयपुर के राजकुमार गोयल कहते हैं कि चार दिन से सहायता नहीं मिली है। सरकार कहती है कि हम सारी व्यवस्था कर रहे हैं। ये सब झूठ है। अगर सीएम का कोई अपना फंसा होता को क्या ऐसे ही हालात होते। जयपुर से सुभाष गर्ग कहते हैं कि राहत दल ने गणेश चट्टी में भोजन के 50 पैकेट डाले। वहां 4 हजार लोग फंसे हैं। इसकी वजह से भगदड़ मची है। 4 हजार लोगों के बीच 50 पैकेट से क्या होगा। आगरा की मधु अग्रवाल बताती हैं कि जिन लोगों की सांसें बची हैं, वो भी नहीं बच पाएंगे। लोगों के सामने लाशें पड़ी हैं। बदबू मार रही हैं।




16 तारीख को सैलाब कहर बनकर उत्तराखंड पर टूटा। सरकार की मानें तो 650 सड़कें बंद हैं। 38 पुल बह चुके हैं। दावा ये भी है कि पांच दिनों में 110 सड़कों को यातायात के लिए खोल दिया गया है। सरकारी दावे के मुताबिक ही अब तक 10 हजार से ज्यादा लोगों को बचाया जा चुका है। लेकिन पांच दिन में ये संख्या बेहद कम है क्योंकि 62 हजार लोग अभी भी अलग-अलग जगहों पर फंसे हुए हैं। आफत में फंसे लोगों का कहना है कि अगर सरकार उन तक नहीं पहुंची तो वो भूख से मर जाएंगे। नासिक से आए एक पर्यटक ने कहा कि जो लोग अपने नसीब से जिंदा हैं, वो प्रशासन के कारण मर जाएंगे। खाना, पानी नहीं मिल रहा है।

सवाल ये कि सरकार उन तक पहुंचेगी कैसे। आरोपों की मानें तो राहत काम में लगी एजेंसियों में आपस में कोई तालमेल नहीं है। सरकार अब तक ठीक-ठीक ये नहीं समझ पाई है कि आखिर कितने लोग अलग-अलग जगहों पर फंसे हैं। कितने लोग मारे गए हैं। 4 साल से लगातार उत्तराखंड ऐसी आपदाओं से जूझ रहा है। लेकिन सरकार की नींद नहीं खुल रही। आखिरकार कुदरत ने सरकार को झकझोरा है। लेकिन अभी भी इस बात की गारंटी नहीं है कि वो जाग गई है। लोगों का आरोप है कि सरकार के तमाम उपाय नाकाम नजर आ रहे हैं।

जब सड़कें नहीं हैं, पुल बह चुके हैं। तब लोगों को बचाने का बड़ा जरिया हेलीकॉप्टर है। रास्ते बनाने तो वक्त लगेगा लेकिन हेलीकॉप्टर से लोगों को बचाया जा सकता है लेकिन अभी महज 17 हेलीकॉप्टर ही लोगों को बचाने में जुटे हैं। 62 हजार लोगों को अगर इतने ही हेलीकॉप्टर बचाएंगे तो एक महीने से ज्यादा लग जाएंगे। खुद बचाव काम में जुटे हेलीकॉप्टर के पायलट का ये कहना है।

पायलट देवेंद्र पाल सिंह कहते हैं कि लोगों को निकालने के लिए हेलीकॉप्टर कम हैं। और भी आएंगे तो कम पड़ेंगे क्योंकि इतने लोगों को सिर्फ हेलीकॉप्टर के जरिए नहीं निकाला जा सकता। हेलीकॉप्टर जाता है तो क्षमता से ज्यादा लोग बैठ जाते हैं। उन्हें निकालना मुश्किल हो जाता है। भीड़ को कंट्रोल करने वाला कोई नहीं है।

हेलीकॉप्टर मौसम का भी मोहताज है। खराब मौसम उसे राहत काम से रोक देता है। सबको निकलने की जल्दी है लेकिन वो निकलेंगे तो तब जब उनतक मदद पहुंचेगी। आंकड़ों की मानें तो आईटीबी, सेना के 70 हजार से ज्यादा जवान बचाव कार्य में जुटे हुए हैं। वो जान-जोखिम में डालकर लोगों को बचा भी रहे हैं लेकिन अगर सरकार आपदा प्रबंधन के नाम पर कुछ तैयारी करती तो शायद स्थिति और बेहतर होती। सवाल ये है कि बचाव का काम इतना धीमा क्यों? वहां का स्थानीय प्रशासन नाकारा क्यों? सिर्फ सेना के भरोसा राहत का काम क्यों?


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