Twitter

Follow palashbiswaskl on Twitter

Memories of Another day

Memories of Another day
While my Parents Pulin babu and Basanti devi were living

Thursday, June 20, 2013

देवभूमि के असुर !


Status Update
By चन्द्रशेखर करगेती
देवभूमि के असुर !

कभी उत्तराखण्ड यूपी का एक हिस्सा होता था, लखनऊ में एक अलग पर्वतीय संभाग था जहाँ से इस विशेष क्षेत्र के लिए नीतियाँ बनतीं थीं। शायद सत्रह के आसपास विधायक इस क्षेत्र में होते और उनमे से एक पर्वतीय विकास मंत्री बनता था। अगर पहाड़ से कोई लखनऊ जाता तो मंत्री जी ध्यान देकर उसकी बात सुनते थे। लखनऊ जाना अब भी नैनीताल की साईड ( कुमाऊँ रीजन ) से आसान है, देहरादून दूर है।

फिर अलग राज्य की बात उठी, वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली के समय किये गए वादे तो नेहरू जी ही भूल चुके थे तो कोई और क्या करता। लेकिन इस क्षेत्र से आने वाले सबसे महान जिन्दा पीर बन चुके विकास पुरुष डीएनए ब्राण्ड तिवाड़ी जी बीच में आ गए की राज्य का बंटवारा मेरी लाश पर होगा, अनुभवी आदमी थे, उनको पता था की पहाड़ रहने के लिए ठीक नहीं। मौसम ठीक रहे तो सेहत के लिए पहाड़ जाया जाता है, वर्ना वहां की जिंदगी पहाड़ जैसी ही दुरूह है। लाश तिवाड़ी जी की क्या गिरती, उनके चेले मुलायम सिंह ने लाशें गिरवायीं। दिल्ली दरबार तक अपनी बात रखने जा रहे आन्दोलनकारी महिलाओं के साथ मुलायम सिंह की फ़ौज ने बलात्कार किये। कितने युवक युवतियों की हत्या की गयी। सब क्षुब्द्ध थे पर यातना की खबर दिल्ली नहीं पहुंची, यहाँ तक की तब हम लोगों ने भी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पास महेंद्रवी के गेट पर इसके विरोध में धरना और चक्का जाम किया था। रैपिड एक्शन फ़ोर्स वहाँ आगई तो हमको भागना पड़ा था।

पर दिल्ली उदासीन थी, हाँ एक बड़े साहब थे जिन्होंने बलात्कार और फायरिंग को निर्देशित किया था उनका बयान आया था की गन्ने के खेत में किसी भी आदमी को कोई महिला मिलेगी तो क्या करेगा। उनकी ऐसी समझ से प्रभावित हो कर मुलायम और बाद में भारतीय जनता पार्टी ने इतना उपकृत किया जैसे लगा की ये बदजात अपने बाप का कर्जा उतार रहे हैं। अदालत भी इलाहाबाद थी बाद में वहां से मामला नए राज्य की अदालत में भी आया पर जैसा की हमेशा न्याय बलात्कारियों और हत्यारों के पक्ष में रहता है, यहाँ भी वही हुआ। बल्कि अब तो हत्यारे सीधे -सीधे सरकार में आ गये हैं और आन्दोलनकारियों के मापदंड तय कर रहे हैं । राज्य बना तो बिना इलेक्शन के कीचड़ में सने कमल ने इलाके को लपेट लिया क्योंकि तब यूपी में भाजपा की सरकार थी। जनता खुश की अपनी सरकार आ गयी, ये जो उत्तराखंड की जनता है उस समय तक किसी भी बाहरी को 'दिल्ली वाला' बोलती थी जो की इधर घूमने आया है, घूम फिर कर चला जायेगा। कभी कभी दिल्ली वाले जमीन भी खरीदते थे, फिर गाँव का आदमी जमीन बेचने के बदले मिले पैसे की दारू पी जाता और उसी जमीन की चौकीदारी में लग जाता। दिल्ली वाला उसको अपनी गाड़ी में घुमा लेता तो क्या पूछना, अगल -बगल उसकी इज्ज़त बढ़ जाती और सब अपनी भी जमीन के सौदे के फेर में पड़ जाते। क्योंकि दिल्ली वाले ये भी बोलते की होटल बनायेंगे और सबको बर्तन - भांडा मांजने की नौकरी मिल जाएगी।

पर सरकार क्या बनी दिल्ली वालों का पूरा कब्ज़ा हो गया। सरकार में गवर्नर एक पंजाबी और मुख्यमंत्री एक देशी को बनाया गया ताकि उत्साह में स्थानीय लोग 'बाहरियों' के साथ भेदभाव न करें। सोचिये की हुक्मरानों की समझ कितनी शातिर होती है, जनता भले न ध्यान दे पर माहौल दिल्ली वाले ही बनाते हैं। बूढ़े मुख्यमंत्री का पूरा कार्यकाल कोने -कोने में जा कर ढोल -दमाऊँ के साथ नाचने और स्वागत समारोह में बीत गया। फिर एक संघी प्रचारक बैचलर मुख्यमंत्री बने, सीधे -साधे कहे जाने वाले, जिनको आजकल साधे रखने के लिए दिल्ली में भाजपा मुख्यालय के बगल वाली कोठी मिली हुई है। उनसे एक बार मैंने पूछा की नए राज्य से क्या फायदा हुआ तो भोला भाला जवाब था की अब मैं हेलीकाप्टर में उड़ता हूँ जो कभी सपने में भी नहीं सोचा था। ध्यान दीजिएगा की राजधानी देहरादून है जो कहीं से भी पहाड़ी कल्चर और समस्याओं से बहुत दूर की घाटी है। बाद में दूसरे मुख्यमंत्री हुए तो उन्होंने शिशुमंदिर के शिक्षक के रूप में जो पढाया था सब भूल गए और उनकी छवि मरहूम प्रमोद महाजन वाली बन गयी, लोकल अमर सिंह कहने में दिक्कत है क्योंकि अमर सिंह का एप्रोच ग्लोबल है। ये कविता कहानियाँ भी लिखते रहे और महान साहित्यकार के रूप भी पार्टी में प्रसिद्द हो गए, खुले आम भ्रष्टाचार के आरोप में हटाये गए और इनके कौशल को सम्मान देते हुए इन्हें दिल्ली वालों ने बड़ा पद दे दिया और ये आजकल नेशनल कमेटी में कुछ हैं। फिर फौजी आये बड़े ईमानदार, इतने ईमानदार की काँग्रेस प्रत्याशी के विरुद्ध चुनाव में नहीं खड़े हुए क्योंकि वो इनका नजदीकी रिश्तेदार था। कहीं और से लड़े जहाँ इनको हराने के लिए इनकी ही पार्टी के लोगों ने दिन रात एक कर दिया और आर्मी ने अपने जनरल को हरा कर विजय का जश्न मनाया ।

कांग्रेस से एकोहम वाली मुद्रा में तिवाड़ी जी की किवाड़ी खुल गयी, अपनी लाश पर ही बंटवारे की बात करने वाले पंडीजी लखनऊ और दिल्ली की फ़ौज लेकर पहाड़ में मौज करने आ गए । मौजी स्वभाव देख आला कमान ने प्रधानमंत्री मैटेरियल रहे पंडीजी को साऊथ में गवर्नर बना कर भेज दिया क्योंकि घर के पास के पार्क में रोज भेलेनटाईन डे मनाने पर बहुत खतरा होता है । दक्षिण में भी गवर्नर हॉउस में इनका सिनेमा बन गया और ये उत्तर की तरफ वानप्रस्थ में आ गए। इसके बाद सबसे बड़ा धोखा हुआ राज्य के साथ और ऐसे व्यक्ति को दिल्ली की महारानी ने देहरादून में स्थापित कर दिया जिनका यहाँ से इतना ही सम्बन्ध है की इनके पिता जी इस इलाके में पैदा हुए थे । पर इनके पिताजी ऐसे व्यक्ति थे जिनके बारे में इंदिरा गाँधी ने कहा था की उनके जीवन में बस बार खुद उनको चल कर किसी के दरवाजे जाना पड़ा था और वो थे हेमवती नंदन बहुगुणा । पर उसी शख्सियत के पुत्र का हेलीकाप्टर हमेशा तैयार रहता है की न जाने कब दिल्ली दरबार जाना पड़ जाए । और तो और राहुल बाबा की सार्वजनिक चरण वंदना करने पर बहादुर स्वाभिमानी सैनकों के राज्य के इस मुखिया को राहुल बाबा ने सबके सामने लताड़ लगाई ।

क्या पहाड़ में आज कल आफत है ? पहाड़ में तो हमेशा आफत है, तफरीह करने वाले मजे में हैं क्योंकि दिल्ली वालों ने ऐसा पासा चला की हर घर में उनके एजेंट बन गए हैं । ठेकेदार और नेता हर गाँव में पैदा हो गए, जो धीरे धीरे दिल्ली वालों जैसे ही हो गए हैं । आपदा प्रबंधन की बात मत करिए, जिनसे आपको आशाएं हैं वो अपनी दीवारें मजबूत करने में लगे हैं । बरसात हमेशा बहुत कुछ बहा ले जाती है पर अब तो राजधानी भी पानी -पानी हो गई है, बह जाए कुछ दिल्ली वाली घास और गंधाता कीचड़ भी तब समझ में आये की ऊपर वाले की लाठी बराबर चलती है वर्ना ये ही सच है की भगवान भी बस अमीरों का है ।

(साभार : गपागपडॉटकॉम)

No comments:

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...