कब खड़ी होगी जनता अपने इन दुश्मनों के खिलाफ ?
राजीव लोचन साह
आज सुबह पहला टेलीफोन शमशेर सिंह बिष्ट का आया, गुस्से में थरथराता और असहायता में रोता हुआ सा। स्वाभाविक है। अगस्त 1977 में तवाघाट में भूस्खलन से 45 लोग जिन्दा दफ्न हो गये थे तो गिरदा औरउत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी के अन्य साथियों के साथ उन्होंने वहीं तम्बू गाड़ दिया था। कई हफ्तों के संघर्ष के बाद तभी आन्दोलन खत्म किया गया, जब खतरनाक परिस्थितियों में रह रहे खेला-पलपला गाँवों के निवासियों को तराई में बसा दिया गया। 1978 में भागीरथी में बाढ़ आयी तो वे जान हथेली पर लेकर गिरदा के साथ उन खतरनाक इलाकों के हालचाल लेने पहुँच गये, जहाँ उस वक्त प्रशासन का कोई भी आदमी नहीं पहुँचा था। गिरदा भागीरथी में बहते-बहते बचा था उस बार। फिर हमने दिल्ली जाकर तत्कालीन केन्द्रीय मन्त्री हेमवतीनन्दन बहुगुणा की अच्छी खबर ली थी….
पैंतीस साल बाद बाद अब वैसी सगत तो रह नहीं गयी। 66 साल की उम्र और किडनी की बीमारी से हाथी जैसा हो गया पाँव। ज्यादा पैदल चलना तो दूर, एक रात बस में बस में बैठे-बैठे यात्रा कर लो तो और ज्यादा सूज कर खम्भे जैसी हो जाती हैं पिंडलियाँ। मगर उम्र और शारीरिक अक्षमता पहाड़ को लेकर चिन्ता और सम्वेदना को तो धूमिल नहीं कर सकती न!
तो जबर्दस्त गुस्सा छलक रहा था शमशेर बिष्ट की आवाज में। क्या पहली बार क्षतिग्रस्त हुआ है केदारनाथ का मन्दिर ? एटकिंसन ने अपने गजेटियर में जिक्र किया है कि उनके समय में भी केदारनाथ मन्दिर की मरम्मत की गयी थी। तब न संचार था और न यातायात के साधन। मगर शासक विदेशी होने के बावजूद सबसे आगे रह कर खतरों से जूझते थे। एक अपने मुख्यमन्त्री हैं। पन्द्रह मिनट टिके नहीं रह सके रुद्रप्रयाग में।जनता का गुस्सा झेलने की ताब नहीं थी। प्रेस कांफ्रेंस भी दिल्ली में जाकर की। हरक सिंह रावत तो रह सकते थे वहाँ! अधिकारियों का हौसला बना रहता कि एक मन्त्री भी है हमारे साथ। मगर उन्होंने भी देहरादून की अपनी कोठी की सुविधा में रात काटना बेहतर समझा। एक पूर्व मुख्यमन्त्री हैं रमेश पोखरियाल 'निशंक'। अपने साथ ई टीवी के एक सम्वाददाता को लेकर हेलीकॉप्टर से दस मिनट के लिये केदारनाथ पहुँचे, ताकि टीवी पर बेशर्मी से चेहरा चमकाते हुये यह दावा कर सकें कि वे पहले नेता थे जो केदारनाथ पहुँचे। उस हेलीकॉप्टर से, जो दर्जनों लोगों को रेस्क्यू कर सकता था। कितनी अश्लीलता आ गयी है राजनीति में ? ये वे राजनेता हैं जो नदियों में अवैध खनन कर उन्हें अपना स्वाभाविक मार्ग बदलने को मजबूर करते हैं। सबके क्रशर लगे हुये हैं। इनके गण नदियों को आधा घेर कर, पिलर डाल कर रिजॉर्ट बनाते हैं, जेसीबी मशीनों से निर्माण कार्य की ठेकेदारी करते हैं। ये हमेशा पर्यावरणविरोधी परियोजनायें बनाने वाली कम्पनियों के साथ खड़े रहते हैं, डूबने, बहने वाले निरीह ग्रामीणों के साथ नहीं। अब इनकी निगाह केन्द्र से आने वाली 1000 करोड़ रुपये की राहत राशि पर पड़ गयी है, जिसे वे मिल-बाँट कर खा लेना चाहते हैं। पहाड़ को लेकर उनके मन में जरा भी सद्भावना होती तो वे बारह सालों में भी उन सैकड़ों गाँवों को विस्थापित न करते, जो खतरनाक हालातों में हैं और जिनकी संख्या सालों साल बढ़ रही है ? जबकि हम अविभाजित उत्तर प्रदेश में भी तवाघाट के पीड़ितों को विस्थापित करवा पाने में सफल हुये थे। कब खड़ी होगी जनता अपने इन दुश्मनों के खिलाफ ?
दरअसल शमशेर बिष्ट का गुस्सा उनका ही नहीं है, मेरा भी है। मैं भी अक्सर हताशा में बाल नोंचता हूँ कि क्या करूँ ? कैसे ये हालात बेहतर हों ? क्यों लोग साथ नहीं आते? अभी तो हम इन दुष्टों की गद्दी भी नहीं छीनना चाहते (चाहें भी तो कैसे छीन सकते हैं ?)। एक ऐसा दबाव ही तो बनाना चाहते हैं कि हमारे ये भाग्यविधाता समझ लें कि पहाड़ के लिये यह नहीं, बल्कि यह करना श्रेयस्कर है।
राजीव लोचन साह, जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता और वरिष्ठ पत्रकार हैं। उनके फेसबुक वॉल से साभार।


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