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गैर-मार्क्सवादियों से संवाद-19
स्वधीनोत्तर भारत का इतिहास:विशुद्ध आरक्षण पर संघर्ष का इतिहास
एच एल दुसाध
हम जानते हैं की हिन्दू आरक्षण की काट के लिए फुले ने आरक्षण नामक जिस औंजार का इजाद किया ,उसका सफल प्रयोग शाहूजी और पेरियार ने जरुर किया ,पर सही मायने में यह प्रभावी तब हुआ जब डॉ.आंबेडकर ने उसके इस्तेमाल का व्यापकतर अवसर संविधान के द्वारा सुलभ कराया.अगर sub stream में पड़े लोगों को main stream में प्रविष्ट करानेवाला परिवर्तन ही सच्चा सामाजिक परिवर्तन कहला सकता है तो डॉ आंबेडकर प्रवर्तित आरक्षण ही उसके लिए प्रभावी औंजार साबित हुआ.अगर जहर की काट ज़हर हो सकती है तो हिन्दू आरक्षण की सही काट अम्बेडकरी आरक्षण हो सकती थी,जो हुई भी.हिन्दू आरक्षण के चलते जिन सब पेशों को अपनाने की कल्पना करना का दलितों (अस्पृश्य-आदिवासियों)दु:साहसपूर्ण सपना था,अम्बेडकरी आरक्षण के चलते अब वे दुर्लभ नहीं रहे.हिन्दू ईश्वर और शास्त्रों द्वारा महाज दासत्व गुणों से भूषित किये गए मानवेतर स्वाधीन भारत में राजा,मंत्री,डॉक्टर,लेखक,प्रोफ़ेसर इत्यादि बनने लगे.धीरे-धीरे दलितों के मुख्यधारा से जुड़ने और सबलीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई.
किन्तु डॉ.आंबेडकर के ऐतिहासिक प्रयासों से वर्ण/जाति-व्यवस्था की अमानवीयता के शिकार लोगों की बेहतरी की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य होने के बावजूद आंबेडकरोत्तर भारत में समाज का चित्र लगभग पूर्ववत था.हजारों साल पूर्व जिन ब्राह्मण-क्षत्रिय और वैश्यों से युक्त सवर्णों का शक्ति के सभी स्रोतों पर एकाधिकार था,स्वाधीन भारत में भी उनका आर्थिक,राजनीतिक और धार्मिक क्षेत्रों में 80-85 %कब्ज़ा बरक़रार रहा.ब्राह्मणों की 'भूदेवता';क्षत्रियों की जन-अरण्य के 'सिंह' और वैश्यों की 'सेठजी' के रूप सामाजिक मर्यादा अम्लान थी.इन 15 प्रतिशत अल्पजनों को छोड़कर शेष समाजों के लोग कोर्ट-कचहरी,शहर और शिल्प-व्यवस्था,चिकित्सा और बाज़ार,फिल्म-टीवी-मीडिया का लाभ उठाने की स्थिति में नहीं थे.15 प्रतिशत हिन्दू साम्राज्यवादियों को छोड़कर बाकी जनता में 16-18 प्रतिशत विधर्मी व म्लेच्छ रूप में उपेक्षित; 52 प्रतिशत पिछड़े-अतिपिछडे योग्य रूप में विघोषित और साढ़े सात प्रतिशत लोग आदिवासी व जंगली रूप में धिक्कृत व निन्दित तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के समपरिमाण संख्यक लोग अस्पृश्य रूप में तिरस्कृत व बहिष्कृत रहे.कहने का मतलब 85 प्रतिशत लोगों पर हिन्दू आरक्षण की काली छाया विद्यमान थी.आंबेडकरोत्तर भारत में हिन्दू-आरक्षण के वंचितों के इस करुणतर चित्र ने मान्यवर कांशीराम को गहराई से स्पर्श किया.जिस तरह वैदिकोत्तर भारत में मानवता का करुणतर चित्र देखकर उसके निदान के लिए गौतम बुद्ध ने गृहत्याग किया था ,उसी तरह स्वाधीन भारत में हिन्दू आरक्षण की काली छाया से बहुजन समाज को मुक्त करने के लिए कांशीराम ने शानदार नौकरी और सांसारिक जीवन का परित्याग किया.उन्होंने सत्ता,सम्पदा,संसाधनों इत्यादि में असमानता की खाई को पाटने के लिए 'जिसकी जितनी संख्या भारी-उसकी उतनी भागीदारी' सिद्धांत लागू करने की परिकल्पना की.ज्योतिबा फुले,नारायण गुरु,शाहूजी महाराज,पेरियार और आंबेडकर के विचारों के समिश्रण से सामाजिक परिवर्तन की अपनी निराली परिकल्पना तैयार करनेवाले कांशीराम को ,हिन्दू आरक्षण की काली छाया से बहुजन समाज को मुक्त करने का चरम समाधान सत्ता दखल में नज़र आया.उन्होंने इसके लिए बहुजनों की जाति चेतना की राजनीतिकरण पर काम करना शुरू किया.
जाति चेतना के राजनीतिकरण की प्रक्रिया तेज़ होते ही परस्पर कलहरत बहुजनों में मानसिक बदलाव आने लगा.वे वैदिक भारत में अपने पुरुखों द्वारा खोये गए अधिकारों के पुनरुद्धार के लिए भ्रातृभाव लिए आर्यों की वर्तमान पीढ़ी के खिलाफ धीरे-धीरे संगठित होने लगे.इधर हिन्दू आरक्षणवादियों के खिलाफ कांशीराम का राजनीतिक अभियान चल ही रहा था कि 7 अगत 1990 को एक युगांतकारी घटना घट गई.वे जिस मंडल आयोग की रिपोर्ट को जनसमक्ष लाने के लिए विगत कई वर्षों से संघर्ष छेड़े हुए थे ,वह अचानक 7 अगस्त 1990 को को राष्ट्र के समक्ष आ गई.रिपोर्ट के प्रकाशित होते ही जो कुछ हुआ उसके आधार पर एक बच्चा भी कह सकता है कि भारत का इतिहास आरक्षण पर केन्द्रित संघर्ष का इतिहास है.
जिस रिपोर्ट को तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पि.सिंह ने आनन-फानन में प्रकाशित कर दिया ,वह लम्बे समय से हिन्दू आरक्षणवादियों के षड्यंत्र का शिकार बनकर ठन्डे बस्ते में पड़ी रही.डॉ आंबेडकर ने संविधान में धारा 340 का प्रावधान रचकर पिछड़ी जातियों के लिए भविष्य में आरक्षण का आधार बहुत पहले ही रख दिया था.वे ऐसा करने के लिए अपने विवेक के प्रति प्रतिबद्ध रहे.कारण जबसे उन्होंने सामाजिक परिवर्तन के आन्दोलन में खुद को समर्पित किया ,तबसे ही हिन्दू आरक्षण का शिकार शुद्रातिशूद्रों के लिए सार्वजनिक क्षेत्र में पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने का मामला उठाना शुरू कर दिया था.1928 में जब साइमन कमीशन भारत आया,उन्होंने अस्पृश्यों की ओर से प्रतिवेदन रखते हुए शुद्र नेताओं से अनुरोध किया था कि वे कांग्रेस के बहकावे में न आकर,साइमन कमीशन के सामने पिछड़ी जातियों के पृथक एवं स्वतंत्र प्रतिनिधित्व की मांग रखें.किन्तु गाँधी के अत्यधिक प्रभाव में रहने के कारण वे पिछड़ों के अधिकारों की अनदेखी कर गए,जिनमे लौह पुरुष सरदार पटेल भी थे .आंबेडकर ने दलितों के अधिकारों का मामला देश में हो रहे राजनीतिक परिवर्तनों के साथ जोड़ा और उनके अधिकारों के लिए संघर्ष किया.उनके उस संघर्ष के फलस्वरूप भारत को आज़ादी मिलने के साथ अनुसूचित जाति /जनजाति को आरक्षण के अधिकार मिले .अगर पिछड़ी जाति के नेताओं ने उस समय डॉ.आंबेडकर की बात मान ली होती,दलितों के साथ पिछड़ों को भी अधिकार सुलभ हो जाते.ऐसे में कोई और उपाय न देखकर बहुजन हितैषी बाबासाहेब को पिछडो के लिए धारा 340 का प्रवधान रचकर ही संतोष करना पड़ा था.10 अक्तूबर 1951 को जब उन्होंने केन्द्रीय मंत्रीमंडल से इस्तीफा दिया,तब उसके पीछे हिन्दू कोड बिल के साथ ही पिछडो का आरक्षण अन्यतम फैक्टर रहा.
बहरहाल धारा 340 के तहत ही सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ी जातियों को आरक्षण प्रदान करने हेतु काका साहेब कालेलकर की अध्यक्षता में 29 जनवरी 1953 को एक आयोग गठित किया गया जिसने अपनी रिपोर्ट 30 मार्च 1955 को भारत सरकार को सौंप दी.काकासाहेब कालेलकर पुना के ब्राह्मण थे.उन्होंने अपनी रिपोर्ट में जाति के आधार पर पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने के सिद्धांत को मान्यता प्रदान की और उस पर हस्ताक्षर भी कर दिया.किन्तु उनपर ब्राह्मण का हिन्दू आरक्षणवादी चरित्र हावी हो गया और उन्होंने सरकार को अलग से पत्र लिखकर जाति के आधार पर आरक्षण दिए जाने का विरोध कर दिया.इस अंतर्विरोधी स्थिति का लाभ उठाते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरु ने कालेलकर की रिपोर्ट ही खारिज कर दी.तबसे पिछड़ों के आरक्षण का मामला अधर में लटका रहा.
बाद में 1977 में पिछड़ों के आरक्षण की स्थिति तब अनुकूल हुई जब जनता पार्टी ने कांग्रेस को हराने के लिए अपने घोषणापत्र में कालेलकर आयोग के अनुसार पिछड़ी जातियों को आरक्षण देने का आश्वासन दे डाला.संयोग से जनता पार्टी चुनाव जीत गई और आरक्षण के मुद्दे को टालने के लिए प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने बीपी की अध्यक्षता में एक आयोग की स्थापना कर डाला.किन्तु मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के पहले ही जनता पार्टी सत्ता से बाहर हो गई .उसकी जगह दुबारा सत्ता में आई कांग्रेस मंडल रिपोर्ट को टालती रही.उसका ढुलमुल रवैया देखते हुए कांशीराम रपट प्रकाशित करवाने के लिए लगातार आन्दोलन चलाते रहे.इस बीच 1989 में पुनः सत्ता परिवर्तन हुआ और वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने.प्रधानमंत्री बनने के कुछ अंतराल बाद ही वे राजनीतिक संकट से घिर गए जिससे उबरने के लिए उन्होंने 7 अगस्त 1990 को मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित कर दी.यह इतिहास का एक परिहास ही कहा जायेगा की पिछड़ों के जिस आरक्षण को रोकने में सवर्ण सत्ताधारी लम्बे समय से मुस्तैद रहे उसका मार्ग सवर्ण जाति के ही एक नेता ने प्रशस्त कर दिया.
बहरहाल मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद हिन्दू साम्राज्यवादियों ने देश में कैसे हालात पैदा कर दिए,यह सबने देखा है.वह घटना अभी भी लोगों के जेहन से विलुप्त नहीं हुई है.हमें याद है सवर्ण युवक जहाँ आत्म-दाह और राष्ट्र की सम्पदा दाह में प्रवृत हुए,वहीँ मीडिया ने इस आग को हवा पानी देने में बढ़-चढ़कर भूमिका अदा की.बाद में बहुत से बुद्धिजीवियों ने सफाई देते उए कहा कि 'मंडल के खिलाफ आत्मदाह के उग्र प्रतिरोध से सामाजिक ध्रुवीकरण का जो माहौल पैदा हुआ,उसने पत्रकारों के विवेक को कुछ हद तक सीमित कर दिया.लेकिन यह अस्थाई भाव था;सुप्रीम कोर्ट ने जब मंडल के समर्थन में फैसला दिया तो अखबारों ने उसका गुणदोष विवेचन कर संतुलित रवैया अपनाया.'कुछ ने मीडिया में छाये मंडल विरोधियों की सफाई में कहा कि जब मंडलवादी आरक्षण का मुद्दा उठा तो पहले मंडल के उपयोगी पक्ष को समझ नहीं पाए और अन्यायपूर्ण मानकर कई पत्रकार विरोध पक्ष के साथ हो गए.पर दो-ढाई वर्ष के विचारमंथन के बाद जब उसे लागू करने की पक्की घोषणा की गई ,तब लोगों ने अपनी भूल सुधार कर ली'.किन्तु मंडल विरोधयों की सफाई गानेवाले लोग निरीह थे.उन्हें भारत के इतिहास की कोई जानकारी ही नहीं थी'इसलिए वे जान नहीं पाए कि भारत का सदियों पुराना इतिहास आरक्षण पर केन्द्रित संघर्ष का इतिहास रहा है,जिसमें कुछ नए पन्ने मंडल आन्दोलन से जुड़ गए.
सदियों से सवर्णों के दिलो दिमाग में मूलनिवासी शुद्रातिशूद्रों के अधिकारों के विरुद्ध संचित भावना का ही प्रकटीकरण मंडल के दिनों में हुआ था.उन दिनों हिन्दू आरक्षणवादियों का वह विरोध मूलनिवासियों के किसी भी प्रकार के मानवीय अधिकारों के प्रति नफरत के स्थाई भाव का ही प्रकटीकरण था .उसी का पुनः प्रकटीकरण 2006 में तब हुआ जब पिछडो के लिए उच्च शिक्षण संस्थाओं के प्रवेश में आरक्षण की घोषणा हुई .
वास्तव में 2006 में मंडल-2 ने आँख में अंगुली करके दिखा दिया कि भारत का इतिहास सिर्फ और सिर्फ आरक्षण पर संघर्ष का इतिहास है.मंडल-2 के दौर में एम्स और आईआईटी जैसे उच्च शिक्षण संस्थाओं में शिक्षा व कार्यरत हिन्दू साम्राज्यवादियों की सबसे काबिल संतानें शहीदी तेंवर के साथ सड़कों पर उतर आई थीं.उनमे बहुतों ने अपने शर्ट पर लिख रखा था-सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैं-देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है.'उनका उग्र तेंवर देखकर कईयों ने गृह युद्ध की आशंका तक व्यक्त कर डाली थी.उनका आक्रामक अंदाज़ देखकर ऐसा लगता था मानो वे एक शत्रु राष्ट्र के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं.जिस तरह दूसरे देश से युद्ध के समय आमलोग सेना को तरह -तरह से सहयोग करते हैं उसी तरम सवर्णों का बौद्धिक,अबौद्धिक हर तबका आरक्षण विरोधी छात्रों का तरह-तरह से सहयोग कर रहा था.यहाँ तक कि बार-बालायें छोटे-मोटे भामाशाह के रूप में अवतरित हो गेन थीं.उन्होंने जिस्मफरोशी द्वारा बहादुर आरक्षण विरोधियों को धन मुहैया सुलभ कराने की खुली घोषणा कर डाला था.पिछड़ों के आरक्षण के खिलाफ मर मिटने पर आमादा सवर्ण छात्र-छात्राओं के पीछे उनके अभिभावक,वकील व अधिकारी वर्ग तथा पूरी मीडिया लामबंद हो गई थी.यह सारा कुछ इस बात का सूचक है कि मंडल-2 में भी हिन्दू साम्राज्यवादियों ने मूलनिवासी बहुजनों को एक विरोधी राष्ट्र समझते हुए उनके शत्रु जैसा व्यवहार किया था.
बहरहाल दो दशक पूर्व मंडल विरोध में एक शत्रु राष्ट्र की भांति बहुजन समाज के विरुद्ध अवतरित होकर सवर्ण छात्र-छात्राओं , उनके अभिभावकों,मीडिया और बुद्धिजीवियों ने यह सन्देश दे ही दिया था कि वे सामाजिक विवेक से शून्य और दलित-पिछड़ों के अधिकारों के प्रति अनुदार हैं,पर हिन्दू-आरक्षण (वर्ण-व्यवस्था ) की पोषक और सवर्ण हितों की चैम्पियन संघ परिवार ने तो उसके खिलाफ स्वाधीन भारत का सबसे बड़ा आन्दोलन ही संगठित कर दिया था .मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होते ही जहाँ सवर्ण छात्र-छात्राएं आत्म-दाह और राष्ट्र की सम्पदा दाह में जुट गए ,वहीँ संघ परिवार ने संग-संग राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन छेड़ दिया.बाद में इस आन्दोलन को दूर से निहारनेवाले स्वंयसेवी प्रधान ने बड़े गर्व के साथ इसे स्वाधीनोत्तर काल का सबसे बड़ा आन्दोलन करार दिया.बच्चों तक को मालूम है कि स्वाधीनोत्तर भारत का विराटतम आन्दोलन सिर्फ पिछड़ों के आरक्षण के खिलाफ संगठित हुआ था.राम जन्मभूमि आन्दोलन के फलस्वरूप राष्ट्र की कई हज़ार करोड़ की संपदा और असंख्य लोगों की प्राणहानि हुई .
मित्रों स्वाधीनोत्तर भारत के इतिहास के आईने में निम्न शंकाएं आपके समक्ष रख रहा हूँ-
1-भारत में वर्ग-संघर्ष का मतलब अल्पजन सवर्णों और सर्वस्वहारा शुद्रातिशूद्रों के मध्य संघर्ष है,क्या यह बात मंडल विरोध से साबित नहीं हो जाती?
2- नौकरियों तक सिमित परम्परागत आरक्षण गैर-बराबरी के खात्मे में सफल नहीं हो पाया,इसका प्रमाण यह है कि आज भी परम्परागत सुविधाभोगी वर्ग का शक्ति के स्रोतों पर हजारों वर्ष पूर्व की भांति 80-85 प्रतिशत कब्ज़ा है.आप इससे कितना सहमत हैं?
3-क्या समतामूलक समाज या सर्वहारा की लड़ाई लड़नेवालों को अपनी सारी उर्जा सुविधाभोगी वर्ग के हाथों से शक्ति के स्रोतों को मुक्त करने में नहीं लगानी चाहिए थी?
4-जिस तरह गौतम बुद्ध ने हजारों वर्ष पूर्व बहुजन हिताय के लिए राजसिक सुख का परित्याग किया था ,क्या ऐसा नहीं लगता कि मान्यवर कांशीराम ने एक वैज्ञानिक की नौकरी तथा सांसारिक सुख परित्याग कर तथागत के इतिहास को दोहराया था?
5-आज संघ विरोधी सिर्फ साम्प्रदायिकता के नाम पर अडवाणी और खासकर नरेंद्र मोदी के खिलाफ मुखरित हैं.पर वे भूल रहे है की आज भाजपा और उसके नायकों की जो कद्दावर छवि बनी है उसकी बुनियाद पिछडो के आरक्षण का विरोध है,ऐसे में क्या यह बेहतर नहीं होता कि अभी-अभी जाग्रत हुए पिछड़े समाज के लोग संघ परिवार को मंडल विरोध की सजा आनेवाले लोकसभा चुनाव में गहरी शिकस्त देकर करें.
6-क्या आपको लगता है कि जिस तरह मार्क्सवादी साम्रदायिक संघ के खिलाफ मुखरित रहते हैं, मंडल विरोधी संघ के खिलाफ भी वे उतना ही आक्रामक रहते हैं?मेरे ख्याल से नहीं.पर हर बात को आर्थिक नज़रिए से देखनेवाले मार्क्सवादियों के लिए क्या यह उचित नहीं कि साम्प्रदायिक संघ की बजाय वे मंडल-विरोधी संघ के खिलाफ हमलावर हों?
तो मित्रों ! फिलहाल इतना ही .मिलते हैं फिर कुछ और नई शंकाओं के साथ.
जय भीम-जय भारत
दिनांक:22 जून 2013

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