| Tuesday, 24 January 2012 10:43 |
कुमार प्रशांत अटल बिहारी वाजपेयी हमेशा से भाग्यवान रहे हैं। जब-जब स्थितियां अनुकूल रहीं, वे मंच पर रहे। जब सितारे प्रतिकूल हुए, उसे आडवाणी को संभालना पड़ा है। आज अपनी उम्र और स्वास्थ्य के कारण अटल बिहारी तस्वीरों में ही दिखते हैं। भले उनका फोटो छाप कर भाजपा मतदाताओं के पास जा रही है, लेकिन वाजपेयी को अब न उन मतदाताओं की सुध है और न मतदाताओं को उस फोटो की याद है! आडवाणी की स्थिति सबसे दयनीय है। वे पार्टी में कभी भी नैतिक राजनीति के पैरोकार नहीं रहे। वे हमेशा अवसरवादी राजनीति के खिलाड़ी रहे हैं जिसमें माना जाता है कि जो फलदायी है, वही नैतिक है। आज जब गडकरी मंडली भी उसी राह पर चलना चाह रही है और दोनों की फलदायी की परिभाषा में अंतर पड़ रहा है तो सारा खेल गड़बड़ा रहा है। जो नैतिक है वही फलदायी है, यह सच भारतीय राजनीति में आज सिरे से अमान्य है। इसलिए भाजपा का कुल गणित यह है कि उत्तर प्रदेश में उसकी सरकार तो बनने नहीं जा रही है, और न वह स्वाभाविक रूप से सपा या कांग्रेस के साथ गठबंधन कर सकती है। मायावती उसे साथ ले सकती हैं, यह सपना अभी न मायावती देखती हैं न गडकरी! इसलिए भाजपा सभी किस्म के तत्त्वों को जोड़ कर चुनाव से इतना ही निकालना चाह रही है कि वह खेल-बिगाड़ू वाली स्थिति बना सके। उत्तर प्रदेश में वह ऐसी ताकत भी बना ले कि जो अस्थिरता पैदा कर सके तो यह उसकी बड़ी उपलब्धि होगी। ऐसा करने के लिए कितनी सीटें जीतीं इसका नहीं, इसका हिसाब करना ठीक होगा कि विधानसभा के भीतर और बाहर आपके साथ कैसी शक्तियां जुड़ी हई हैं। भाजपा बस यही करने में लगी है। संघ परिवार के आका इस राजनीतिक सचाई को समझ रहे हैं और इसलिए बड़ी अर्थपूर्ण चुप्पी साधे हुए हैं। इस पूरे आकलन से जो तस्वीर बनती है क्या उसमें आपको कोई किसी से ज्यादा सफेद दिखाई दे रहा है? भारतीय राजनीति का आज का सच यही है। यही सच है जो लोकपाल पर हुई बहस के दौरान लोकसभा और राज्यसभा में दिखाई पड़ा था और आज उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव की कुंडली में भी दिखाई पड़ रहा है। अण्णा हजारे और उनके साथियों का हिसाब यहीं आकर गड़बड़ाया। वे यह समझ बैठे थे कि कांग्रेस सत्ता में है तो सत्ता खोने का उसे सबसे अधिक डर होगा और इसी डर को दवाब में बदल कर वे अपना जन लोकपाल बनवा लेंगे। उन्हें ऐसा लगा था कि जन लोकपाल बनना कोई तकनीकी सवाल है जिसे सिर्फ नारों और भीड़ के दबाव से हल किया जा सकता है। अण्णा आंदोलन के पीछे थोड़ा वामपंथी रुझान रखने वाले, दक्षिणपंथी सोच से जुडेÞ और थोड़ा उदारवादी रुख रखने वाले लोगों का नेतृत्व है। उसने भी बहुत हद तक रास्ता वही अपनाया कि जिससे फायदा मिलता हो, उसे साथ ले लो। इसलिए बाबा रामदेव से लेकर श्री श्री रविशंकर तक और कांग्रेस के विरोधी राजनीतिक दलों तक उसकी दौड़ चलती रही। उसके नारे, बैनर, पोस्टर सभी ऐसा ही सोच दर्शाते रहे। लोकसभा और राज्यसभा में उसका भ्रम टूटा और मुंबई में वह धरातल पर उतरा! सुधारना और बदलना, दो अलग-अलग काम हैं जो दो अलग-अलग रणनीति से चलाए जाते हैं। महात्मा गांधी ने इन दोनों को एक साथ चलाने का अद्भुत प्रयोग किया। लेकिन यह कतई जरूरी नहीं कि अण्णा आंदोलन या दूसरा कोई भी आंदोलन गांधी की इसी रणनीति का अनुसरण करे। जरूरी यह है कि वह अपनी भूमिका निर्धारित करे, उसकी मर्यादाएं समझे और उसी आधार पर अपने कदम तय करे। मुंबई के बाद अण्णा आंदोलन ने अपनी जो भूमिका बनाई है, डर है कि वह उसे अधिक भटकाएगी। लेकिन हम इसे चुनाव के बाद, अलग से जांचने की कोशिश करेंगे। अभी तो सुधार और बदलाव चाहने वाली दोनों ताकतें उत्तर प्रदेश चुनाव के आईने में अपनी सूरत देखें और कहीं यह भी हिसाब करें कि सत्ता में जो भी आएगा, उसके साथ सुधार और बदलाव का एजेंडा कैसे तय किया जाएगा। |
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Tuesday, January 24, 2012
मौकापरस्ती की होड़
http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/20-2009-09-11-07-46-16/9602-2012-01-24-05-13-55
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