| Monday, 23 January 2012 10:30 |
भीम सिंह इतना ही नहीं, एक नई संस्कृति यह पनप रही है कि बडेÞ-बडेÞ राजनीतिक दलों की उम्मीदवारी चाहने वाले टिकट के लिए करोड़-दो करोड़ रुपए तक देने को तैयार हैं। जो प्रत्याशी करोड़ों रुपए खर्च करके लोकसभा में पहुंचेगा, वह भी सिर्फ पांच वर्षों के लिए, तो क्या वह इस खर्च की भरपाई या बदले में और ज्यादा धन इकट्ठा करना नहीं चाहेगा? ऐसे में अवैध खनन या घोटाले और विवेकाधीन कोटे के तहत अपने कृपापात्रों को सरकारी जमीन दिलाने के मामले क्यों नहीं होंगे? लोकपाल विधेयक पर हुई बहस में ग्रुप-सी और डी के कर्मचारियों को लोकपाल की जांच के दायरे में लाने की मांग पर बड़ा बवाल मचा। लेकिन उनकी भी दास्तान ऐसी ही है। यहां भी स्रोत यानी उनकी भर्ती से ही भ्रष्टाचार शुरू हो जाता है। इसमें कोई शक नहीं कि पुलिसकर्मी और क्लर्क की नौकरी पाने के लिए चार-पांच लाख रुपए 'खर्च' करना पड़ जाता है। इसी तरह इंजीनियर और डॉक्टर की पढ़ाई के दाखिले और ग्रुप-बी के अधिकारी की नौकरी पर आठ-दस लाख खर्च होना मामूली बात है। स्वाभाविक है कि ये लोग भर्ती होते ही अपनी इस लगाई गई पूंजी को हासिल करने की भरसक कोशिश करते हैं और यही है प्रशासन में भ्रष्टाचार का स्रोत। जब भ्रष्टाचार से ही उनकी भर्ती होती है तो फिर उनसे ईमानदारी की आशा करना बेमानी है। आम लोग अपने स्वार्थों के कारण वास्तविकता से रूबरू होने से कतराते हैं। चाहे संसद और विधानसभाओं के चुनाव हों या फिर सरकारी पदों पर भर्ती, ये जिस तरह से हो रहे हैं उसका समाज और देश के लिए दूरगामी परिणाम बहुत बुरा हो सकता है। अगर इसकी अनदेखी की गई तो एक दिन विश्व का यह सबसे बड़ा लोकतंत्र भयानक उथल-पुथल में फंस जाएगा। इसलिए हर वर्ग के और हर समुदाय के मतदाता के लिए यह जरूरी है कि वह लोकतंत्र का सजग प्रहरी बने। जब तक व्यवस्था के हर स्तर पर फैली लूट-खसोट की मानसिकता बदली नहीं जाती, भ्रष्टाचार पर काबू पाना नामुमकिन है। भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को इसी समूल क्रांति की ओर अग्रसर होना होगा। लोकपाल तो सिर्फ एक 'राजदंड' का काम कर सकता है। वह यह भय पैदा कर सकता है कि अगर किसी ने रिश्वत लेने की जुर्रत की तो उसके खिलाफ कार्रवाई अवश्य होगी, कोई अपनी पहुंच के बल पर बच नहीं पाएगा। अभी हालत यह है कि बड़े नौकरशाहों और राजनीतिकों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए सीबीआई को केंद्र सरकार का मुंह जोहना पड़ता है। यह बात राज्यों की भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियों पर भी लागू होती है। अगर सीबीआई लोकपाल के तहत हो तो अपने कृपापात्र दागियों को बचाने का यह खेल बंद हो सकता है। पर भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए सिर्फ दंड का भय काफी नहीं है। समाज में सदाचार की प्रेरणा भी पैदा करनी होगी। वह कहां से आएगी? भ्रष्टाचार को रोकने के लिए हर नागरिक का यह कर्तव्य बनता है कि वह भ्रष्ट, बाहुबली या आपराधिक पृष्ठभूमि के प्रत्याशी को वोट न दे। अगर ऐसे उम्मीदवार जीतते रहेंगे तो राजनीतिक दलों की भी यह मजबूरी हो जाएगी कि इन्हें टिकट दें। इसलिए सबसे पहले हर मतदाता को जागरूक बनना होगा और निडर और निस्वार्थ होकर अपना वोट भ्रष्ट और बाहुबली प्रत्याशियों को न देने का संकल्प लेना होगा। दूसरा तकाजा है कि चुनाव प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन किया जाए; चुनाव अभियान को पूंजीपतियों, बाहुबलियों और सांप्रदायिकता के प्रभाव से मुक्त किया जाए। क्या संसद इसके लिए ठोस पहल करने की इच्छाशक्ति दिखा सकेगी? |
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Tuesday, January 24, 2012
भ्रष्टाचार के रास्ते
भ्रष्टाचार के रास्ते
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