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Memories of Another day

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While my Parents Pulin babu and Basanti devi were living

Saturday, June 22, 2013

टिहरी बांध टूटा तो दिल्ली तक मचेगी तबाही

टिहरी बांध टूटा तो दिल्ली तक मचेगी तबाही
http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/1-2009-08-27-03-35-27/47498-2013-06-22-04-46-18

Saturday, 22 June 2013 10:15

प्रतिभा शुक्ल 
नई दिल्ली। केदारनाथ सहित समूचे उत्तराखंड में जो कुछ हुआ है उससे भी भयावह हालात दिल्ली तक के हो सकते हैं। हमें इसे प्रकृति की चेतावनी समझ कर विकास के नाम पर हो रही विनाशलीला को रोक देना चाहिए। टिहरी झील को धीरे-धीरे खाली कर देना चाहिए। ये बातें गंगा आंदोलन से जुड़े पूर्व न्यायाधीश गिरधर मालवीय ने कहीं। उन्होंने पहाड़ों में एक भी बांध नहीं बनने देने क ी वकालत की। पहाड़ों के सालों पुराने पेड़ काटने पर सख्त पाबंदी लगाने की दरकार बताई।
उन्होंने कहा-टिहरी कच्चे पहाड़ों से घिरी झील तो है ही ऊपर से यह भूकम्प के लिहाज से संवेदनशील माने जाने वाले क्षेत्र में भी है। झील जो अथाह जलराशि का भंडार है, वह गाद और मलबे से भर रही है। इसमें जानवरों के शव पड़े हैं। इससे केवल बारिश के मौसम में खतरा है, ऐसा नहीं है। इसके कच्चे पहाड़ तबाही के जितने बड़े कारक बन सकते हैं उतना बड़ा ही खतरा कभी भी भूकम्प के झटकों का है। इसके अलावा पहाड़ों का सीना चीरने और सड़क या सुरंग बनाने के लिए किए जाने वाले बारूदी विस्फोट कब चुपके से झील के निचले हिस्से की दीवारों में दरार डाल देंगे पता भी नहीं चलेगा। आइआइटी के इंजीनियरों और वैज्ञानिकों तक ने इसे खतरनाक बताया है। 
मालवीय ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर कभी टिहरी बांध टूटा तो पहाड़ी इलाकों के साथ मैदान के हरिद्वार, मुरादाबाद, मेरठ और दिल्ली तक तबाही का जो मंजर होगा वह कितना भयावह होगा इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता है। इसलिए समय रहते चेत जाने की जरूरत है। बांध को पहले चरणबद्ध तरीके से खाली करवा के तोड़ देना चाहिए। बिजली की जरूरतों के सवाल पर उन्होंने कहा कि दरअसल बिजली के लिए नहीं मंत्रियों और नौकरशाहों की जेबें भरने के लिए धड़ाधड़ बिजली परियोजनाओं को मंजूरी दी जाती है। 
उन्होंने बिना किसी का नाम लिए कहा कि हाइड्रो पावर परियोजनाओं को मंजूरी देने के लिए एक-एक मेगावाट बिजली के एवज में करोड़ रुपए मांग रहे हैं। जबकि बिजली के तमाम वैकल्पिक साधन हैं। उनका इस्तेमाल बढ़ाया जाना चाहिए। पहाड़ों में पवन चक्की से पैदा होने वाली ऊर्जा की अपार संभावनाएं हैं। सौर ऊर्जा पर देश भर में काफी काम हो सकता है। गंगा को हम जरूरत के लिए नहीं लालच के कारण मार रहे हैं। टिहरी झील के पानी में कीड़े पड़ रहे हैं। गंगा के मैदानी इलाके  में तो नहर की जरूरत ही नहीं थी, जिसके लिए गंगा को बांधना पड़े। नहर तो यूरोप की जरूरत है जहां पठार ही पठार हैं।  

गंगा का यह इलाका तो दोआब कहलाता है। यह वो क्षेत्र रहा है जहां बीज बिखरा भर देने से लहलहाती फसल अपने-आप हो जाती थी। यहां हाथ-दो हाथ क ी गहराई पर ही पानी मिलता रहा है। लोग बैलों की मदद से कुएं से सिंचाई कर लेते थे। लेकिन हमने पश्चिम की नकल करके नहरें बना लीं। जबकि मदन मोहन मालवीय ने 1916 में अंग्रेजों से हुए समझौते में मनवाया था कि गंगा की अविरल धारा को कभी भी रोका नहीं जाएगा। गुलामी के दौर में हमने अंग्रेजों से अपनी बातें मनवा ली थीं। लेकिन आजाद भारत में अपनी ही सरकारों व कारपोरेट जगत से हम गंगा क ो नहीं बचा पा रहे हैं। समझौते के सरकारी दस्तावेज में मौजूद होने के बावजूद हम बांध व नहरें बनाते जा रहे हैं। नलकूप लगा कर भूजल स्तर को एकदम नीचे गिरा दिया। रासायनिक उर्वरक झोंक कर मिट्टी की स्वाभाविक नमी खत्म कर दी। जैविक खेती की परंपरा को फिर से कायम करने की जरूरत है।   
नरोरा में गंगा पर काम कर रहीं साध्वी समर्पिता का कहना है कि उत्तराखंड में नदी की व्याकुलता फूटी है। हमने बांध से, सुरंग से, प्लास्टिक से, प्रदूषण से और पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से नदियों की सांसे रोक दीं। नदी आकाश और भूतल से ऊर्जा लेती है। सुरंग में डालने से नदी का आकाश से संपर्क  टूटता है। नदी का स्वाभाविक वाष्पीकरण बाधित होता है। बांध से बनी झील में अथाह गाद से उसका पाताल से सहज संपर्क खत्म हो जाता है। भूतल का पानी नाले, कचरे, प्लास्टिक से विषैला हो चुका है। नदी में गाद से जरा सी बारिश में तुरंत बाढ़ आ जाती है। फिर तबाही मच जाती है। यह नदी की अकुलाहट है, जिसे हमें समझना ही होगा।

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