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Memories of Another day

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While my Parents Pulin babu and Basanti devi were living

Saturday, June 22, 2013

देश अपना गांधी बेगाना

देश अपना गांधी बेगाना

Saturday, 22 June 2013 11:47

गिरिराज किशोर 
जनसत्ता 22 जून, 2013: गांधीजी की स्मृतियों और उनके पत्रों के बारे में मैं पिछले एक वर्ष से सरकार से लिखा-पढ़ी कर रहा था। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, संस्कृति मंत्री ने कोई नोटिस नहीं लिया। केवल सोनिया गांधी का 10 जुलाई 2012 का पत्र मिला जिसमें उन्होंने सूचित किया था कि संस्कृति मंत्रालय ऐसी नीलामी के संबंध में नियम बना रहा है। उनके पत्र से लगा कि वे इस समस्या को गंभीरता से ले रही हैं। जनार्दन द्विवेद्री ने भी पत्र लिख कर मेरे इस प्रयत्न को समर्थन दिया। मैंने इस पूरे पत्र-व्यवहार और मीडिया के समर्थन के लिए एक पुस्तिका- गांधी की नीलामी से मुक्ति?- अपने खर्च से छपवाई। कैलनबैक-गांधी के पत्र-व्यवहार को भारत सरकार ने अवश्य कैलनबैक के वारिसों से साढ़े छह करोड़ में खरीदवाया। शायद उन्हीं के हस्तक्षेप से गांधी-कैलनबैक पत्र वापस आए थे। इस बात की सूचना भी उन्होंने मेरे पत्र के जवाब में अपने 10 जुलाई'12 के पत्र में दी थी।
लेकिन मुझे आश्चर्य हुआ कि उसके बाद दो नीलामियां और हुर्इं। उनमें से अंतिम नीलामी पिछले महीने 21 मई को हुई थी। उसकी सूचना भी मैंने सोनिया जी, संस्कृति मंत्री और राष्ट्रपति को दी थी। कहीं से कोई जवाब नहीं आया। मुझे आश्चर्य है कि संस्कृति मंत्रालय ने लगभग ग्यारह महीनों में नियम क्यों नहीं बनाए? अगर बनाए तो कैलनबैक-गांधी के पत्रों की नीलामी न होने के बाद दो नीलामी कैसे हो गर्इं? संस्कृति मंत्रालय ने जो नियम बनाए उन्हें जगजाहिर क्यों नहीं किया गया? जब देश की सम्मानित नेता और यूपीए की अध्यक्ष बिना किंतु-परंतु लगाए एक आश्वासन देती हैं तो उनकी सरकार का एक मंत्रालय उसे नजरअंदाज कैसे कर सकता है? संस्कृति मंत्री को पत्र लिख कर उक्त पत्र का संदर्भ देते हुए पूछा गया तो भी वहां से कोई स्पष्टीकरण या सूचना नहीं मिली। 
यह सवाल जटिल होता जा रहा है कि गांधी से जुड़ी सामग्री, चाहे स्मृति से जुड़ी हो या जीवन से, देश से उसका संबंध होना चाहिए या नहीं; देश के लोग जो पैसे के लालच में उस सामान को विदेश भेजते हैं उन पर रोक लगनी चाहिए या नहीं? यह ठीक है गांधी विश्व के हैं, मगर क्या इस आधार पर उनकी सब सामग्री नीलामी में विदेश भेज दी जाए? 
इक्कीस मई 13 को होने वाली नीलामी के संदर्भ में जब कहीं से कोई उत्तर नहीं आया तो मैंने गांधी शांति प्रतिष्ठान की अध्यक्ष राधा बहन को फोन किया; वे कौसानी में थीं। उनसे निवेदन किया कि आप दिल्ली के कुछ गांधीवाद्रियों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों की मीटिंग बुला कर इस विषय पर चर्चा करें। सरकार जब उदासीन हो जाती है बुद्धिजीवियों को सक्रिय होना पड़ता है। वे सत्ताईस मई को लौट रही थीं; उन्होंने उसी दिन प्रतिष्ठान के सचिव सुरेंद्र्र जी से कह कर मीटिंग रखवाई। राधा बहन के सरोकार ने मुझे प्रेरणा भी दी और यह भी लगा कि इस मसले पर कोई तो इतना गंभीर है। मुझे अच्छा लगा कि 27 मई की उपरोक्त बैठक में कई महत्त्वपूर्ण लोगों ने हिस्सा लिया।
वहां पर जो बातें हुर्इं, मुझे लगा गांधी अब बीते दिनों की चीज हो गए। राधा बहन ने चर्चा मुझसे ही आरंभ कराई। मेरा निम्न मुद्दों पर जोर था: भारत से जो सामग्री विदेशों में जाकर नीलाम हो रही हैं उनसे गांधी और देश की प्रतिष्ठा धूमिल हो रही है। हमारे देश के लोगों के बारे में यह प्रचारित है कि हम पैसे के लिए कुछ भी कर सकते हैं। अप्रैल से मई के बीच में तीन बार नीलामी हो चुकी (जिनमें से एक को भारत सरकार ने 6.5 करोड़ खर्च करके रोका); समाचारपत्रों में नीलाम हुई जिन वस्तुएं के नाम छपे थे उनसे एक भ्रम होता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि गांधी की छवि को बिगाड़ने का प्रयत्न हो रहा है। 
एक अखबार में छपा था, गांधीजी की माला नीलाम होगी। जितना मैंने पढ़ा है, कहीं यह नहीं मिला कि वे कर्मकांडी थे, माला जपने में विश्वास करते थे। जो वस्तुएं 21 मई को बिकीं उनमें उनके रक्त की स्लाइड, बिस्तर की चादर, शॉल, चप्पलें और उनके हस्त-लिखित दस्तावेज थे (जिनमें शायद वसीयत भी थी; यह पढ़ने को नहीं मिला कि उनकी कोई वसीयत थी, अगर थी तो भारत में होनी चाहिए थी)। स्लाइडों को खरीदने में लोग झिझक रहे थे। जितनी कीमत स्लाइडों की लगी वह प्रस्तावित कीमत से काफी कम थी। इसका मतलब है लोगों को शक था कि स्लाइड गांधीजी के रक्त की हैं या नहीं। 
गांधी के नाम के पीछे इतनी विश्वसनीयता अभी है कि उनका नाम लेकर लोग कुछ भी बेच लेते हैं। बाजार के बारे में, सूचना के अनुसार, अनुपम मिश्र ने कहा कि बाजार नकली चीजों की कीमत कभी नहीं लगाता। बाजार संसार भर में नकली चीजें बेच रहा है। भारत तो इसका केंद्र है।
दरअसल बाजार ब्रांड के पीछे दौड़ता है। गांधीजी का नाम विदेशी बाजार में ब्रांड हो गया है। मुझे अकबरी लोटा कहानी याद आती है, उसमें भी अकबरी लोटा एन्टीक के रूप में भेड़ा जा रहा था। उस कहानी में अकबर का नाम ब्रांड था, लोटा नहीं। अब तक गांधीजी की चप्पलें कई बार नीलामी पर चढ़ चुकी हैं। उनकी एक चप्पल सेवाग्राम में रखी है जिसे वास्तविक माना जाता है। सवाल है कि 21 मई को गांधीजी की जो चप्पल बिकी वह कौन-सी चप्पल है, इसका कोई ब्योरा है? गांधी की चप्पल या अन्य वस्तुएं मूल रूप से कहां से और किस-किस के पास से आई हैं?

जैसे एन्टीक वस्तुओं का पंजीकरण है, क्या ऐसा कोई नियम है कि देश के महान लोगों के उपलब्ध सामान की शुमारी होती हो और उनका पंजीकरण होता हो? मूर्तियों की तस्करी में भी इस तरह का धंधा   चलता है। दरअसल बाजार का सिद्धांत है कि जिसकी रिसेल वैल्यू हो उसे ही खरीदो और बेचो। मैं बहुत नम्रतापूर्वक निवेदन करना चाहता हूं अगर बड़े मिश्र जी (भवानी बाबू) होते तो शायद इस प्रश्न पर उनकी चिंता भी यही होती जो मुझ जैसे अनेक लोगों की है। उन्हें बाजार की चिंता नहीं रही। हालांकि वामपंथी आलोचक गांधी कवि होने के कारण उनको बनिए का कवि कहते थे।
राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय के पूर्व निदेशक वाइपी आनंद साहब मेरे बोलने के बाद राधा बहन और तारा जी के आग्रह पर बोले थे। उन्होंने बड़े-बड़े पदों पर रहने के बावजूद कार नहीं खरीदी। क्योंकि उन दिनों विदेश से निर्यात किया गया पेट्रोल इस्तेमाल होता था। आज भी वे मेट्रो या स्कूटर से चलते हैं। उन्होंने बताया कि जब भी गांधीजी से संबंधित स्मृति-चिह्नों की नीलामी का सवाल आता है तो सरकार तारा जी के साथ उन्हें भी मीटिंग में आमंत्रित करती है। वे यही सलाह देते हैं कि सामग्री को भारत में लाया जाए। लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता। नियमानुसार सरकार नीलामी में स्वयं बोली नहीं लगा सकती। उनका यह सुझाव था कि गांधी से संबंधित जितनी संस्थाएं हैं उन्हें मिल कर इस सवाल पर विचार करना चाहिए और सरकार से बात करके कोई रास्ता निकालना चाहिए। 
यही मैं भी कहता रहा हूं। सबसे पहले तो जो सामान बाहर जाता है उस पर नजर रखी जाए, उसकी एक संचालन समिति हो। दूसरे, सरकार उन संस्थाओं के संकुल को धनराशि उपलब्ध कराए और वह संकुल ही नीलामी में सामान खरीदे। एक गांधी केंद्र्रीय संग्रहालय बना कर सब चीजें उसमें रखी जाएं। या तो वर्तमान गांधी संग्रहालय को केंद्र्रीय संग्रहालय का दर्जा दिया जाए।
संस्कृति मंत्रालय आखिर किस आधार पर नियम या कानून बना रहा है। उन्होंने गांधी-संस्थाओं से या व्यक्तियों से सुझाव मांगे हैं या नौकरशाहों के सुझावों पर ही निर्भर हैं, यह सब देश के सामने आना चाहिए। तारा जी और कुछ अन्य गांधीजनों की राय है कि बापू से जुड़ी वस्तुओं की नीलामी रोकना संभव नहीं। एक गांधीजन ने एक टीवी चैनल पर हुई चर्चा में कहा था कि ये चीजें नीलाम हों या न हों, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। गांधी हिंदुस्तान के ही नहीं, सारे विश्व के हैं इसलिए उनसे जुड़ी चीजें सब जगह रहें तो कोई हर्ज नहीं; गांधीजनों को यह सोचने का अधिकार है। शायद इसी कारण सरकार को भी फर्क नहीं पड़ता। लेकिन देश के लोग क्या सोचते हैं इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह बात तब संभव होती जब देश से ले जाकर सामग्री विदेशों में नीलाम न की जा रही होती। अब तो उस सामग्री को माल की तरह हानि-लाभ के समीकरण के अनुरूप बेचा-खरीदा जाता है। 
गांधी के लिखे पत्र तो संसार में बिखरे पड़े हैं इसलिए यह माना जा सकता है कि उनके पत्र बहुतायत में उपलब्ध हैं। लेकिन उनके व्यक्तिगत उपयोग की वस्तुएं तो सीमित होंगी। चाहे चप्पल हों, कपड़े हों, चादरें हों। तारा जी ने 27 मई की बैठक में बताया था कि बापू और बा तीन-तीन जोड़ी कपड़े रखते थे। बापू असंग्रही थे, हर चीज का उन्होंने त्याग किया। जो व्यक्ति त्याग करता है उसका नाता त्याग की गई वस्तु से नहीं रहता। हम भले ही चीजों से उस व्यक्ति का रिश्ता जोड़ लें। उससे वह उसकी नहीं हो जाती। अस्पताल में अगर किसी चादर पर कोई व्यक्ति दो-चार दिन लेट जाए तो वह उसकी नहीं हो जाती। हो भी जाए तो उसकी तस्दीक कौन करेगा। गांधी जी सत्य को ईश्वर मानते थे, उनकी वस्तुओं से जुड़े सत्य को भी जानने का देश को अधिकार है। 
यह सही है संसार विश्वास पर चलता है। पर विश्वास ऐसे ही नहीं हो जाता। एक स्थायी दुकान की साख तो उसकी ईमानदारी के आधार पर बनती है, पर नीलामी संस्थाओं का किस हद तक विश्वास किया जा सकता है यह तो वही लोग जानें जो खरीदते-बेचते हैं। कहा जाता है कि नीलामी एजेंसियां दलाली यानी कमीशन पर काम करती हैं। जिस चीज का जो इतिहास लिख कर दे दिया जाता है वे उसके आधार पर उसकी घोषणा करती हैं। खैर, इस बहस में जाने का हमारा कोई इरादा नहीं। पर जब किसी राष्ट्र के गांधी जैसे अग्रज की बात आती है तो हम यह कह कर नहीं छोड़ सकते कि वह व्यक्ति तो सार्वभौमिक है, सब स्वतंत्र हैं कि उसके बारे में चाहे जैसा करें। जिस देश या नगर से उसका नाता है उसका भी दायित्व कि वह इस बार में जाग्रत रहे कि सच्चाई की रक्षा हो रही है या नहीं। कहा जाता है उद््गम अपने जल को प्रदूषित नहीं होने देता।

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