प्रलय पूर्व की चेतावनियां

उत्तराखंड का दृश्य भयावह है, उसका बड़ा हिस्सा तबाह हो चुका है। न जाने कितने लोग जलप्लावन में बह गए.. कितने मकानों, दूकानों, वाहनों, जानवरों,.....को जल की प्रलयंकारी धारा ने अपने में समाहित कर लिया इसकी पूरी गणना कभी संभव नहीं हो सकती। चारों ओर केवल बरबादी का आलम।
जो लोग 16 जून के पूर्व केदारनाथ धाम से लौट आए होंगे वे यदि कुछ दिनों बाद वहां जाएं तो उनके लिए यह विश्वास करना मुश्किल होगा कि यह उनकी श्रद्धा का वही केन्द्र है जहां वे पहले आ चुके हैं। मुख्यमंदिर को छोड़कर शेष हिस्से लगभग ध्वस्त हो चुके हैं। मंदिर भी क्षतिग्रस्त हुआ है। यहां दो तिहाई भवन ढहने के साथ ही गौरीकुंड व केदारनाथ के बीच यात्रा के प्रमुख पड़ाव रामबाड़ा का नामोनिशान मिट चुका है। ऐतिहासिक शंकराचार्य समाधि स्थल मलबे में दब चुका है। कहा जाता है कि इसको ठीक करने में कई साल लग सकते हैं। रास्ते की सड़के भी जगह जगह भयानक खाइयों में बदल चुकीं हैं। यह केवल एक स्थान की कहानी नहीं है। उत्तराखंड की तबाही का आयाम आम वहां के आम जन जीवन और हजारों पर्यटकों व तीर्थयात्रियों के लिए अनर्थकारी साबित होने के साथ हमारी अध्यात्म परंपराओं, सभ्यता-संस्कृति के विनाश तक विस्तारित होता है। समय पूर्व और औसत से ज्यादा बारिश को विनाशलीला का कारण बताया जा रहा है। उत्तराखंड में 16 जून को ही 24 घंटे के भीतर 220 मिलीलीटर से ज्यादा बारिश हुई, जो सामान्य से 300 प्रतिशत ज्यादा है।
किंतु यह एकपक्षीय सच है। उत्तराखंड को विकास के नाम पर जिस तरह तबाह-बरबाद किया गया है उसमें विनाश की संभावनाएं कई गुणा बढ़ गईं हैं। पूरे उत्तराखंड में पहाड़ों पर, नदियों के किनारे और पेटी के अंदर बनाए गए रिसोर्ट, होटलों, अपार्टमेंटों, आम मकानों को देखने से ही भय पैदा होता है। आखिर हिमालय जैसा कच्चा पहाड़ अपने ऊपर कितना वजन बरदाश्त कर सकता है? सीमेंट और कंक्रिट के कंकाल को सहने और झेलने की क्षमता पहाड़ों में नहीं होतीं। जाहिर है, जब अट्टालिकाएं बनेंगी तो फिर विनाश का परिमाण भी बढ़ेगा। यही हाल सड़कों और बांधों का है। सड़कों ने हमारे लिए उन इलाकों में जाना सुगम बना दिया जहां पहुंचने की कथाएं इतिहास की साहसी गाथाओं मे गिनी जातीं थीं। सड़कों के लिए पहाड़ों की कटाई ने उनको स्थायी रुप से घायल किया। समय-समय पर वहां से दरकते पत्थर और मिट्टियां इसका प्रमाण देतीं रहतीं हैं कि आने वाले समय में ये विनाश का कारण बनते हैं।
अलकनंदा, मंदाकिनी, भागीरथी, फिर आगे गंगा ने अपना रौद्र रुप पहले भी दिखाया है। लेकिन उस समय न इतने निर्माण थे, और न इतनी संख्या में यात्री। इसलिए विनाश काफी कम होते थे। पहले इनके बीच 20 से 40 वर्ष का अंतर होता था। वर्ष 2008 के बाद हर वर्ष यानी 2009, 2010, 2011, 2012 और अब 2013 में भी छोटी-बड़े बाढ़ आ रहे हैं। क्या ये विनाश की चेतावनी नहीं दे रहे हैं? आप देख लीजिए अति संवेदनशील वासों की संख्या बढ़ती जा रही है। 2010 में ऐसे वासों की संख्या 233 जो लगभग 450 हो गई और संभव है इस प्रकोप के बाद इनकी संख्या और बढ़े। कितने लोगों को विस्थापित कर कहां और कैसे बसाया जाएगा? विकास के नाम पर हुए विनाश की बलि आखिर कितने गांव, शहर, लोग, पशु-पक्षी, वनस्पतियां चढ़ेंगी? खुद हमें ही ठहरकर सोचना होगा कि आखिर हम विकास क्यों चाहते हैं और कैसा विकास चाहिए? अगर यातायात से लेकर संचार, ऊर्जा, सारी सुख सुविधाओं से लैश चमचमाते भवन...भोग विलास की सारी सामग्रियां चाहिंएं तो फिर ऐसे ही विनाशलीला के सतत दुष्चक्र में फंसने के लिए हमें तैयार रहना चाहिए। अगर नहीं तो फिर थोड़ा पीछे लौटकर प्रकृति के अनुसार जीने और रहने का अभ्यास डालना होगा। यही दो विकल्प हमारे पास हैं। इसके बीच का कोई रास्ता हो ही नहीं सकता।

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