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Memories of Another day

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While my Parents Pulin babu and Basanti devi were living

Friday, June 21, 2013

तबाही के शनीचर

तबाही के शनीचर


आसमान है, पहाड़ है तो बारिश होगी ही लेकिन ये आपदा प्रबंधन किस चिड़िया का नाम है ये अभी विभाग को ही नहीं पता। और क्या ये भी बादल देख कर अनुमान लगाता है। आपदा कोई दिन देख कर नहीं आती लेकिन राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के सदस्य और भारत सरकार के पूर्व गृह सचिव वी के दुग्गल साहब ने कहा है की उत्तराखण्ड की आपदा अधिक भयानक होने का कारण है की उस दिन शनिवार था। बताईये ये पढ़े लिखे और दुनिया की सबसे अच्छी सर्विसेज में से एक के बड़े अफसर का बयान है, वैसे उनकी सर्विस को आई एम सॉरी (आई ए एस) कहा जाता है।

उनकी बिरादरी के टॉपर सज्जन यूपी के स्वास्थ्य घोटाले के सरगना निकले हैं फिर भी एक सामान्य बुद्धि का आदमी भी इस सनीचरी दिमाग वाले आदमी से अधिक ही समझदार होगा। अखबारी नौकरी में एक बार देखा था कि महाराष्ट्र के कुछ अधिकारी अध्ययन टूर पर मसूरी आये थे, हालाँकि वे सब मसूरी स्थित अकादमी से ही निकले थे पर ये टूर वाटर सप्लाई का अध्ययन करने के लिए था। दिमाग लगाईये, मुम्बई में पानी शहर के बाहर स्थित झीलों से आता है और मसूरी में काफी नीचे घाटी में स्थित नदी से चार चरणों में पम्पिंग करके ऊपर चढ़ाया जाता है, यहाँ की स्टडी महाराष्ट्र में कैसे प्यास बुझाएगी? संयोजक से सवाल किया तो बड़ा धांसू आईडिया मिला कि आप लोग भी अंडमान में टाउन प्लानिंग की स्टडी का एक कार्यक्रम बना लीजिये, सेंटर से अप्रूव करवा लिया जायेगा। यानी मस्ती का पूरा प्रोग्राम और पैसा जनकल्याण के नाम का।

पर अबकी सनीचर गड़बड़ हो गया अगर सोमवार होता तो क्या हो जाता, क्या प्रलय बरसाने वाला जल प्रवाह शंकर जी पी गए होते?  हाँ शनिवार साहब लोगों के लिए छुट्टी का दिन होता है, इस दिन आई तबाही से इनकी बिरादरी को दुःख पहुंचा की बीवी के साथ किये गए कमिटमेंट को पूरा नहीं कर पाए। सबके फोन घनघनाने लगे और चैन में खलल पड़ गया। ये वही बिरादरी है जिसकी जिम्मेदारी है की हमारी आपकी जिंदगी चैन से कटने की योजनायें बनायें और उसको शासन तक भेंज दें ताकि आपकी चुनी हुई सरकार उस पर मुहर लगा सके। नेता लोग तो आते जाते रहते हैं पर ये परमानेंट होते हैं पर इनकी छोटी सोच इन लोगों को अंगूठा छाप टोपी वाले की चाकरी तक ही सीमित कर देती है। टोपी वाला तो पहले से ही बदनाम है की वो केवल लेता है, देता कुछ नहीं, अगर ऐसा नहीं तो फिर कैसा नेता।

शनिवार के दिन आसमान से प्रलय आगई और अखबारों ने लिखा की ' चमत्कार देखिये की केदारनाथ के मंदिर को कुछ नहीं हुआ जबकि आसपास की पूरी दुनिया उजाड़ हो गयी।' अरे गदहों अब लिखो की खेलें मसाने में होली दिगंबर, खेलें मसाने में होली। ये काहें नहीं लिखते की वो तकनीक खोजने की जरुरत है जिससे मंदिर बना था, और रेत बजरी में सीमेंट छिड़क कर अपनी इमारतें खड़ी करने वाले मफियायों को सलाखों के पीछे ले जाने की जरुरत है। पर नहीं देहरादून में, पहाड़ से दूर और दिल्ली की गोद में पलने वाली सरकार तो चाहती थी की चार धाम यात्रा बारहों महीने चले, इसके लिए पुरजोर प्रयास किये जा रहे थे। इन मंदिरों की स्थापना करने वालों को कभी सपना भी आ गया होता की एक दिन उनकी बनाई जगहों पर दुकानें सज जाएँगी और उनका श्रम पूँजी उगाहने का बड़ा जरिया बन जायेगा तो यकीन मानिये अपने हाथों से ही अपनी कृतियों को ढहा कर चैन से मर गए होते। बस्ती से दूर, कठिन दुरूह रास्तों को पार करके यहाँ पहुंचा जाता था लेकिन अब देखिये जहाँ गाड़ी नहीं जा सकती वहाँ स्थानीय कुलियों के पीठ पर चढ़ कर धर्म धक्के में लोग मरे जाते हैं, शायद किसी के ऊपर चढ़ कर जाने से धर्म का मार्ग सुगम हो जाता हो पर ये है तो एकदम अमानवीय। इन सबसे बढ़ कर सरकार ने हर किसी को एयर टैक्सी चलाने की सुविधा दे दी, हाल ही में एक आरटीआई से पता चला था की वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से किसी भी हेलीकाप्टर कंपनी को इस क्षेत्र में उड़ान की अनुमति नहीं मिली थी। क्योंकि कोई लेने ही नहीं गया था और देहरादून की सरकार को पता ही नहीं था की ऐसी भी किसी अनुमति की आवश्यकता होती है। जबकि ऊँचाई पर सघन वन क्षेत्र में अभी कुछ वन्य जीव जिन्दा हैं जिनको कुछ समय के बाद लोग चिड़ियाघरों में भी नहीं देख पाएंगे। विश्व प्रसिद्ध फूलों की घाटी तक तो बंदरों की फ़ौज दो साल पहले ही पहुँच गयी है क्योंकि अब बर्फ उतनी नहीं पड़ती की बन्दर उधर न जा पायें। जल्दी ही वो समय भी आ जायेगा की घाटी वीरान हो जाएगी और फिर वहां महंगे रिजार्ट्स खुल जायेंगे जिनमे कभी इलाके में खिलने वाले फूलों की तस्वीरें इम्पोर्टेड फ्रेमिंग में दीवारों पर सजी होंगी।

आसमान है, पहाड़ है तो बारिश होगी ही लेकिन ये आपदा प्रबंधन किस चिड़िया का नाम है ये अभी विभाग को ही नहीं पता। और क्या ये भी बादल देख कर अनुमान लगाता है। हर साल हम तालियाँ बजाते हैं जब टीवी में दिखाता है की देश ने आसमान में एक और छलांग लगाई, फलाने के नेतृत्व में ढिमका तकनीक वाला उपग्रह अंतरिक्ष में रवाना। एंकर मूड बना कर मुस्कुराते हुए बताती है की ये देश के मौसम विभाग का उपग्रह था जो अपनी कक्षा में जा कर पल पल के मौसम की जानकारी देगा। पर लगता है की सरकारी स्कूलों के बच्चों की तरह ये उपग्रह भी अपनी कक्षा में जा कर फेल हो जाते हैं और जैसे की मास्टर की नौकरी बरकरार रखने को अब बच्चों को फेल करने की मनाही कर दी गयी है वैसे ही ये सारे खोखे जो हमारे आपके नून -तेल के पैसे से आसमान में जा रहे हैं, बिना इम्तिहान के पास किये जा रहे हैं। ये आखिर जाते किस लिए हैं, ये बहाना नहीं चलेगा की एकाएक बारिश हो गयी, क्लाउड ब्रस्ट हो गया। अमरीका में सैकड़ों मील की रफ़्तार से तूफ़ान आता है और आधा देश प्रभावित होता है पर उतने भी नहीं मरते जितने केदारनाथ के रस्ते में रामबाड़ा कसबे में भोले नाथ को प्यारे हो गए। चौबीस घंटे मोनिटरिंग का क्या मतलब है, उपग्रह नियंत्रण केंद्र में बैठे लोग क्या सेटेलाईट टीवी पर फैशन टीवी देख रहे होते हैं। कोई पूर्वानुमान नहीं, कोई चेतावनी नहीं और मीडिया में भी इस मुद्दे पर कोई बात नहीं। पिछले साल इसरो के मुखिया हरिद्वार आये थे, एक फाइव स्टार साधू के गँगा आरती इवेंट में उन्होंने भाग लिया और ब्राह्मण महासभा के लोगों ने उनको भगवान परशुराम की प्रतिमा देकर सम्मानित किया था। उनका प्रवचन भी यही था की मिशन में दिमाग हम लोग लगाते हैं पर सफलता भगवान के हाथ होती है। फिर ऐसे साईंटिस्ट और फेसबुक पर "देखते ही लाईक करें और चमत्कार देखें "जैसी पोस्ट करने वालों के मानसिक स्तर में क्या अंतर ? अरे जब भगवान भरोसे ही सब कुछ होना है तो बंद कर दो सारे चोंचले जो पब्लिक के किसी काम के नहीं, कुछ पैसे बचेंगे और हो सकता है की ठेकेदार लोग खा पी कर, साहब का और खादी का हिस्सा पहुँचा कर भी, मजबूत पुश्ते तो लगायेंगे। लालची लोगों की बनाई गयी इमारतों में हो सकता है थोड़ी मजबूती बढ़ जाय और तबाही कुछ कम हो जाए।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री कह रहे हैं की तबाही इतनी हुई है की केदारनाथ की सड़क खुलने में एक साल लग जायेगा, बढ़िया है। स्थानीय लोगों के लिए सस्ती एयर टैक्सी की व्यवस्था कर दी जाय और यात्रा चार पाँच साल के लिए रोक दी जाए। पण्डे -पुजारियों को पाकेटमारी की आदत है वो कहीं भी जी खा लेंगे, वैसे भी उनके जजमान देश भर में हैं जहाँ वो आफ सीजन में गाँव -गाँव जाकर प्रसाद देकर बैलगाड़ियों में दक्षिणा इकट्ठा करते रहे है और फिर नजदीकी बाज़ार में उसे नोटों में कन्वर्ट करते रहे हैं। अब फिर से वो देशाटन कर के भिक्षाटन करें। पर सरकार को मेहनत करनी पड़ेगी, पहाड़ के गाँव की सहकारिता की व्यवस्था को फिर स्थापित करना पड़ेगा, जिस व्यवस्था के अध्ययन पर अर्थशास्त्र का नोबल मिल गया पर वो अपने पहाड़ में मर गयी। सरकार को हवाई सर्वे से उतर कर जमीन पर आना पड़ेगा ताकि संसाधनों से भरपूर पहाड़ को आत्मनिर्भर बनाने की योजनायें जमीन पर उतारें, भले ही हमारे पैसे से वो उन देशों में घूम आयें जहाँ पहाड़ का विकास पहाड़ से ही हुआ है किसी पिंडी और पंडा की भूमिका के बगैर और सब आत्मनिर्भर हैं। कुछ लोग गालियाँ दे रहे हैं की हर चोटी पर भगवान स्थापित हैं फिर क्यों बचाने नहीं आये ? जाकर देखिये पहाड़ों की चोटियों को, वहां अनगढ़ पत्थर ही रखे हुए मिलेंगे और ये जो सनातनी भगवान हैं जिनकी दुकान और शोपिंग माल खोल के बनिए बैठे हैं, वो किसी भी पहाड़ी लोकगीत में नहीं हैं और न ही पहाड़ में कहीं पूजे जाते रहे हैं। पहाड़ के निवासियों ने तो हमेशा प्रकृति को ही पूजा है और प्रकृति है तभी उनका अस्तित्व है। पर जैसे मसाला डोसा और छोले भठूरे ने पूरे देश में जगह बना ली है वैसे ही आपके भगवान ने भी पहाड़ को कब्ज़े में करने की कोशिश की है। पहाड़ियों के जो अपने भगवान हैं वहाँ अभी भी आपकी तरह दुकानें नहीं बनीं हैं। ये चार धाम वगैरह भी पहाड़ के गाँव वालों को ज्यादा आकर्षित नहीं करते, बस आसपास वाले ही आप लोगों के लिए, आप ही सीख कर वहां ठगने के लिए बैठ गए हैं।

आपदा में मीडिया भी खूब टीआरपी कूट रही है, दिल्ली में घुटने भर पानी में घुस कर साहसिक रिपोर्टिंग करके प्रलयकारी बाढ़ का विवरण देने वालों को बड़ा मसाला मिल गया, प्रवासी उत्तराखंडी बिचारे अपने इलाके के लिए चिंतित हैं और अपने घर के सामने की नाली पालीथीन से भर देने वाले स्टूडियो में पर्यावरण की क्षति पर प्रवचन दे रहे। टीपू सुल्तानों की भी बाढ़ आगई है, गूगल से न जाने किस -किस देश की तस्वीरें उठा कर फेसबुक पर चिपकाई जा रही हैं, यहाँ तक एक टीवी चैनल बोलीविया की साल भर पुरानी तस्वीर को दिखा रहा है तो नामी पत्रकार अपनी दीवाल पर जापान के सैनिकों द्वारा झूला पुल पर पंक्तिबद्ध लेट कर लोगों को नदी पार कराने की तस्वीर चिपकाये हुए हैं और जनता वाह -वाह कर रही है। इन सबके इतर भूकंप के समय गाँव में बांटने को आये टिन की चद्दरों से बाज़ार में अपनी दुकाने बनवाने वाले पूर्व प्रधान जी खुश हैं की अबकी तो सरकार भी अपनी है और माल भी ज्यादा आएगा, हो सकता है की देहरादून में एक घर खरीद लिया जाय। योजनाओं की बोरियों को कुतरने वाले मूषक गण ख़ुशी के मारे गणेश जी की परिक्रमा में लग गए हैं, बस इंतजार है की लड्डू बंटे और बूंदी झड़ने लगे। हाँ अलबत्ता कुछ कांग्रेसी दुखी हैं की वो राहुल बाबा की बड्डे सेलिब्रेट करती हुई तस्वीर अखबार में नहीं छपवा पाए, उनके लिए शोक का समय है। हाँ भाजपाई खुश हैं की अब अगली सरकार फिर उन्ही की आएगी क्योंकि जैसी तबाही हुई है उसे सरकार क्या भगवान भी जल्दी दुरुस्त नहीं कर पाएंगे। माधो सिंह भण्डारी ,चन्द्र सिंह गढ़वाली और श्री देव सुमन के वंशज इस पीड़ा को भी झेल ले जायेंगे हाँ उनके नाम पर अब ढेर सारी दुकानें सज जाएँगी, सौदागरों की चाँदी होगी। काश ये तबाही शनिवार के दिन न आई होती!

(मलंग लेखकीय नाम। उनके ब्लाग का लिंक)

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