पहाड़ों को जब गुस्सा आता है
जब विकास के बजाय ज़्यादा मुनाफा कमाने का लालच काम कर रहा हो तो
शेष सभी जिम्मेवारियाँ गौण हो जाती हैं…
सुन्दर लोहिया
ध्यानमग्न योगी की तरह शान्त, निश्चल और सहिष्णु से दिखने वाले पहाड़ जब अपने भीतर का गुस्सा उगलते हैं तो पर्वतीय संस्कृति के आराध्य देव महादेव की तरह विनाशकारी ताण्डव का दृश्य उपस्थित हो जाता है। यह कविता लग सकती है लेकिन यह कविता का वह सत्य है जिसका हमें आज उत्तराखण्ड में सामना करना पड़ रहा है। यह कविता सुन्दर लाल बहुगुणा जैसे पर्यावरणविद् और उत्तराखण्ड के बुद्धिजीवी हिमालय के प्रति समर्पित शेखर पाठक तथा विद्यासागर नौटियाल सरीखे प्रगतिशील साहित्यकार और गिरदा जैसे लोककवि उस समय लिख रहे थे जब बड़े वे एक स्वर से हिमालय को बचाने के लिये आन्दोलन कर रहे थे। यह चिन्ता उत्तराखण्ड से लेकरहिमाचल प्रदेश के किन्नौर लाहुलस्पिति और पांगी तथाभरमौर के उच्च हिमालयी भूखण्ड तक व्याप्त है। आर्थिक विकास, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन बिना सम्भव नहीं है लेकिन इस संसाधन का वैज्ञानिक तरीके से दोहन जिससे पहाड़ की संरचना को ज़्यादा नुकसान न पहुँचे और जितना प्रकृति से लिया जाये उसकी भरपाई की अनिवार्य होनी चाहिये। लेकिन जब विकास के बजाय ज़्यादा मुनाफा कमाने का लालच काम कर रहा हो तो शेष सभी जिम्मेवारियाँ गौण हो जाती हैं।
हमारे पूर्वज भले ही विज्ञान से उस तरह लाभान्वित नहीं हो रहे थे जिस तरह हम हो रहे हैं। हमारे पास ज्ञान विज्ञान का अकूत भण्डार उपलब्ध है लेकिन क्योंकि हमारा प्रकृति से रिश्ता टूट चुका है और यही इस मानवीय त्रासदी का कारण है। जो पर्यावरणप्रेमी हिमालय को लेकर इस प्रकार की चिन्ताएँ पहले से ही व्यक्त कर रहे थे वे धर्म संस्कृति भूगर्भ विज्ञान लोकमान्यताओं के अलावा विश्व स्तर पर ऐसी प्रकृतिविरोधी नीतियों के दुष्परिणाम बारे जानकारी सार्वजनिक कर आने वाले खतरों से आगाह कर दिया था। लेकिनबड़े बाँधों की वकालत करने वाली लॉबी जिसमें निर्माण कार्य के लिये आधुनिक मशीनों के मालिक बड़े-बड़े ठेकेदारों के अलावा सीमेण्ट स्टील और लघुउद्योगपतियों के साथ साथ इंजीनियर तथा नेता और अफसरों की भ्रष्ट जमात तक शामिल थी जिसे अब विकास के फण्डैमैण्टलिस्ट कहा जाने लगा है, इन्होंने अपने अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिये प्रकृति के अवैज्ञानिक एवम् अँधाधुँध दोहन के कारण इस मानवीय त्रासदी की पटटकथा लिखी है।
आज मीडिया इस त्रासदी के लिये जो बहस चला रहा है उसमें नीतियों के बजाय नेताओं और पार्टियों की आलोचना प्रत्यालोचना शुरू हो गयी है जब कि इस मुद्दे पर बहस नेताओं के बजाय नीतियों पर होनी चाहिये। इससे समस्या के मूल कारणों को रेखांकित किया जा सकेगा।
बिजली उत्पादन से अनुमानित राजकोष की अभिवृद्धि और उससे सम्मोहित नेता और प्रशासक पर्यावरण प्रमियों की बात सुनने को तैयार नहीं थे। टिहरी के अलावा श्रीनगर में भी जलविद्युत परियोजनाएँ चल रही हैं। एक समाचार के अनुसार इस प्रदेश में पैंतालीस पनबिजली परियोजनाएँ निर्माणाधीन हैं। यह तो कुमाऊँ क्षेत्र का हाल हआ है जिसका पानी यमुना के साथ मैदानों में उतर आया है। मौसम के बदलाव पर वैज्ञानिकों ने यमुनोत्तरी क्षेत्र के ग्लेशियरों के पिघलने की बात की थी लेकिन उसे एक तरह से अनसुना कर दिया क्योंकि इससे बड़े बान्ध की लॉबी के मन्सूबे पूरे नहीं होने वाले थे। विकास के जुनूनियों ने केन्द्रीय सरकार के पर्यावरण और वन मन्न्त्रालय द्वारा 18 दिसम्बर 2012 को जारी अधिसूचना को ठण्डे बस्ते में डाल दिया क्योंकि इससे यमुना जलागम के क्षेत्र को पर्यावरण की दृष्टि से अतिसंवेदनशील क्षेत्र घोषित कर दिया था जिससे वहाँ जलविद्युत परियोजाओं, खनन और भवन निर्माण से जुड़ी गतिविधियों पर 1986 के पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम के अन्तर्गत प्रतिबन्ध लगा दिया था। टीवी पर दिखाये गये चित्रों से मालूम हुआ कि केदारनाथ धाम में सोलह जून की रात और सत्रह जून की सुबह जो सैलाब आया वह मन्दिर से काफी ऊँचाई पर बनाये गये गांधी सरोवर के तटबन्ध टूटने के कारण आया है।
ज्ब हम इस सवाल पर विचार करते हैं तो पूँजीवादी विकास की वह लॉबी सामने आती है जो बड़े काम में बड़ी कमाई बड़ी रिश्वत बड़ा रोज़गार यानि सब कुछ बड़ा ही दिखायी देता है। यह उन बड़े बड़े ठेकेदारों की लॉबी है जिनके पास बाँध निर्माण की अत्याधुनिक मशीनरी है जिसके लिये छोटे मोटे काम ऊँट के मुँह में जीरे के समान है। उन्हें बड़ा काम चाहिये इसके लिये वे बड़ी से बड़ी रकम दावँ पर लगा सकते हैं। इनकी पहुँच सत्ता के गलियारों से लेकर शयन कक्ष तक निर्बाध है। ये लोग कहीं भी कभी भी घुस सकते हैं। ये वे लोग हैं जो अनुबन्ध की शर्तों को शैम्पेन की बोतल के कार्क की तरह उड़ा कर मस्ती करते हैं। पैसा बचाने के लिये धमाकेदार ब्लास्टिंग करने से इन्हें गुरेज़ नहीं। मज़दूर नहीं रखते एक व्यक्ति को ठेका देकर मज़दूरी करवाते हैं। इसमें मज़दूरों की सुरक्षा के इन्तज़ाम और श्रम कानून के पालन का जिम्मा भी ठेकेदार को हस्तान्तरित करके कम्पनियाँ अपने आप को श्रम कानून की जद से बाहर मान लेती हैं। इसलिये मज़दूर की मौत हो जाने पर सरकार न ठेकेदार को पूछ सकती है न कम्पनी को क्योंकि ठेकेदार का सरकार के साथ कोई इकरारनामा नहीं है और कम्पनी के मुताबिक मरने वाला मज़दूर उसका कर्मचारी नहीं जिसकी मौत पर उन्हें मुआवजा देने के लिये कहा जाये।
यह भ्रष्टाचार का वह रूप है जिसे न अन्ना हज़ारे ने उठाया न रामदेव और केजरीवाल ने। इस भ्रष्टाचार का शिकार मज़दूर है इसलिये इसकी चिन्ता न जन लोकपाल को है न कांग्रेसी लोकपाल को। अडवानी जी को विदेशी बैंकों में जमा मोटी राशि नज़र आती है लेकिन यह मोटी राशि जिन तरीकों से कमाई जाती है उसे रोकने की उन्हें चिन्ता नहीं है। अगर यह रुक जाये जो उनकी राजनीति कैसे चल पायेगी ?











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