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Memories of Another day

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While my Parents Pulin babu and Basanti devi were living

Wednesday, February 13, 2013

ढूंढते रह जाओगे मीडिया में दलित

ढूंढते रह जाओगे मीडिया में दलित


कीर्ति सिंह

dalit in mediaआज शायद ही कोई ऐसा हो जो मीडिया से परिचित न हो! पहले मिशन, फिर प्रोफेशन और आज बाजारवाद के प्रभाव में मीडिया है। इन सब के बीच भारतीय मीडिया पर अक्सर मनुवादी मानसिकता का आरोप लगता रहा है। व्यवसाय में तब्दील मीडिया पर जातिवाद, भाई-भतीजावाद आदि के आरोप भी लगते रहे हैं। कई सर्वेक्षण रिपोर्ट्स ने इसका खुलासा भी किया है। मीडिया में दलित हिस्सेदारी एवं दलित सरोकारों की अनदेखी सहित अन्य मुद्दों को लेखक-पत्रकार संजय कुमार ने अपनी सद्यः प्रकाशित पुस्तक ''मीडिया में दलित ढूंढते रह जाओगे'' में उठाया है। पुस्तक का शीर्षक खुद-ब-खुद वस्तुस्थिति को पटल पर ला खड़ा कर देता है। यानी दलितों की हिस्सेदारी मीडिया में नहीं है। भारतीय मीडिया में दलितों के सवालों के प्रवेश पर अघोषित प्रतिबंध को किताब बेनकाब करता है।

यह पुस्तक संजय कुमार के मीडिया और दलित मुद्दों पर लिखे गये लेखों का संग्रह है। समसामयिक घटनाओं का उदाहरण और आंकड़ा देते हुए उन्होंने अपने लेखों को विस्तार दिया है। दलित मीडिया से संबंधित चैदह आलेख पुस्तक में हैं। दलित संवेदना को कविता में पिरोकर दलितों की आवाज बुलंद करने वाले 'हीरा डोम' को पुस्तक समर्पित की गयी है। आलेखों में हीरा डोम द्वारा 1914 में की गई शिकायत को आज भी प्रासंगिक बताया गया है। लेखक उदाहरण और आंकड़ों से बताते हैं कि अभी भी समाज में बराबरी और गैर-बराबरी का जो फासला है उसके लिए द्विज ही जिम्मेदार हैं।

पुस्तक में सप्रमाण यह सिद्ध किया गया है कि मीडिया घरानों पर ऊंचें पदों पर सवर्ण ही आसीन हैं और उन्होंने ऐसा चक्रव्यूह रच रखा है कि किसी दलित का या तो वहां पहुंच पाना ही असंभव होता है और अगर किसी तरह वे पहुंच भी गया तो, उनका टिक पाना मुश्किल है। संजय ने शोध आलेखों में चैंकाने वाले तथ्य दिए है। मीडिया में जाति के सवाल को लेकर प्रभाष जोशी और प्रमोद रंजन के बीच हुए बहस को पुस्तक में रखा गया है। वहीं 'मीडिया भी जाति देखता है' में मीडिया के जाति प्रेम को रेखांकित किया गया है। पुस्तक में दलित सवालों की अनदेखी व दलितों से मुंह फेरते मीडिया को घेरने का प्रयास किया गया है। किस तरह से दलित आंदोलन को मीडिया तरजीह नहीं देता है, उसे भी उदाहरण के साथ प्रस्तुत किया गया है।

पुस्तक: "मीडिया में दलित ढूंढते रह जाओगे"
लेखक: संजय कुमार
पृष्ठ संख्या: एक सौ चार
मूल्य- रु॰ 70/-
प्रकाशक- सम्यक प्रकाशन

मनुवादी भारतीय मीडिया के समक्ष दलित मीडिया को खड़ा करने की सुगबुगाहट को भी जोरदार ढंग से उठाया गया है। दलित पत्रकारिता पर प्रकाश डालते हुए, इसे खड़ा करने के प्रयासों पर चर्चा की गयी है। वर्षों से उपेक्षित दलितों के बराबरी के मसले को उठाते हुए बहस की संभावना तलाशी गयी है। बराबरी के लिए सरकारी प्रयासों के विरोध और दलितों को मुख्यधारा से अलग रखने की साजिश को बेनकाब किया गया है। सोशल मीडिया पर दलित विरोध को भी उदाहरण और तस्वीर के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। दलितों को सरकार की ओर से दी जाने वाली सुविधाओं का विरोध करते हुए सोशल मीडिया पर दलितों के प्रति भ्रामक सामग्री को रखते हुए, समाज के उस वर्ग को बेनकाब किया गया है जो नहीं चाहता कि दलित आगे आयें।

संजय ने समाज के सवालों को जोरदार, लेकिन सहज ढंग से रखा है। पुस्तक के लेखक स्वयं लंबे समय से मीडिया से जुड़े हुये हैं, ऐसे में पुस्तक के लेखों में मीडिया में दलितों और दलित सवालों की अनदेखी पर सशक्त तरीके से कलम चलाई है। भाषा काफी सहज व सरल है। ''मीडिया में दलित ढूंढते रह जाओगे'' के तमाम आलेख सवर्ण मानसिकता वालों के खिलाफ ही जाते हैं। हालांकि लेखक ने अपनी बात में साफ लिखा है कि उनका मकसद किसी जाति, धर्म या संप्रदाय को निशाना बनाना नहीं है बल्कि, भारतीय मीडिया पर ऊंची जाति का कब्जा जो शुरू से ही बरकरार रहा है उसे पाटते हुए बराबरी-गैरबराबरी के फासले को कम करना है। पुस्तक ने गंभीर मुद्दों को उठाया है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह किताब किसी बहस को खड़ा कर पाता है कि नहीं ?


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