| Wednesday, 08 May 2013 11:13 |
| अख़लाक़ अहमद उस्मानी इराक में कथित जनसंहारक हथियारों के नाम पर किए गए 1991 के अमेरिकी हमले ने इराक ही नहीं, बल्कि बद्दूओं को भी बर्बाद कर दिया। इंग्लैंड में काम करने वाले कुवैती सामुदायिक संगठन का मानना है कि इराक पर हमले से बहुत पहले, 1960 में ही, कुवैत के तत्कालीन अमीर अब्दुल्लाह तृतीय अलसलीम अलसबाह ने बद्दूओं को घेरने की रणनीति बना ली थी। संवैधानिक अमीरात वाले कुवैत में इस समय सबा चतुर्थ अलअहमद अलजबर अलसबा की हुकूमत है। वहां के बद्दूओं के साथ यह सरकार कैसा भेदभाव करती है यह जानने के लिए एक उदाहरण काफी है। इराक से आजादी की बीसवीं सालगिरह पर सबा की सरकार ने साल 2011 में घोषणा की कि हरेक कुवैती को एक हजार दीनार (लगभग एक लाख इक्यानबे हजार भारतीय रुपए) और साल भर तक राशन मुफ्त दिया जाएगा। यह तोहफा किसी भी तरह के प्रदर्शन से बचने के लिए नागरिकों को एक रिश्वत थी, क्योंकि 2008 में मनमाने ढंग से संसद भंग करने पर अमीर सबा चतुर्थ की काफी आलोचना हुई थी। एक हजार दीनार और साल भर का राशन बद्दूओं को छोड़ कर सभी को दिया गया। अठारह फरवरी 2011 की घोषणा में बद्दूओं का जिक्र नहीं था। अगले दिन कुवैत सिटी में हजारों बद्दू जमा हो गए और अपने साथ किए जा रहे सौतेले व्यवहार के खिलाफ प्रधानमंत्री नासिर मुहम्मद अलअहमद अलसबा के इस्तीफे की मांग की। साल भर बद्दू छोटे-छोटे प्रदर्शन करते रहे, लेकिन सरकार का दोहरा व्यवहार नहीं बदला। बद्दूओं का गुस्सा एक हजार दीनार और साल भर के राशन को लेकर नहीं, बरसों से उनके साथ किए जा रहे सौतेले व्यवहार को लेकर था। बद्दूओं के साथ लोकतंत्र समर्थक आम कुवैती भी खड़े हो गए। देश में 21 सितंबर 2011 की ऐतिहासिक रैली में सत्तर हजार लोग शरीक हुए। इस रैली में बद्दूओं का मुद्दा भी उठाया गया। पूरे साल यानी 2012 में कुवैत में विरोध-प्रदर्शन चलते रहे। कई सांसदों को भी गिरफ्तार किया गया और बाद में दबाव में छोड़ दिया गया। इसी 24 मार्च को अब्दुल हकीम अलफदली को एक सौ तीन दिनों की जेल के बाद जमानत पर छोड़ा गया है। अलफदली एक बद्दू सामाजिक कार्यकर्ता हैं। पिछले साल दो अक्तूबर को कुवैत के ताइमा में प्रदर्शन के बाद अलफदली को गिरफ्तार कर लिया गया था। उन पर आरोप है कि वे कुवैती अमीरात के खिलाफ प्रदर्शन करते हैं। जमानत मिलने के दो सप्ताह बाद तक पुलिस ने अलफदली को नहीं छोड़ा। इस साल चौबीस मार्च को जब अलफदली जेल से बाहर आए तो एक नायक की तरह उनका स्वागत हुआ। ब्रिटेन में रह रहे कुवैती मूल के बद्दू मुहम्मद अलनेजी का कहना है कि अगर आप कुवैत में बद्दू हैं तो आप जमीन और आसमान के बीच कहीं हैं। 'ताइपे टाइम्स' को लंदन में दिए एक साक्षात्कार में अलनेजी ने कहा कि जब कुवैत आजाद हुआ तो कई बद्दूओं को नागरिकता का प्रस्ताव दिया गया था, लेकिन तब वे इसका मतलब नहीं जानते थे। वे तो बस यह जानते थे कि हम हर कबीले के बच्चे-बच्चे को जानते हैं और साथ लेकर चलना है तो कपड़ा साथ रखो, कागज क्या होता है? आज पचास साल बाद अलनेजी की पत्नी और सात बच्चों को मालूम है कि नागरिकता क्या होती है। 'रिफ्यूजी इंटरनेशनल' ने साल 2007 में कुवैत के बद्दूओं पर एक अध्ययन किया, जिसके मुताबिक कुवैती बद्दू सरकारी बाबूगीरी से परेशान हैं। उन्हें आवेदन के बावजूद नागरिक पहचानपत्र नहीं दिए जाते, सरकारी नौकरियों में आवेदन नहीं कर सकते, बच्चों को स्कूल में दाखिला नहीं मिलता, जन्म का इंदराज नहीं किया जाता, शादी का प्रमाणपत्र नहीं मिलता, मृत्यु का पंजीकरण नहीं होता, अपने नाम से बद्दू कोई संपत्ति और गाड़ी नहीं खरीद सकता, ड्राइविंग लाइसेंस नहीं मिलता और पासपोर्ट जारी नहीं किया जाता। बीस महीने के बीमार मासूम मुहम्मद कसीम और कॉलेज जाने के लिए परेशान रानिया को भी नहीं। आज कुवैत में जितने बद्दू रहते हैं उतने लोग तो इराक युद्ध के दौरान वहीं फंस गए। यहां के बद्दू यह भी नहीं जानते कि इराक में फंसे उनके सवा लाख भाईबंद कैसे होंगे? भारत और पाकिस्तान के बिछड़े तो हर हाल में मिल ही लिए, ये अनपढ़ भोले बद्दू क्या करें? एक नागरिक होने का सबसे बड़ा हक 'मताधिकार' बद्दूओं को नसीब नहीं। कुवैत का अमीर किसी गरीब बद्दू को नहीं जानता। यह कौन-सी हुकूमत है, जो खुद सोने-चांदी के बरतनों में खाती है और उसकी अट््ठाईस लाख की आबादी में सवा लाख लोगों की बिरादरी दर-दर मारी फिरती है? http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/20-2009-09-11-07-46-16/44126-2013-05-08-05-44-41 |
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Wednesday, May 8, 2013
कुवैत के बदनसीब बद्दू
कुवैत के बदनसीब बद्दू
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